मुफ़्ती-ए-आज़म उन्नाव’, जामा मस्जिद में सादगीपूर्ण दस्तारबंदी समारोह संपन्न

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(रईस खान )

उन्नाव शहर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद में दिन जुमा 13 फरवरी 2026 को मुफ़्ती आफ़ताब आलम मिस्बाही साहब की रस्म-ए-दस्तारबंदी का आयोजन सादगी और गरिमा के साथ किया गया। इस अवसर पर शहर एवं आसपास की मस्जिदों के इमाम, हाफ़िज़, उलेमा-ए-किराम तथा बड़ी तादाद में लोग शामिल रहे। दुआओं और स्वागत के माहौल में यह उम्मीद जताई गई कि दारुल इफ्ता का यह सिलसिला आगे भी उन्नाव में धार्मिक मार्गदर्शन, आपसी एकता और शिक्षा के वातावरण को मजबूत करेगा।

बताया जाता है कि उन्नाव के प्रसिद्ध धार्मिक शिक्षण संस्थान दारुल उलूम फैज़-ए-आम में दारुल इफ्ता की स्थापना वर्ष 1990 में हुई थी। उस समय मदरसे के प्रधानाचार्य मुफ़्ती ज़ाहिद अली सलामी साहब थे, जिनके नेतृत्व में दारुल इफ्ता की नींव रखी गई और शरई मसलों पर मार्गदर्शन की नियमित व्यवस्था शुरू हुई। शहर एवं आसपास के क्षेत्रों से लोग अपने धार्मिक सवालों के हल के लिए यहां आने लगे। बाद में मुफ़्ती ज़ाहिद अली सलामी साहब की सरकारी नौकरी लगने पर मदरसे की जिम्मेदारी और फतवा जारी करने का कार्य मुफ़्ती गुफरान खान साहब को सौंपा गया। उन्होंने पूरी ईमानदारी से इस दायित्व को निभाया और दारुल इफ्ता की सेवाएं निरंतर जारी रहीं, जिससे लोगों का विश्वास कायम रहा। कुछ समय बाद उनकी भी सरकारी नौकरी लगने पर यह जिम्मेदारी आगे बढ़ी।

इसके पश्चात मदरसे के ही विद्वान आलिम मुफ़्ती आफ़ताब आलम साहब की योग्यता, ज्ञान और सेवाओं को देखते हुए उन्हें ‘मुफ़्ती-ए-आज़म उन्नाव’ की जिम्मेदारी सौंपी गई। उनकी नियुक्ति से पूर्व वरिष्ठ उलेमा से परामर्श लिया गया, जिसमें कानपुर के प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान मुफ़्ती हनीफ खान साहब तथा काजी-ए-शहर कानपुर मुफ़्ती साकिब अदीब साहब शामिल थे।

जामा मस्जिद में आयोजित दस्तारबंदी समारोह में वक्ताओं ने कहा कि दारुल इफ्ता का मुख्य उद्देश्य समाज को सही धार्मिक मार्गदर्शन प्रदान करना, आपसी सौहार्द बनाए रखना और शिक्षा के क्षेत्र में जागरूकता फैलाना है। उपस्थित लोगों ने मुफ़्ती आफ़ताब आलम साहब के उज्ज्वल भविष्य की कामना की और उम्मीद जताई कि उनके नेतृत्व में उन्नाव में धार्मिक एवं शैक्षिक गतिविधियां नई ऊंचाइयों को छुएंगी।

शहर के जानकारों का मानना है कि दारुल उलूम फैज़-ए-आम का दारुल इफ्ता पिछले कई दशकों से धार्मिक सेवाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

मुफ़्ती-ए-आज़म की यह नियुक्ति उसी परंपरा की एक नई कड़ी है, जो उन्नाव एवं आसपास के इलाकों में मार्गदर्शन और एकता का संदेश और अधिक प्रभावी ढंग से फैलाएगी। समारोह की दस्तारबंदी मुफ़्ती ज़ाहिद अली सलामी साहब ने की, जिससे कार्यक्रम की गरिमा और बढ़ गई।

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