(रईस खान )
रमजान का मुकद्दस महीना करीब आ रहा है, और इस दौरान गरीबों, खास तौर पर मुस्लिम समुदाय के मजबूर और जरूरतमंद लोगों की मदद करने की रिवायत बहुत पहले से चलती आ रही है। इस साल, 2026 के रमजान में, भारत भर में अलग अलग संगठन, मस्जिदें और सामुदायिक समूह गरीब परिवारों को भोजन, पैसों की मदद और दूसरी जरूरी सहायता देने के लिए आगे बढ़कर काम कर रहे हैं। आप देखिए कैसे आम मुसलमान, एनजीओ और स्थानीय जिम्मेदार लोग इस नेक काम में हिस्सा ले रहे हैं। ऐसे काम न सिर्फ गरीबी कम करने में मदद करते हैं बल्कि पूरे समुदाय को मजबूत बनाते हैं।
देशभर में चल रही बड़ी कोशिशें
भारत में रमजान के दौरान जकात, सदका और फितरा जैसी खैरात की रिवायतें गरीब मुस्लिम परिवारों को सीधा फायदा देती हैं। कई संगठन सूखा राशन, इफ्तार किट और रोज़गार से जुड़ी स्कीम चला रहे हैं। उदाहरण के लिए ह्यूमन वेलफेयर फाउंडेशन हर साल रमजान में गरीबों को भोजन किट बांटता है। यह संगठन दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, गुजरात, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पंजाब जैसे राज्यों में काम करता है। ह्यूमन वेलफेयर फाउंडेशन खास तौर पर बेवा औरतों, अनाथ बच्चों, बुजुर्गों और बेघर लोगों पर ध्यान देता है, और रमजान में सूखा राशन बांटकर हजारों परिवारों की मदद करता है।
एक दूसरी बड़ी कोशिश इंडिया जकात की है, जो चेन्नई में अल अंसार चेरिटेबल ट्रस्ट के साथ मिलकर गरीब मुस्लिम परिवारों को किराने की किट दान करती है। यह कार्यक्रम खास तौर पर रमजान में गरीबों पर ध्यान देता है, जहां स्थानीय मस्जिदों और इमामों की मदद से सामान बांटा जाता है। पिछले सालों में हजारों किट बांटी गईं, और इस साल भी ऐसा ही प्लान है।
उत्तर भारत में बदलाव ला रही एनजीओ
उत्तर भारत में, खासकर लखनऊ जैसे शहरों में, नई इस्लामी चैरिटी एनजीओ जकात की पुरानी रिवायत को नए तरीके से आगे बढ़ा रही हैं। यहां जकात को सिर्फ खैरात नहीं बल्कि एक जकात इकोनॉमी के तौर पर देखा जाता है। उदाहरण के लिए, इत्तेहाद फाउंडेशन जैसी संस्थाएं जकात के पैसों से गरीब मुस्लिमों को कारोबार शुरू करने के लिए पैसा, काम सीखने की ट्रेनिंग, बिना सूद का कर्ज और तालीमी वजीफा देती हैं। यह गरीबी को पूरी तरह खत्म करने की कोशिश है, जहां रमजान में स्थानीय स्तर पर पैसा जमा किया जाता है और मस्जिदों के आसपास के मोहल्लों में बांटा जाता है।
इसी तरह जकात फाउंडेशन ऑफ अमेरिका का साइकिल कार्ट जनरेशन लिवलीहुड प्रोजेक्ट बिहार में गरीब मुस्लिम परिवारों को साइकिल ठेला देकर उनकी कमाई बढ़ाता है। एक साइकिल ठेला से परिवार की महीने की कमाई 15000से 20000 रुपए तक पहुंच जाती है, जो गरीबी की हद से ऊपर है। रामपुर में लड़कियों की तालीम के लिए भी कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, जहां ट्यूशन, किताबें और रहने की सुविधा दी जाती है।
कश्मीर से दक्षिण भारत तक की मिसाल
कश्मीर में राइजिंग कश्मीर की रिपोर्ट के मुताबिक रमजान में खैरात से आम लोगों की सेहत पर अच्छा असर पड़ता है। यहां गरीब मुस्लिमों को दवाएं, टीके और सेहत की सेवाएं दी जाती हैं, जो गरीबी की वजह से आसानी से नहीं मिल पातीं। साथ ही, तालीमी कैंप और हुनर सिखाने की ट्रेनिंग जैसे कंप्यूटर सिखाया जाता है। यह पहल मस्जिदों और अनाथालयों के जरिए होती है।
दक्षिण भारत में सदका आईओ का रमजान और ईद फूड किट कार्यक्रम मुस्लिम बेवा औरतों और अनाथ बच्चों के लिए है। यह 150 परिवारों को सहरी और इफ्तार के लिए भोजन किट देता है, ताकि वे बेफिक्र होकर रोज़ा रख सकें। यह कोशिश उन इलाकों में की जाती है जहां लोग बुनियादी खाना भी मुश्किल से जुटा पाते हैं। इसी तरह, द हंस इंडिया की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि स्थानीय समुदाय रमजान में खाने का इंतजाम और चैरिटी कार्यक्रम चला रहे हैं, जहां मस्जिदों के इमाम और जिम्मेदार अफराद मिलकर काम करते हैं।
सामुदायिक स्तर पर योगदान की गुजारिश
ये उदाहरण बताते हैं कि रमजान में मदद का काम सिर्फ बड़े संगठनों तक सीमित नहीं है। आम मुसलमान अपने इलाकों में मस्जिदों के आसपास से भी शुरुआत कर सकते हैं। प्रयागराज में हाल ही में मुसलमानों ने महाकुंभ के दौरान मस्जिदें खोलकर 25,000 से ज्यादा यात्रियों की मदद की, जो दिखाता है कि समुदाय कैसे मिलकर काम करता है। पटना में भी ईद पर गरीब मुस्लिम परिवारों को कपड़े, सेवई और सूखे मेवे की किट बांटी जा रही हैं।
आखिर में, रमजान गरीबी से लड़ने का एक बेहतरीन मौका है। ज्यादा जानकारी के लिए स्थानीय मस्जिदों या जिन संगठनों का जिक्र किया गया है उनसे संपर्क करें। ऐसे काम से समाज और मजबूत होता

