सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ ने धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की. इसमें केरल के सबरीमला मंदिर और विभिन्न धर्मों द्वारा अपनाई जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े मुद्दे शामिल हैं.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें शुरू कीं. मेहता ने कहा कि अदालतें ‘धार्मिक संप्रदायों’ और ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं’ को उस तरह सीमित दायरे में परिभाषित नहीं कर सकतीं, जैसा कि सितंबर 2018 के सबरीमला फैसले में किया गया था.
मेहता ने कहा कि सबरीमला फैसले की एक राय में यह उल्लेख है कि अनुच्छेद 17 महिलाओं पर लागू होता है. उन्होंने आगे कहा, “एक राय यह है कि आप महिलाओं के साथ अछूतों जैसा व्यवहार कर रहे हैं.”
मेहता ने कहा, “मुझे इस बात पर सख्त आपत्ति है… भारत उतना पितृसत्तात्मक या लैंगिक रूढ़ियों वाला समाज नहीं है, जैसा कि पश्चिम समझता है. कभी-कभी समस्या यही होती है.”
इस पर, जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि छुआछूत का अपना एक इतिहास रहा है और उसी पर काबू पाने के लिए अनुच्छेद 17 को एक मौलिक अधिकार बनाया गया था.
जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा, “सबरीमला के संदर्भ में छुआछूत (के तर्क) पर कैसे बहस की जाएगी, यह मैं नहीं जानती.” इस पर मेहता ने कहा, “इसे छुआछूत के आधार पर कभी भी सही नहीं ठहराया जा सकता, और मैं यह बात सीधे तौर पर कह रहा हूं.”
जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “एक महिला के तौर पर मैं कह सकती हूं कि हर महीने तीन दिन का छुआछूत नहीं हो सकता और चौथे दिन वह खत्म नहीं हो सकता… यही कड़वी सच्चाई है. इसका दूसरा पहलू मुख्य सवाल है. एक महिला के रूप में, अनुच्छेद 17 ऐसा नहीं हो सकता कि वह तीन दिनों के लिए लागू हो और चौथे दिन छुआछूत खत्म हो जाए.”
मेहता ने कहा कि उन्हें इस बात से कोई आपत्ति या विवाद नहीं है. उन्होंने आगे कहा, “सबरीमला का बचाव मैंअपने अलग तरीके से करूंगा… सबरीमला चार दिनों (के मासिक धर्म) की बात नहीं करता. सबरीमला का मतलब एक खास आयु वर्ग से है, और अगर किसी के मन में कोई भ्रम है, तो आइए हम इसे पूरी तरह स्पष्ट कर लें.
मेहता ने कहा, “पूरी दुनिया में भगवान अय्यप्पा के मंदिर महिलाओं के सभी वर्गों के लिए खुले हैं, सिवाय एक के… जो अपने आप में एक अनोखा मामला है. मेरी जानकारी के अनुसार, नई दिल्ली में भगवान अय्यप्पा के तीन मंदिर हैं, जहां बच्ची से लेकर बुजुर्ग महिला तक, हर कोई जाकर पूजा करता है. यह (प्रतिबंध) केवल एक मंदिर में है…” उन्होंने आगे यह भी स्पष्ट किया कि वे मासिक धर्म के विषय पर बात नहीं कर रहे हैं.
मेहता ने कहा, “अगर मैं किसी मजार या गुरुद्वारे में जाता हूं और मुझे अपना सिर ढकना पड़ता है, तो मैं यह नहीं कह सकता कि आप मेरी पसंद का अधिकार छीन रहे हैं. सबरीमला का फैसला यही कहता है कि: आपकी पसंद का अधिकार छीन लिया गया है, आपकी स्वायत्तता (आजादी) छीन ली गई है. यह स्वायत्तता छीनना नहीं है, बल्कि उस धर्म के सिद्धांतों, आस्था और विश्वास का सम्मान करना है.”
मेहता ने कहा, “जब हम अजमेर शरीफ जाते हैं, तो अपना सिर ढकते हैं. जब हम गुरुद्वारे जाते हैं, तब भी अपना सिर ढकते हैं…” मेहता ने आगे कहा कि भारत ने हमेशा महिलाओं के साथ न केवल समानता का व्यवहार किया है, बल्कि उन्हें ऊंचे पायदान पर रखा है. हम विशिष्ट रूप से एकमात्र ऐसी संस्कृति हैं जो देवियों के आगे सिर झुकाते हैं.
जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि यदि कोई सामाजिक बुराई है जिसे धार्मिक प्रथा का नाम दे दिया गया है, तो अदालत उन दोनों के बीच अंतर कर सकती है—कि वह एक सामाजिक बुराई है या फिर धर्म का कोई अनिवार्य हिस्सा.

