SIR की छंटनी में मुस्लिम वोटर: नाम कटने के आंकड़े क्या कहते हैं?

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13 करोड़ नाम हटे, कई इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी ने उठाए बड़े सवाल

(रईस खान)

भारत में मतदाता सूची को अपडेट और साफ करने के लिए शुरू की गई स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR अब सिर्फ चुनावी सूची की कवायद नहीं रह गई है। इसके असर को लेकर देशभर में बहस तेज है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस प्रक्रिया में कहीं मुस्लिम मतदाता जरूरत से ज्यादा प्रभावित तो नहीं हुए?

देश के अलग-अलग राज्यों में SIR के तहत तैयार की गई ड्राफ्ट मतदाता सूचियों में 13 करोड़ से ज्यादा नाम शामिल नहीं किए गए। इनमें ऐसे नाम भी हैं जिन्हें चुनाव आयोग की प्रक्रिया में मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित, डुप्लीकेट या अन्य कारणों से अलग किया गया। इस बड़े पैमाने की छंटनी के बाद आयोग ने अब उन पात्र मतदाताओं को फिर जोड़ने के लिए विशेष अभियान शुरू किया है, जो प्रक्रिया में छूट गए हो सकते हैं।

यहीं से सवाल पैदा होता है, क्या यह सिर्फ प्रशासनिक सफाई है, या कुछ समुदायों पर इसका असर असमान रहा है?

नंदीग्राम का आंकड़ा सबसे ज्यादा चौंकाता है

पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम से सामने आया आंकड़ा इस बहस का सबसे चर्चित उदाहरण बन गया है।

कोलकाता स्थित सबर इंस्टीट्यूट के विश्लेषण के अनुसार, SIR के बाद जारी सात सप्लीमेंट्री सूचियों में नंदीग्राम से कुल 2,826 नाम हटाए गए। इनमें 2,700 नाम मुस्लिम मतदाताओं के थे, यानी 95.5 प्रतिशत।

यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नंदीग्राम में मुस्लिम आबादी करीब 25 प्रतिशत बताई जाती है। यानी आबादी में लगभग एक चौथाई हिस्सेदारी रखने वाले समुदाय की हिस्सेदारी इन खास सप्लीमेंट्री डिलीशनों में 95 प्रतिशत से ज्यादा रही।

यह अपने आप में किसी जानबूझकर भेदभाव का अंतिम प्रमाण नहीं है, लेकिन इतना बड़ा अंतर गंभीर जांच और स्पष्टीकरण की मांग जरूर करता है।

सिर्फ नंदीग्राम की बात नहीं

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मतदाताओं के मामले “अंडर एडजुडिकेशन” यानी जांच और फैसले के लिए लंबित रहे।

मार्च 2026 में इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया था कि मुस्लिम बहुल इलाकों में ऐसे मामलों की संख्या काफी अधिक थी, जबकि दूसरी ओर मतुआ बहुल क्षेत्रों में बड़ी संख्या में नाम हटाए गए थे। इससे यह तस्वीर सामने आती है कि SIR का असर सिर्फ एक समुदाय तक सीमित नहीं था, लेकिन अलग-अलग समुदायों पर इसका असर अलग तरीके से दिखाई दिया।

यानी कहानी को सिर्फ “मुस्लिम नाम कटे” कहकर खत्म करना भी सही तस्वीर नहीं होगी।

लेकिन जहां मुस्लिम आबादी बड़ी है, वहां लंबित मामलों और हटाए गए नामों की संख्या चुनावी अधिकार के लिहाज से खास महत्व रखती है।

27 लाख नाम और 22 लाख अपील

पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान करीब 27.16 लाख मतदाता हटाए गए। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इनमें से 22 लाख से ज्यादा लोगों ने अपने नाम वापस जोड़ने के लिए अपील की।

यानी करीब 82 प्रतिशत हटाए गए मतदाताओं ने सूची में वापसी के लिए अपील की।

यह आंकड़ा एक अहम सवाल पैदा करता है,

अगर किसी मतदाता को लगता है कि उसका नाम गलत तरीके से हट गया, तो उसे वापस सूची में आने के लिए कितनी लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा?

अगस्त तक दाखिल अपीलों में बड़ी संख्या अभी निपटनी बाकी थी। सितंबर में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि करीब 38.20 लाख अपीलें दाखिल हुई थीं, लेकिन उस समय सिर्फ लगभग 1.02 लाख का निपटारा हुआ था।

“मेरा नाम क्यों काट दिया?”

SIR का सबसे मानवीय पक्ष उन लोगों की परेशानी है, जिन्हें अचानक पता चलता है कि उनका नाम मतदाता सूची में नहीं है।

इंडियन एक्सप्रेस की ग्राउंड रिपोर्टों में ऐसे लोगों के मामले सामने आए, जो लंबे समय से उसी इलाके में रह रहे थे और पहले भी वोट डालते रहे थे, लेकिन SIR के बाद उनका नाम सूची से बाहर हो गया।

गरीब परिवारों के लिए यह समस्या और बड़ी हो सकती है।

किसी के पास पुराने दस्तावेज नहीं हैं।

किसी के कागजों में नाम की स्पेलिंग अलग है।

किसी का परिवार दूसरी जगह चला गया था।

और किसी के पास अपील करने के लिए समय और पैसे दोनों की कमी है।

मतदाता सूची में एक नाम की गलती, लोकतंत्र में एक वोट की कमी बन सकती है।

झारखंड के गोड्डा से एक और सवाल

झारखंड के गोड्डा जिले में इंडियन एक्सप्रेस की जांच में ऐसे मामले सामने आए, जहां बीजेपी के बूथ लेवल एजेंटों द्वारा मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने के लिए बड़ी संख्या में Form-7 दिए जाने का आरोप सामने आया।

रिपोर्ट के मुताबिक कुछ बूथ लेवल अधिकारियों ने ऐसे फॉर्म स्वीकार करने से इनकार किया और उन्हें प्रक्रिया के लिहाज से सही नहीं माना। कुछ प्रभावित मतदाताओं के नाम पीढ़ियों से गांव में मौजूद थे और कई 2003 की मतदाता सूची में भी दर्ज पाए गए।

यहां भी जरूरी बात यह है कि यह एक पत्रकारिता जांच में सामने आए मामले हैं, पूरे झारखंड की तस्वीर नहीं।

लेकिन ऐसे मामले यह सवाल जरूर उठाते हैं कि Form-7 जैसी प्रक्रिया का इस्तेमाल कौन कर रहा है और किस आधार पर किसी मतदाता का नाम हटाने की मांग की जा रही है?

चुनाव आयोग क्या कहता है?

चुनाव आयोग का पक्ष है कि SIR का मकसद मतदाता सूची को अधिक सही और भरोसेमंद बनाना है।

आयोग के अनुसार मृत लोगों, स्थानांतरित मतदाताओं, डुप्लीकेट नामों और ऐसे लोगों की पहचान करना जरूरी है जो संबंधित क्षेत्र में सामान्य रूप से निवास नहीं करते।

सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में भी SIR के पीछे मतदाता सूची की शुद्धता को लेकर आयोग की दलील दर्ज है। बिहार के मामले में आयोग ने तेजी से हुए शहरीकरण, बड़े पैमाने पर पलायन, मृत्यु की रिपोर्ट न होने और डुप्लीकेट प्रविष्टियों को सूची की गुणवत्ता से जुड़ी समस्याओं के रूप में बताया था।

इसलिए मतदाता सूची की सफाई का उद्देश्य अपने आप में गलत नहीं है।

सवाल प्रक्रिया का है,

क्या सही मतदाता भी इस सफाई की चपेट में आ गया?

सुप्रीम कोर्ट की भूमिका क्यों अहम है?

SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी मामला पहुंचा। बिहार SIR पर मई 2026 के फैसले में अदालत ने चुनाव आयोग की शक्ति और प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर विचार किया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आधार पहचान के लिए इस्तेमाल हो सकता है, लेकिन वह नागरिकता का प्रमाण नहीं है।

पश्चिम बंगाल में हटाए गए मतदाताओं के लिए अपील की व्यवस्था भी अदालत की निगरानी में आगे बढ़ी।

लेकिन अब असली चुनौती है,

जिस व्यक्ति का नाम गलत तरीके से कट गया है, उसे बिना अनावश्यक परेशानी के वापस कैसे जोड़ा जाए?

मुस्लिम मतदाताओं की चिंता क्यों ज्यादा है?

मुस्लिम समुदाय की चिंता सिर्फ इसलिए नहीं है कि कुछ मुस्लिम नाम हटे हैं।

चिंता उस समय बढ़ती है जब किसी मुस्लिम बहुल इलाके में हटाए गए नामों का अनुपात उसकी आबादी के मुकाबले बहुत ज्यादा दिखाई देता है।

नंदीग्राम इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है।

वहीं दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल के आंकड़े यह भी बताते हैं कि हिंदू मतदाताओं, खासकर मतुआ समुदाय के इलाकों में भी बड़ी संख्या में नाम हटे हैं। द वीक की अप्रैल 2026 की रिपोर्ट में उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर बताया गया कि पूरे राज्य में SIR के अलग-अलग चरणों में बड़ी संख्या में हिंदू मतदाता भी सूची से बाहर हुए।

इसलिए असली सवाल “किसका वोट काटा गया?” से आगे बढ़कर होना चाहिए,

“क्या हर योग्य भारतीय नागरिक का वोट बराबर सुरक्षा के साथ बचाया गया?”

13 करोड़ का आंकड़ा क्या बताता है?

देशभर में 13 करोड़ से अधिक नामों का ड्राफ्ट सूची से बाहर होना अपने आप में बहुत बड़ा प्रशासनिक बदलाव है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार SIR के राष्ट्रीय विस्तार में 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 13 करोड़ से ज्यादा नाम ड्राफ्ट रोल से बाहर हुए।

इसके बाद चुनाव आयोग ने उन मतदाताओं की पहचान और दोबारा नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान शुरू किया है, जो SIR के दौरान छूट गए हो सकते हैं।

आयोग ने अधिकारियों को घर-घर जाकर ऐसे लोगों की मदद करने और सामान्य Form-6 के जरिए पात्र मतदाताओं को जोड़ने का निर्देश दिया है।

यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे खुद चुनाव आयोग ने यह जरूरत स्वीकार की है कि SIR के दौरान छूटे योग्य मतदाताओं को वापस सूची में लाने की कोशिश जरूरी है।

सबसे बड़ा सवाल: वोट का अधिकार

भारत में वोट सिर्फ एक चुनावी निशान नहीं है।

वोट नागरिक की आवाज है।

वोट से वह तय करता है कि उसके इलाके में कौन प्रतिनिधित्व करेगा।

इसलिए मतदाता सूची में नाम होना लोकतांत्रिक भागीदारी की पहली सीढ़ी है।

अगर किसी योग्य नागरिक का नाम गलती से हट जाता है और वह समय पर उसे वापस नहीं जुड़वा पाता, तो उसका नुकसान सिर्फ कागज पर दर्ज एक नाम का नहीं होता, वह अपने वोट के इस्तेमाल का अवसर खो सकता है।

आगे क्या होना चाहिए?

SIR को लेकर विवाद का समाधान राजनीतिक नारों से ज्यादा पारदर्शी आंकड़ों से होना चाहिए।

हर राज्य में यह सार्वजनिक होना चाहिए कि,

– कितने नाम हटाए गए?

– किस कारण से हटाए गए?

– कितने मुस्लिम, हिंदू और दूसरे समुदायों के मतदाता प्रभावित हुए?

– कितने लोगों ने अपील की?

– कितने नाम वापस जोड़े गए?

– कितनी अपीलें अभी लंबित हैं?

– और किन कारणों से नाम सबसे ज्यादा हटे?

इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने से बहस आरोप से निकलकर आंकड़ों और जवाबदेही पर आ सकती है।

सवाल किसी एक समुदाय का नहीं, हर वोट का है

SIR का उद्देश्य अगर मतदाता सूची को साफ और भरोसेमंद बनाना है, तो यह काम स्वागत योग्य है।

लेकिन सफाई की प्रक्रिया में एक भी योग्य मतदाता का अधिकार नहीं छूटना चाहिए।

नंदीग्राम में मुस्लिम मतदाताओं के 95.5 प्रतिशत वाले आंकड़े ने जो सवाल खड़ा किया है, उसका जवाब आंकड़ों और स्वतंत्र जांच से मिलना चाहिए।

गोड्डा जैसे मामलों में Form-7 के इस्तेमाल की जांच होनी चाहिए।

और पश्चिम बंगाल में लाखों लंबित अपीलों का तेजी से निपटारा होना चाहिए।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं कि वोट किसे मिला,

सबसे पहले यह सुनिश्चित होना चाहिए कि योग्य नागरिक का वोट देने का अधिकार सुरक्षित रहे।

मुस्लिम हो या हिंदू, गरीब हो या अमीर, शहर में रहता हो या गांव में, हर योग्य भारतीय का नाम मतदाता सूची में होना लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है।

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