(सलाम शेख)
मुंबई प्रेस क्लब में 80वें जश्ने-आज़ादी के मौके पर अदबी और सांस्कृतिक संस्था हर्फ़-ओ-आवाज़ फ़ाउंडेशन की ओर से ‘क़ौमी तराना और हम’ विषय पर एक खास कार्यक्रम आयोजित किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत फ़ैयाज़ फलाही की तिलावते कलाम पाक से हुई। इसके बाद हर्फ़-ओ-आवाज़ के सदर अय्यूब क़ुरैशी ने इस्तकबालिया कलाम पेश किया।
रोज़नामा हिंदुस्तान के एडिटर सरफ़राज़ आरज़ू ने क़ौमी तराना, क़ौमी गीत और महाराष्ट्र गीत के बारे में विस्तार से बात की और कहा कि इन गीतों के साथ मुल्क की यकजहती और भाईचारे का जज़्बा जुड़ा हुआ है।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता शमीम तारिक़ ने क़ौमी तराने और वंदे मातरम से जुड़े कई पहलुओं पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि ‘जन गण मन’ के रचनाकार रवींद्रनाथ टैगोर के सामने हिंदुस्तान की वह तस्वीर थी जिसमें अलग अलग दौर में आने वाले लोगों ने मिलकर इस मुल्क की संस्कृति और पहचान को बनाया।
उन्होंने वंदे मातरम को लेकर मुसलमानों के बीच पाई जाने वाली कुछ चिंताओं पर भी बात की। उनका कहना था कि मुसलमानों को बेवजह परेशान होने की जरूरत नहीं है और मुल्क में हर मज़हब और उसकी परंपराओं का सम्मान होना चाहिए।
शमीम तारिक़ ने यह भी बताया कि हिंदुस्तान के राष्ट्रीय झंडे में अशोक चक्र को शामिल करने का सुझाव सुरैया तैयबजी की ओर से दिया गया था। उन्होंने राष्ट्रीय प्रतीकों के इतिहास और उनके पीछे काम करने वाली सोच पर भी रोशनी डाली।
उन्होंने अपने भाषण में भारत की गंगा जमुनी तहज़ीब और अलग अलग मज़हबों के बीच आपसी सम्मान की जरूरत पर जोर दिया। उनका कहना था कि मुल्क की ताकत उसकी विविधता और आपसी भाईचारे में है।
इस मौके पर उर्दू अकादमी के एग्जीक्यूटिव ऑफिसर शोएब हाशमी ने भी क़ौमी एकता के बारे में संक्षेप में अपनी बात रखी।
कार्यक्रम की निज़ामत सैमा अनवर ने खूबसूरत अंदाज़ में की। उन्होंने अपनी शायरी और असरदार अशआर से महफ़िल को दिलचस्प बनाए रखा।
हर्फ़-ओ-आवाज़ फ़ाउंडेशन के सेक्रेटरी शाहनवाज़ ठाणे वाला ने मेहमानों का शाल पेश करके इस्तकबाल किया। आखिर में अब्दुलमतीन खान ने शुक्रिया अदा किया। कार्यक्रम का समापन जन गण मन के साथ हुआ।
कार्यक्रम में मुश्ताक़ परकार, मुशीर अंसारी, पत्रकार इम्तियाज़ शेख, आसिफ़ क़ुरैशी, प्रोफेसर जमील कामिल, मुस्तक़ीम मक्की और सूफ़िया थांगे समेत कई अदबी, इल्मी और सामाजिक शख्सियतों ने शिरकत की।
‘क़ौमी तराना और हम’ कार्यक्रम का बुनियादी पैग़ाम यही था कि आज़ादी का जश्न सिर्फ़ एक रस्म नहीं, बल्कि मुल्क की एकता, भाईचारे और एक दूसरे के मज़हब और तहज़ीब के सम्मान को मजबूत करने का मौका भी है।

