मशहूर शायर डॉ. राहत इंदौरी की छठी बरसी पर ख़िराज-ए-अक़ीदत

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उर्दू के मक़बूल शाइर, नग़मा-निगार और मुशाइरों के हर दिल अज़ीज़ शख़्सियत जनाब डॉ. राहत इंदौरी की आज छठी बरसी है। राहत साहब का बेबाक लब-ओ-लहजा, उम्दा आवाज़ और इंक़लाबी अशआर ही उनकी पहचान होते थे। उनके शे’र गली, बाज़ार, सड़कों यहाँ तक कि पार्लियामेंट तक में सुनाई देते थे। उनका लहजा इंक़लाबी तो था ही, इसके साथ साथ उनके कलाम में भी ऐसा इंक़लाबी आहंग था कि उनके कलाम को पढ़ते ही क़ारी के दिल में इंक़लाबी जज़्बा उमड़ने लगता था। उनके इसी इंक़लाबी लब-ओ-लहजे ने उन्हें मौजूदा अदबी-ओ-शेरी मंज़रनामें में एक अलग शिनाख़्त अता की। वो हिंदी और उर्दू दोनों हलक़ों में और हिंदुस्तान के अलावा बैरूनी मुमालिक में भी बेहद मक़बूल थे। राहत इंदौरी के पढ़ने का अंदाज़ निराला था। शेर को बार बार दुहराकर पढ़ना और सामईन को लुत्फ़ से सरशार करना उनका ख़ास वस्फ़ था। यही वजह है कि उर्दू मुशाइरों में उनका जादू सर चढ़कर बोलता था और वो उर्दू मुशाइरों के बेताज बादशाह तसलीम किये जाते थे। उनकी शाइरी में आम इंसानी दुखों, पेचीदगियों और जज़्बात-ओ-अहसासात देखने को मिलता है। बीसवीं सदी के निस्फ़-ए-आख़िर और इक्कीसवीं सदी के उर्दू मुशाइरों की जो भी तारीख़ मुरत्तब की जाएगी, वो शाइर डॉ. राहत इंदौरी के बग़ैर अधूरी रहेगी। *कौमी फरमान* आज उन्हें याद करते हुए ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करती है….

 

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