काहिरा: मिस्र की मशहूर इस्लामी यूनिवर्सिटी और धार्मिक संस्था अल-अज़हर में पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ﷺ की पैदाइश की खुशी में जश्न का आयोजन किया गया। यह प्रोग्राम अल-अज़हर के ग्रैंड इमाम प्रो. अहमद अत-तैयब की सरपरस्ती में, क़ाहिरा की नोबल क़ुरआन रेडियो के सहयोग से हुआ। इसका मौज़ू था, “आपकी पाक सीरत… हमारी ज़िंदगी का रास्ता।”
इस मौके पर बड़ी तादाद में उलमा, समाजी शख्सियतें और आम लोग शामिल हुए। माहौल में पैग़म्बर-ए-इस्लाम ﷺ से मोहब्बत और अकीदत साफ नज़र आई।
मोहब्बत को अमल में बदलें
अल-अज़हर की इस्लामिक रिसर्च एकेडमी के सेक्रेटरी जनरल प्रो. मुहम्मद अल-जेंडी ने अपने खिताब में कहा कि पैग़म्बर ﷺ की पैदाइश की याद मनाने का सबसे बेहतरीन तरीका यह है कि हम उनसे अपनी मोहब्बत को अपने अमल में और उनकी तालीम को अपने किरदार में बदलें।
उन्होंने क़ुरआन की आयत का हवाला देते हुए कहा:
“और हमने आपको तमाम जहानों के लिए रहमत बनाकर ही भेजा है।”
(सूरह अल-अंबिया, 21:107)
उन्होंने कहा कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ﷺ की पूरी ज़िंदगी इंसानों के लिए रहमत, मोहब्बत और भलाई का नमूना थी। आपने कमज़ोरों, यतीमों और जरूरतमंदों का ख्याल रखा और माफ करने, नरमी बरतने और दूसरों के साथ भलाई करने की मिसाल कायम की।
रहमत सिर्फ इंसानों के लिए नहीं
प्रो. अल-जेंडी ने कहा कि रसूलुल्लाह ﷺ की रहमत सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं थी, बल्कि जानवरों और दूसरी मखलूक के लिए भी आपकी रहमत का दायरा बहुत बड़ा था।
उन्होंने उस मशहूर वाकये का जिक्र किया जिसमें एक ऊंट ने अपने मालिक की ज्यादती की शिकायत पैग़म्बर ﷺ से की। आपने उसके मालिक को नसीहत करते हुए फरमाया कि इस ऊंट के बारे में अल्लाह से डरो।
यह वाकया बताता है कि इस्लाम में रहम और मेहरबानी सिर्फ इंसानों के साथ अच्छे बर्ताव का नाम नहीं, बल्कि हर मखलूक के साथ भलाई का रास्ता है।
सीरत को ज़िंदगी का हिस्सा बनाएं
प्रो. अल-जेंडी ने कहा कि मुसलमान का पैग़म्बर ﷺ से रिश्ता हमेशा कायम रहता है। उन पर दरूद और सलाम भेजना, उनकी सीरत को याद करना, उनके अखलाक को अपनाना और उनकी सुन्नत पर चलना इसी रिश्ते को मजबूत करता है।
उन्होंने कहा कि नमाज़ में पढ़ा जाने वाला “अस्सलामु अलैका अय्युहन-नबिय्यु व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू” भी इस बात की याद दिलाता है कि पैग़म्बर ﷺ से मोहब्बत मुसलमान के दिल में हमेशा जिंदा रहती है।
उनके मुताबिक, मिलाद मनाने का सबसे अच्छा तरीका सिर्फ खुशी का इज़हार करना नहीं, बल्कि सीरत-ए-पाक को अपने किरदार और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उतारना है।
क़ुरआन और नात से रोशन हुआ माहौल
प्रोग्राम में क़ुरआन-ए-करीम की आयतों की खूबसूरत तिलावत की गई। इसके साथ दरूद, दुआओं और नात-ए-पाक पेश की गईं। पूरे प्रोग्राम में इबादत, मोहब्बत और रूहानी कैफियत का माहौल बना रहा।
अल-अज़हर की इस तकरीब का पैग़ाम सीधा और आसान था, पैग़म्बर ﷺ से मोहब्बत सिर्फ ज़ुबान से नहीं, बल्कि अपने अखलाक, अपने बर्ताव और इंसानों के साथ रहम व भलाई के जरिए भी दिखाई जानी चाहिए।
यही सीरत-ए-रसूल ﷺ का असल पैग़ाम है और यही आज की दुनिया में अमन, मोहब्बत और इंसानियत की सबसे बड़ी जरूरत भी है।
–क़ौमी फरमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

