पाकिस्तानी नागरिक को विमान में ले जाने और रक्षा प्रतिष्ठानों की तस्वीरें लेने के आरोप; सीबीआई जाँच की माँग, पुराने दस्तावेज़ों का विवाद फिर चर्चा में
(नरेश दीक्षित,)
लखनऊ/कानपुर। देश की सुरक्षा से जुड़े मामलों में सरकारी रिकॉर्ड की अहमियत बहुत ज़्यादा होती है। ख़ासकर जब मामला उड़ान प्रशिक्षण केंद्र, सरकारी विमान और रक्षा प्रतिष्ठानों से जुड़ा हो, तो दस्तावेज़ों की सही जानकारी और उनकी सुरक्षा बेहद ज़रूरी हो जाती है। कानपुर के राजकीय उड़ान प्रशिक्षण केंद्र से जुड़ा करीब 26 साल पुराना एक विवाद इसी वजह से चर्चा में है।
इस मामले में पूर्व कर्मचारी देवेंद्र कुमार दीक्षित ने आरोप लगाया है कि वर्ष 2000-01 के दौरान केंद्र के अधिकृत रजिस्टर में दर्ज एक अहम घटना से जुड़े रिकॉर्ड को सामने नहीं लाया गया। उन्होंने इस मामले की निष्पक्ष जाँच कराने और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो से जाँच कराने की माँग की है।
हालाँकि, इस मामले में लगाए गए गंभीर आरोपों और अदालत में साबित तथ्यों के बीच फ़र्क़ करना ज़रूरी है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर पूरे मामले को समझना इसलिए भी अहम है, ताकि देश की सुरक्षा से जुड़े सवालों की निष्पक्ष जाँच हो और किसी पर बिना सबूत दोष तय न किया जाए।
क्या है 2000-01 के रिकॉर्ड का विवाद?
शिकायतकर्ता देवेंद्र कुमार दीक्षित के मुताबिक, उन्होंने वर्ष 2000 में राजकीय उड़ान प्रशिक्षण केंद्र, कानपुर में अपनी ज़िम्मेदारी संभाली थी। उनका आरोप है कि अक्टूबर 2000 के आख़िरी सप्ताह में केंद्र के एक तत्कालीन इंस्ट्रक्टर ने एक पाकिस्तानी नागरिक को प्रशिक्षण विमान में ले जाकर कानपुर के कुछ रक्षा प्रतिष्ठानों की तस्वीरें खिंचवाई थीं।
दीक्षित का दावा है कि इस घटना से जुड़ी जानकारी उस समय के ऑथराइज़ेशन रजिस्टर में दर्ज थी। इसी रजिस्टर को लेकर उनका विवाद है और वह इसे मामले की जाँच के लिए अहम दस्तावेज़ मानते हैं।
उन्होंने इस घटना के पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की भूमिका होने का भी संदेह जताया है। लेकिन इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि और इसे साबित करने वाले प्रमाण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी से स्पष्ट नहीं होते। इसलिए इसे स्थापित तथ्य के बजाय शिकायतकर्ता का आरोप ही माना जाना चाहिए।
रजिस्टर सामने लाने की माँग क्यों?
दीक्षित का कहना है कि वर्ष 2000-01 के ऑथराइज़ेशन रजिस्टर को जाँच के लिए उपलब्ध कराने की माँग पहले भी की गई थी, लेकिन उन्हें यह दस्तावेज़ नहीं मिला।
उनका आरोप है कि इस रजिस्टर में दर्ज जानकारी से पूरे मामले की सच्चाई सामने आ सकती है। इसी आधार पर उन्होंने संबंधित अधिकारियों से रिकॉर्ड उपलब्ध कराने और मामले की उच्चस्तरीय जाँच कराने की माँग की है।
यहाँ एक बुनियादी सवाल उठता है, यदि किसी सरकारी संस्थान के पुराने रिकॉर्ड को लेकर गंभीर शिकायत की जाती है, तो संबंधित विभाग को उसकी उपलब्धता, संरक्षण और जाँच में उपयोग की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। अगर रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, तो उसके गुम होने या नष्ट होने के कारणों की भी जाँच होनी चाहिए।
हालाँकि, केवल किसी दस्तावेज़ का उपलब्ध न होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसे जानबूझकर छिपाया गया है। इसके लिए रिकॉर्ड की स्थिति और विभागीय जवाबदेही की स्वतंत्र जाँच ज़रूरी है।
शिकायत के बाद प्रताड़ना और नौकरी से हटाने का आरोप
दीक्षित ने यह भी आरोप लगाया है कि विभाग में कथित अनियमितताओं का विरोध करने के बाद उन्हें परेशान किया गया और अंततः नौकरी से हटा दिया गया।
उनके मुताबिक, उनके ख़िलाफ़ कानपुर के कैंट थाने में एक मुक़दमा भी दर्ज कराया गया था, जिसे वह झूठा बताते हैं। उनका दावा है कि उन्हें न्याय नहीं मिला और उनके साथ अन्याय हुआ।
दूसरी ओर, इलाहाबाद हाईकोर्ट के उपलब्ध पुराने फैसलों में उनके सेवा से हटाए जाने के मामले का अलग विवरण दर्ज है। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, विभागीय जाँच के बाद उनके ख़िलाफ़ अनुशासनहीनता और वरिष्ठ अधिकारी के साथ दुर्व्यवहार के आरोपों पर कार्रवाई की गई थी। उनकी सेवा समाप्ति को चुनौती देने वाली याचिका और बाद की अपील खारिज हो चुकी हैं।
इसलिए नौकरी से हटाए जाने को सीधे तौर पर कथित सुरक्षा मामले में शिकायत करने की सज़ा बताने के लिए अतिरिक्त प्रमाण और दोनों घटनाओं के बीच संबंध की पुष्टि ज़रूरी है।
हाईकोर्ट के आदेश को लेकर क्या है स्थिति?
इस मामले से जुड़ी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने रिट याचिका संख्या 8089/2026 पर सुनवाई करते हुए नागरिक उड्डयन विभाग के अधिकारियों को 12 सप्ताह के भीतर शिकायत पर क़ानून के मुताबिक फ़ैसला करने का निर्देश दिया।
लेकिन इस ख़ास याचिका संख्या और बताए गए आदेश की प्रमाणित प्रति उपलब्ध न होने के कारण इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
दूसरी ओर, उपलब्ध अदालती रिकॉर्ड में 12 जून 2026 को देवेंद्र कुमार दीक्षित बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले में रिट-ए संख्या 4306/2025 पर फैसला दर्ज है। इस मामले में अदालत ने सेवा से हटाए जाने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी। फैसले में पुराने मुक़दमों, विभागीय कार्रवाई और सीबीआई जाँच की माँग से जुड़े उनके दावों का भी ज़िक्र है।
इसलिए 12 सप्ताह में शिकायत के निस्तारण से जुड़े कथित नए आदेश को प्रकाशित करने से पहले उसकी प्रमाणित प्रति और सही मुक़दमा संख्या की जाँच करना ज़रूरी है।
सीबीआई जाँच की माँग और जवाबदेही का सवाल
दीक्षित चाहते हैं कि पूरे मामले की जाँच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए, ताकि वर्ष 2000-01 के रिकॉर्ड की स्थिति, कथित उड़ान और तस्वीरें लेने की घटना की सच्चाई सामने आ सके।
देश की सुरक्षा से जुड़ी किसी शिकायत को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। लेकिन गंभीर आरोपों की जाँच भी सबूतों के आधार पर ही होनी चाहिए। संबंधित विभाग के रिकॉर्ड, विमान की उड़ान से जुड़े दस्तावेज़, उस समय के अधिकारियों के बयान और उपलब्ध दूसरे प्रमाण ही यह स्पष्ट कर सकते हैं कि वास्तव में क्या हुआ था।
यदि शिकायत में दम है, तो जाँच से सच्चाई सामने आनी चाहिए। यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो यह बात भी साफ़ होनी चाहिए। दोनों ही स्थितियों में पारदर्शिता और क़ानून के मुताबिक कार्रवाई ज़रूरी है।
सच्चाई सामने आना ही सबसे अहम
कानपुर फ्लाइंग क्लब से जुड़ा यह विवाद केवल एक पुराने रजिस्टर या एक पूर्व कर्मचारी की शिकायत तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसमें उठाए गए सवालों का जवाब दस्तावेज़ों, प्रमाणों और निष्पक्ष जाँच के आधार पर मिलना चाहिए।
देश की सुरक्षा से जुड़ी शिकायत हो तो उसकी गंभीरता से जाँच होनी चाहिए। सरकारी विभागों की जवाबदेही तय होनी चाहिए और किसी भी व्यक्ति के ख़िलाफ़ आरोप को बिना प्रमाण सच नहीं मानना चाहिए।
आख़िरकार, इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि वर्ष 2000-01 के रिकॉर्ड में क्या दर्ज था, उस रिकॉर्ड की मौजूदा स्थिति क्या है और उपलब्ध प्रमाण वास्तव में किस नतीजे की ओर इशारा करते हैं? इन सवालों का जवाब किसी सनसनीख़ेज़ दावे से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जाँच और प्रमाणित दस्तावेज़ों से ही मिल सकता है।

