(रईस खान)
नई दिल्ली। लोकतंत्र में पत्रकार का काम सिर्फ़ घटनाओं को देखना नहीं, बल्कि उन्हें जनता तक पहुँचाना भी है। जब सड़कों पर प्रदर्शन होते हैं, लोग सरकार से सवाल पूछते हैं और अपनी माँगों को लेकर आवाज़ उठाते हैं, तब पत्रकारों की ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है। लेकिन अगर ऐसी घटनाओं को कवर करने वाले पत्रकारों को ही हिरासत में ले लिया जाए, उनके मोबाइल फोन और दूसरे उपकरण ज़ब्त कर लिए जाएँ, तो सवाल सिर्फ़ पुलिस की कार्रवाई का नहीं, बल्कि प्रेस की आज़ादी का भी बन जाता है।
दिल्ली में 10 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों के दौरान कुछ ऐसा ही मामला सामने आया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस की कार्रवाई के बीच रिपोर्टिंग कर रहे कई पत्रकारों को भी हिरासत में ले लिया गया। इस घटना ने पत्रकार संगठनों को नाराज़ कर दिया और मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी।
रिपोर्टिंग कर रहे थे, हिरासत में पहुँचा दिए गए
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के बयान के मुताबिक, प्रदर्शन की कवरेज कर रहे कई पत्रकारों को पुलिस बसों में बैठाकर छत्रसाल स्टेडियम और चाणक्यपुरी पुलिस स्टेशन जैसे स्थानों पर ले जाया गया। हिरासत में लिए गए पत्रकारों में वरिष्ठ पत्रकार परनजॉय गुहा ठाकुरता के अलावा द क्विंट, द वायर, स्क्रॉल, रिपोर्टर टीवी, नवभारत टाइम्स और न्यूज़लॉन्ड्री से जुड़े पत्रकार भी शामिल थे।
पत्रकारों का कहना था कि वे प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई और लोगों की हिरासत की तस्वीरें ले रहे थे। उन्होंने अपनी पहचान बताने के लिए प्रेस कार्ड भी दिखाए, लेकिन इसके बावजूद उन्हें रिपोर्टिंग करने से रोका गया।
बयान के अनुसार, कुछ पुलिसकर्मियों ने पत्रकारों की पहचान पर सवाल उठाते हुए कहा कि आजकल हर कोई ख़ुद को पत्रकार बताता है। इसके अलावा, कई पत्रकारों के आधिकारिक मोबाइल फोन भी ले लिए गए।
अगर कोई पत्रकार अपनी पहचान साबित करने के बाद भी सिर्फ़ अपना काम करने के कारण हिरासत में लिया जाता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि पत्रकारों को अपना काम करने की आज़ादी किस हद तक हासिल है।
क्या प्रेस कार्ड की पहचान सिर्फ़ सरकारी मान्यता से होगी?
इस पूरे मामले में एक अहम सवाल पत्रकारों की पहचान और उनकी रिपोर्टिंग के अधिकार को लेकर भी उठा है।
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने पहले कहा था कि प्रदर्शन के दौरान केवल प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) से मान्यता प्राप्त पत्रकारों को ही रिपोर्टिंग की अनुमति होगी। पत्रकार संगठनों ने इस सोच पर आपत्ति जताई है।
दरअसल, मीडिया की दुनिया अब केवल अख़बारों और टेलीविज़न चैनलों तक सीमित नहीं है। डिजिटल न्यूज़ पोर्टल, स्वतंत्र पत्रकार और छोटे मीडिया संस्थान भी जनता तक ख़बरें पहुँचाने में अहम भूमिका निभाते हैं। इनमें से कई पत्रकारों के पास पीआईबी की मान्यता नहीं होती, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें पत्रकारिता करने का अधिकार नहीं है।
पत्रकार संगठनों का कहना है कि किसी पत्रकार की पहचान और उसके काम की प्रकृति को समझे बिना उसे रिपोर्टिंग से रोकना उचित नहीं है। सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पत्रकारों के अधिकारों को सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
प्रेस क्लब ने जताया कड़ा विरोध
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने, उनके साथ कथित उत्पीड़न और उपकरण ज़ब्त किए जाने की कड़ी निंदा की है। संगठन ने इसे प्रेस की स्वतंत्रता के लिए गंभीर मामला बताया है।
प्रेस क्लब की प्रेसिडेंट संगीता बरुआ पिशारोती और सेक्रेटरी जनरल अफ़ज़ल इमाम के साथ इंडियन वीमेन्स प्रेस कॉर्प्स, दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स और केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स की दिल्ली यूनिट ने भी इस बयान का समर्थन किया है।
पत्रकार संगठनों ने माँग की है कि हिरासत में लिए गए सभी पत्रकारों को बिना शर्त रिहा किया जाए, उनके ज़ब्त किए गए मोबाइल फोन और अन्य उपकरण लौटाए जाएँ तथा इस कार्रवाई के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों की जाँच कराई जाए। साथ ही, दिल्ली पुलिस से सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगने की माँग भी की गई है।
संगठनों का ज़ोर इस बात पर है कि भविष्य में पत्रकारों को शांतिपूर्ण प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करने से न रोका जाए और उनके साथ ऐसा व्यवहार न हो, जिससे वे अपना काम करने में असुरक्षित महसूस करें।
लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं
दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती, मेट्रो सेवाओं पर पाबंदियों और इंटरनेट बंद किए जाने जैसी व्यवस्थाओं का भी ज़िक्र किया गया है। पत्रकार संगठनों ने इन परिस्थितियों को शांतिपूर्ण विरोध की आवाज़ सीमित किए जाने की आशंका से जोड़कर देखा है।
हालाँकि, सुरक्षा व्यवस्था के लिए प्रशासन को कुछ कदम उठाने पड़ सकते हैं, लेकिन ऐसे कदमों की ज़रूरत, उनके औचित्य और उनके असर की जाँच भी उतनी ही ज़रूरी है। सुरक्षा के नाम पर नागरिकों की आवाज़ और मीडिया की स्वतंत्रता पर अनावश्यक रोक नहीं लगनी चाहिए।
पत्रकारों का काम सत्ता के पक्ष या विपक्ष में खड़ा होना नहीं, बल्कि तथ्यों को सामने लाना है। वे सरकार के कामकाज पर सवाल उठाएँ, विरोध प्रदर्शनों की तस्वीर जनता तक पहुँचाएँ या पुलिस की कार्रवाई का रिकॉर्ड बनाएँ, यह सब लोकतांत्रिक समाज में स्वतंत्र पत्रकारिता का हिस्सा है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। प्रेस की स्वतंत्रता भी इसी संवैधानिक अधिकार का अहम हिस्सा मानी जाती है। हालाँकि, यह स्वतंत्रता क़ानून के तहत उचित पाबंदियों के अधीन है, लेकिन किसी पत्रकार को केवल इसलिए काम करने से रोकना कि उसके पास किसी ख़ास सरकारी संस्था की मान्यता नहीं है, अपने आप में गंभीर सवाल खड़े करता है।
ख़बरों पर पहरा, तो जवाबदेही कैसे तय होगी?
पत्रकारिता का असल महत्व तब सामने आता है, जब वह उन घटनाओं को दर्ज करती है जिन्हें सत्ता या व्यवस्था के लिए असहज माना जा सकता है। प्रदर्शन में क्या हुआ, पुलिस ने किस तरह कार्रवाई की, लोगों के साथ कैसा व्यवहार हुआ और प्रशासन ने क्या कदम उठाए, इन सभी सवालों के जवाब जनता तक पहुँचाने में पत्रकारों की भूमिका अहम होती है।
यदि पत्रकारों को ही घटनास्थल से हटा दिया जाए, उनके कैमरे और फोन ले लिए जाएँ या उन्हें हिरासत में रखा जाए, तो घटनाओं की निष्पक्ष जानकारी जनता तक पहुँचने में बाधा पैदा हो सकती है।
दिल्ली की इस घटना ने एक बुनियादी सवाल फिर सामने ला दिया है, क्या पत्रकारों को अपना काम करने के लिए सरकारी मान्यता की मुहर का इंतज़ार करना होगा, या उनकी पहचान, उनके काम और क़ानून के आधार पर उनके अधिकारों का सम्मान किया जाएगा?
लोकतंत्र में सरकार, पुलिस, चुनाव आयोग और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं से सवाल पूछना जितना ज़रूरी है, उतना ही ज़रूरी उन सवालों को जनता तक पहुँचाने की आज़ादी भी है। पत्रकारों को ख़बर दिखाने से रोकना केवल मीडिया की समस्या नहीं है; यह जनता के जानने के अधिकार से भी जुड़ा मामला है।
क्योंकि जब ख़बर दिखाने वालों को ही हिरासत में ले लिया जाए, तो सवाल सिर्फ़ यह नहीं रहता कि पत्रकारों के साथ क्या हुआ सवाल यह भी बन जाता है कि जनता तक सच पहुँचाने की राह कितनी खुली है।
–क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

