(रईस खान)
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) और उसके प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की राजनीतिक यात्रा को देखते हुए, पार्टी की भविष्य की संभावनाएं मुख्य रूप से उसके स्थायी वोट शेयर , नेतृत्व विकास, गठबंधन रणनीतियों और सामाजिक स्वीकार्यता पर निर्भर करती हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि मजलिस की वृद्धि क्षेत्रीय स्तर पर तेज है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर चुनौतियां बनी हुई हैं, जिसमें पोलराइजेशन और वोट स्प्लिटिंग के आरोप शामिल हैं।
फिक्स वोट शेयर का और राजनीतिक पहचान
मजलिस का वोट शेयर हाल के चुनावों में स्थिर लेकिन सीमित दिखाई देता है, जो भविष्य में एक स्थायी आधार बना सकता है। महाराष्ट्र नगर निगम चुनावों 2026 में पार्टी ने 125 सीटें जीतीं, जो पिछले प्रदर्शन से तीन गुना अधिक है। यह जीत मुख्य रूप से मुस्लिम-बहुल इलाकों में हुई, जहां पार्टी ने 5-10% वोट शेयर हासिल किया, जैसे मुंबई में 8 सीटें और छत्रपति संभाजीनगर में बिहार विधानसभा चुनावों 2025 में मजलिस का वोट शेयर 1.85% रहा, जो नोटा के बराबर था, लेकिन सीमांचल जैसे क्षेत्रों में यह 10-15% तक पहुंचा। विश्लेषकों का मानना है कि यदि मजलिस महाराष्ट्र, बिहार और यूपी में 5-10% फिक्स वोट शेयर बनाए रखती है, तो वह बसपा या टीएमसी जैसी क्षेत्रीय पार्टियों की तरह गंभीर राजनीतिक शक्ति बन सकती है। भविष्य में पार्टी की रणनीति मुस्लिम-दलित इलाकों पर फोकस कर रही है, जो स्थायी वोट आधार बना सकती है, लेकिन वोट बिखराव से सेक्युलर पार्टियों को नुकसान पहुंचाने का आरोप भी लग रहा है।
अपने प्रतिनिधियों का तैयार होना
मजलिस की छवि अभी ओवैसी भाइयों पर केंद्रित है, लेकिन पार्टी राज्य स्तर पर नेतृत्व विकसित कर रही है। महाराष्ट्र में, इम्तियाज जलील जैसे नेता ने टिकट वितरण और कैंपेन मैनेज किया, जिससे 125 सीटें जीती गईं। मजलिस को ‘मुस्लिम राजनीति का चेहरा’ कहा गया, लेकिन गैर-मुस्लिम कैंडिडेट्स की जीत से यह धारणा बदल रही है। भविष्य में, यदि पार्टी 10-20 प्रशिक्षित नेता और जमीनी कार्यकर्ता तैयार करती है, तो वह ‘संस्थागत शक्ति’ बन सकती है।
विश्लेषण बताते हैं कि मजलिस का विस्तार नगर पालिका से विधानसभा स्तर तक हो रहा है, जैसे मुंबई बीएमसी में 8 सीटें। मजलिस मुस्लिम नेतृत्व को मजबूत कर रही है, जो सेक्युलर पार्टियों की कमजोरी का फायदा उठा रही है। हालांकि, आंतरिक कलह, जैसे टिकट वितरण पर इस्तीफे, चुनौती बने हुए हैं।
गठबंधन की मजबूरी, जब बड़ी पार्टियां खुद पहल करेंगी
मजलिस ने कई गठबंधन के प्रयास किए, लेकिन सफलता सीमित रही। बिहार में, पार्टी ने राजद-कांग्रेस महागठबंधन में शामिल होने के लिए पत्र लिखा, लेकिन 6 सीटों की मांग ठुकरा दी गई। यूपी में, अपना दल (के) और अन्य छोटी पार्टियों के साथ एलायंस किया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी या एनडीए से कोई गठबंधन नहीं। ओवैसी ने स्पष्ट कहा, “समुद्र के दो किनारे कभी नहीं मिल सकते।” हालांकि, लोकल स्तर पर अकोट और अचलपुर में बीजेपी के साथ एलायंस की खबरें आईं, लेकिन ओवैसी ने इन्हें खारिज कर कार्रवाई की।
विश्लेषकों का कहना है कि यदि मजलिस 10-15 सीटों पर असर डालती है, तो कांग्रेस, सपा, राजद जैसी पार्टियां गठबंधन के लिए मजबूर होंगी। मजलिस मुस्लिम वोटर्स को ‘सेक्युलर’ पार्टियों से दूर कर रही है, जिससे गठबंधन की जरूरत बढ़ेगी। भविष्य में, पार्टी ‘मोलभाव करने वाली’ बन सकती है, लेकिन वर्तमान में ‘वोट कटर’ का टैग बाधा है।
हिस्सेदारी और सत्ता में भागीदारी
गठबंधन सफल होने पर मजलिस को मंत्रालयों में हिस्सेदारी मिल सकती है। महाराष्ट्र में, लोकल एलायंस से मजलिस काउंसलरों को कमिटी चेयर मिले, जैसे अचलपुर में एजुकेशन कमिटी। ओवैसी ने कहा कि पार्टी जनहित वाले बीजेपी प्रस्तावों का समर्थन करेगी, लेकिन विरोध भी करेगी। मजलिस को ‘भावनात्मक से संस्थागत राजनीति’ की ओर बढ़ते देखा जा रहा है, जहां नीति निर्धारण में भूमिका बढ़ेगी। हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर लोकसभा 2024 में पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा, जहां मुस्लिम प्रतिनिधित्व केवल 4% है। भविष्य में, यदि वोट शेयर 3-4% पहुंचा, तो सत्ता में भागीदारी संभव है।
‘सांप्रदायिकता’ का ठप्पा कमजोर क्यों पड़ेगा?
मजलिस पर ‘सांप्रदायिक’ और बीजेपी की बी-टीम’ का आरोप लगता है, लेकिन गैर-मुस्लिम कैंडिडेट्स और दलित मुद्दों पर फोकस से यह कमजोर पड़ सकता है। महाराष्ट्र में 6 गैर-मुस्लिम जीते, जो पार्टी को ‘सामाजिक न्याय की पार्टी’ बनाता है। मजलिस ‘हिंदूफोबिक सेक्युलरिज्म’ से बेहतर है, क्योंकि यह खुले तौर पर मुस्लिम हितों का प्रतिनिधित्व करती है। ओवैसी ने आरोपों को खारिज किया, कहा कि मुस्लिम नेतृत्व के उभरने से पार्टियां असहज हैं। भविष्य में, यदि गैर-मुस्लिम प्रतिनिधि बढ़े, तो नैरेटिव बदल सकता है, लेकिन पोलराइजेशन का खतरा बना रहेगा।
भविष्य की संभावनाएं, विरोध से स्वीकार्यता तक
मजलिस की रणनीति पहचान बनाने से स्वीकार्यता की ओर है। महाराष्ट्र में सफलता से पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार कर सकती है, लेकिन मुस्लिम वोट शिफ्ट से सेक्युलर पार्टियां कमजोर होंगी। मजलिस 16 मुस्लिम-बहुल लोकसभा सीटों पर जीत सकती है, लेकिन इससे बीजेपी को फायदा होगा। ओवैसी ने कहा कि पार्टी मुस्लिम आबादी के हिसाब से प्रतिनिधित्व चाहती है। कुल मिलाकर, यदि मजलिस सब्र से वोट शेयर और नेतृत्व बनाए, तो स्वीकार्यता बढ़ेगी, लेकिन ध्रुवीकरण का जोखिम रहेगा।
स्पष्ट है कि मजलिस की भविष्य की ताकत फिक्स वोट शेयर (वर्तमान में 1-5% क्षेत्रीय) और गठबंधनों पर निर्भर है, जो उसे ‘हाशिए की पार्टी’ से मुख्यधारा में ला सकती है। हालांकि, ‘बी-टीम’ आरोप और पोलराइजेशन चुनौतियां हैं।

