ज्ञान विज्ञान — डॉ. नजला अल-रदादी: खजूर से नैनो टेक्नोलॉजी तक

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मदीना की वैज्ञानिक ने अजवा और बरनी खजूर के अर्क से तैयार किए प्लैटिनम के नैनो कण, लैब में कैंसर सेल्स पर दिखा असर

(-इवान बेंद्रे)

खजूर का नाम आते ही हमारे जेहन में मिठास, सेहत और रमज़ान की इफ्तारी की तस्वीर उभरती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यही खजूर आधुनिक विज्ञान की एक अहम रिसर्च का हिस्सा भी बन सकता है? सऊदी अरब की वैज्ञानिक डॉ. नजला अल-रदादी ने मदीना की मशहूर अजवा और बरनी खजूर के अर्क का इस्तेमाल करके प्लैटिनम के बेहद छोटे कण तैयार किए। प्रयोगशाला में इन कणों का परीक्षण किया गया, जहां उन्होंने कैंसर की कुछ कोशिकाओं की बढ़ोतरी रोकने में असर दिखाया।

यह रिसर्च इसलिए खास है, क्योंकि इसमें स्थानीय प्राकृतिक संसाधन को आधुनिक नैनो टेक्नोलॉजी के साथ जोड़ा गया है। हालांकि, यह अभी कैंसर का साबितशुदा इलाज नहीं है, बल्कि आगे की वैज्ञानिक खोज के लिए एक अहम कदम है।

कौन हैं डॉ. नजला अल-रदादी?

डॉ. नजला बिन्त साद अल-रदादी सऊदी अरब की वैज्ञानिक हैं। वह मदीना की ताइबा यूनिवर्सिटी में रसायन विज्ञान और नैनो टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में शोध से जुड़ी रही हैं। उनका काम खास तौर पर ऐसे नैनो पदार्थ तैयार करने पर केंद्रित है, जिन्हें बनाने में प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल किया जा सके।

रसायन विज्ञान में उनकी विशेषज्ञता अकार्बनिक रसायन से जुड़ी है। इस विषय में धातुओं और उनके यौगिकों के गुणों, उनकी बनावट और उनके इस्तेमाल का अध्ययन किया जाता है।

डॉ. नजला के शोध का एक अहम हिस्सा ‘ग्रीन नैनो टेक्नोलॉजी’ है। आसान शब्दों में कहें तो इसका मकसद नैनो आकार के पदार्थ तैयार करने के लिए ऐसे तरीके तलाशना है, जिनमें प्राकृतिक अर्क जैसे विकल्पों का इस्तेमाल किया जा सके और कुछ पारंपरिक रासायनिक पदार्थों की जरूरत कम हो।

उनकी रिसर्च बताती है कि विज्ञान की नई राहें तलाशने के लिए हमेशा किसी महंगे या विदेशी संसाधन की जरूरत नहीं होती। कई बार हमारे आसपास मौजूद चीजें भी नई खोज का आधार बन सकती हैं।

अजवा और बरनी खजूर से कैसे तैयार हुए नैनो कण?

डॉ. नजला के चर्चित शोध का शीर्षक है, ‘ग्रीन सिंथेसिस ऑफ प्लैटिनम नैनोपार्टिकल्स यूजिंग सऊदी डेट्स एक्सट्रैक्ट एंड देयर यूसेज ऑन कैंसर सेल ट्रीटमेंट’। यह शोध अरबियन जर्नल ऑफ केमिस्ट्री में प्रकाशित हुआ था।

इस रिसर्च में अजवा और बरनी खजूर के अर्क का इस्तेमाल करके प्लैटिनम के नैनो कण तैयार किए गए। नैनो कण इतने छोटे होते हैं कि उन्हें सामान्य आंखों से नहीं देखा जा सकता। इनके छोटे आकार और खास रासायनिक गुणों के कारण विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में इन पर काफी शोध किया जा रहा है।

इस प्रयोग में खजूर के अर्क में मौजूद प्राकृतिक पदार्थों ने प्लैटिनम के कण तैयार करने और उन्हें स्थिर रखने में मदद की। खास तौर पर पॉलीफेनॉल जैसे प्राकृतिक तत्वों ने अहम भूमिका निभाई।

इस तरीके की खास बात यह है कि खजूर के अर्क को नैनो कण बनाने की प्रक्रिया में इस्तेमाल किया गया। इसे ग्रीन सिंथेसिस यानी अपेक्षाकृत पर्यावरण-अनुकूल तरीके से पदार्थ तैयार करने की दिशा में एक उदाहरण माना जा सकता है।

यहां यह समझना जरूरी है कि ‘ग्रीन’ का मतलब यह नहीं कि तैयार पदार्थ पूरी तरह नुकसानरहित है। प्लैटिनम के नैनो कणों के इंसानी शरीर पर असर, उनकी सुरक्षा और सही मात्रा जैसे सवालों की जांच अलग से जरूरी होती है।

प्रयोगशाला में कैंसर की तीन तरह की कोशिकाओं पर परीक्षण

इस शोध का सबसे दिलचस्प हिस्सा कैंसर कोशिकाओं पर किए गए परीक्षण हैं। वैज्ञानिकों ने तैयार नैनो कणों का असर तीन तरह की कैंसर सेल लाइनों पर जांचा:

– आंत के कैंसर की कोशिकाएं: HCT-116

– स्तन कैंसर की कोशिकाएं: MCF-7

– लिवर कैंसर की कोशिकाएं: HepG-2

प्रयोग के नतीजों में अजवा और बरनी खजूर के अर्क से तैयार प्लैटिनम नैनो कणों ने इन कोशिकाओं की जीवित रहने की क्षमता कम करने का असर दिखाया। अलग-अलग खजूरों से बने कणों का असर भी अलग था।

अजवा से तैयार नैनो कणों ने आंत के कैंसर की कोशिकाओं पर उल्लेखनीय असर दिखाया, जबकि बरनी से तैयार कणों ने लिवर कैंसर की कोशिकाओं के खिलाफ बेहतर परिणाम दिए। स्तन कैंसर की कोशिकाओं पर भी दोनों तरह के कणों का परीक्षण किया गया और उनमें असर दिखाई दिया।

यह नतीजे उम्मीद जगाते हैं, लेकिन इनकी सही अहमियत समझना भी जरूरी है। प्रयोगशाला में कैंसर कोशिकाओं पर असर दिखने का मतलब यह नहीं कि वही पदार्थ इंसान के शरीर में भी सुरक्षित और प्रभावी इलाज साबित होगा।

किसी नई तकनीक को इलाज तक पहुंचने के लिए कई चरणों से गुजरना पड़ता है। पहले उसकी सुरक्षा और काम करने के तरीके को बेहतर ढंग से समझा जाता है, फिर जरूरी प्रीक्लिनिकल और इंसानी क्लिनिकल परीक्षण किए जाते हैं। इसलिए डॉ. नजला का शोध कैंसर के इलाज की दिशा में संभावनाएं दिखाता है, लेकिन इसे कैंसर का नया इलाज कहना अभी जल्दबाजी होगी।

खजूर की ताकत और आधुनिक विज्ञान का मेल

खजूर सदियों से अरब समाज की जिंदगी, खानपान और संस्कृति का अहम हिस्सा रहा है। मदीना की अजवा खजूर खास तौर पर मशहूर है। बरनी भी वहां की जानी-पहचानी किस्मों में शामिल है।

खजूर में कई प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं, जिनमें एंटीऑक्सिडेंट गुण वाले पदार्थ भी शामिल हैं। वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इन तत्वों का इस्तेमाल नए पदार्थ तैयार करने और उनके गुणों को बेहतर बनाने में कैसे किया जा सकता है।

डॉ. नजला के शोध में खजूर को सीधे कैंसर की दवा के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया गया। इसके बजाय खजूर के अर्क की मदद से प्लैटिनम के नैनो कण तैयार किए गए और फिर उन कणों का कैंसर कोशिकाओं पर असर जांचा गया।

यह फर्क बहुत अहम है। खजूर खाना और खजूर के अर्क से प्रयोगशाला में तैयार किए गए नैनो कणों का इस्तेमाल करना दो अलग बातें हैं। इस रिसर्च के आधार पर यह दावा नहीं किया जा सकता कि खजूर खाने से कैंसर ठीक हो सकता है।

इस शोध की असली अहमियत यह है कि प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करके वैज्ञानिक तरीके से नए पदार्थ तैयार किए जा सकते हैं, जिनका आगे चिकित्सा के क्षेत्र में अध्ययन किया जा सकता है।

पेटेंट और शोध की अहमियत

इस काम से जुड़ी प्रकाशित रिसर्च में सऊदी पेटेंट ऑफिस का पेटेंट नंबर 5422 दर्ज है। इसका शीर्षक भी सऊदी खजूर के अर्क से प्लैटिनम नैनो कण तैयार करने और कैंसर कोशिकाओं पर उनके इस्तेमाल से संबंधित है। यह पेटेंट 15 जून 2017 की तारीख से जुड़ा बताया गया है।

पेटेंट किसी तकनीक या आविष्कार को कानूनी मान्यता देने से संबंधित होता है। इसका मतलब यह नहीं कि वह तकनीक अपने आप अस्पतालों में इस्तेमाल के लिए तैयार हो गई या मरीजों पर सुरक्षित साबित हो गई। लेकिन यह जरूर बताता है कि उस तरीके को विकसित करने और उसके इस्तेमाल की संभावना पर काम किया गया है।

डॉ. नजला का यह शोध रसायन विज्ञान, नैनो टेक्नोलॉजी और चिकित्सा अनुसंधान के बीच तालमेल की एक मिसाल है। ऐसी रिसर्च भविष्य में नए पदार्थों को समझने और उनके संभावित इस्तेमाल की दिशा खोल सकती है।

दुनिया के वैज्ञानिकों में पहचान

डॉ. नजला अल-रदादी का नाम दुनिया के प्रमुख वैज्ञानिकों की सूची में शामिल होने की खबरों के कारण भी चर्चा में रहा है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी और एल्सेवियर से जुड़ी ‘टॉप 2% साइंटिस्ट्स’ सूची दुनिया भर के शोधकर्ताओं के वैज्ञानिक प्रभाव का आकलन करने के लिए जानी जाती है।

इस तरह की सूची में वैज्ञानिकों के शोध पत्रों, दूसरे शोधकर्ताओं द्वारा उनके काम के हवाले दिए जाने और अन्य अकादमिक मानकों जैसे आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, इस सूची में शामिल होना किसी एक शोध की गुणवत्ता का अंतिम प्रमाण नहीं होता, बल्कि वैज्ञानिक काम के प्रभाव को समझने का एक पैमाना है।

डॉ. नजला की उपलब्धियों और पुरस्कारों का पूरा रिकॉर्ड उनकी यूनिवर्सिटी तथा सूची के आधिकारिक दस्तावेजों से मिलाकर देखा जाना चाहिए। लेकिन उनके प्रकाशित शोध से यह साफ है कि उन्होंने प्राकृतिक अर्क और नैनो टेक्नोलॉजी को जोड़कर वैज्ञानिक अध्ययन किया है।

मुस्लिम महिलाओं और युवा शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणा

विज्ञान की दुनिया में किसी भी शोधकर्ता की असली पहचान उसके सवालों, मेहनत, प्रयोगों और नतीजों से बनती है। डॉ. नजला की कहानी इस लिहाज से अहम है कि उन्होंने अपने क्षेत्र में शोध के जरिए पहचान बनाई और मदीना की स्थानीय खजूर को आधुनिक विज्ञान के एक प्रयोग से जोड़ा।

उनकी उपलब्धियां उन लड़कियों और युवाओं के लिए प्रेरणा बन सकती हैं, जो विज्ञान को अपने करियर के रूप में अपनाना चाहते हैं। खास तौर पर उन समाजों में, जहां महिलाओं की शिक्षा और वैज्ञानिक क्षेत्र में उनकी भागीदारी को और बढ़ाने की जरूरत है, ऐसी कहानियां अहमियत रखती हैं।

मगर प्रेरणा का असली मकसद किसी वैज्ञानिक को सिर्फ उसकी पहचान या धर्म के आधार पर सराहना नहीं, बल्कि उसके काम को समझना और उससे सीखना है। डॉ. नजला का उदाहरण बताता है कि वैज्ञानिक जिज्ञासा, लगातार मेहनत और नए विचारों पर काम करने की लगन किसी भी शोधकर्ता को आगे बढ़ा सकती है।

एक खजूर, एक प्रयोग और भविष्य की उम्मीद

डॉ. नजला अल-रदादी की कहानी में अजवा और बरनी खजूर सिर्फ खानपान की चीजें नहीं रह जातीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रयोग का हिस्सा बन जाती हैं। प्राकृतिक अर्क से प्लैटिनम नैनो कण तैयार करना और फिर कैंसर कोशिकाओं पर उनका असर जांचना इस बात की मिसाल है कि पारंपरिक संसाधनों को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर नए सवालों के जवाब तलाशे जा सकते हैं।

अभी इस शोध को मरीजों के इलाज तक पहुंचने के लिए और वैज्ञानिक जांच की जरूरत है। लेकिन प्रयोगशाला में सामने आए नतीजे आगे के अध्ययन के लिए रास्ता जरूर खोलते हैं।

डॉ. नजला अल-रदादी का काम हमें याद दिलाता है कि विज्ञान की बड़ी खोजें अक्सर एक छोटे सवाल से शुरू होती हैं। कभी-कभी उस सवाल का सुराग किसी अत्याधुनिक प्रयोगशाला में मिलता है, तो कभी मदीना की एक मशहूर खजूर में।

-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

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