कुरआन: हिदायत भी, चेतावनी भी

Date:

अल्लाह तआला सूरह अल-जासिया, आयत 11 में फरमाता है:

هٰذَا هُدًى ۖ وَالَّذِينَ كَفَرُوا بِآيَاتِ رَبِّهِمْ لَهُمْ عَذَابٌ مِّنْ رِّجْزٍ أَلِيمٌ

 

आसान मतलब:

“यह कुरआन हिदायत है, और जिन्होंने अपने रब की आयतों का इनकार किया, उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है।”

यह आयत छोटी है, लेकिन इसमें इंसान की पूरी जिंदगी के लिए बहुत बड़ी बात छिपी हुई है।

यह हिदायत है” का मतलब क्या है?

इमाम इब्ने कसीर रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं कि “यह हुदा” से मुराद कुरआन है। यानी यह किताब इंसान को सही रास्ता दिखाती है और गुमराही से निकालती है।

इमाम तबरी रहमतुल्लाह अलैह इसकी और वाज़ेह तफसीर करते हैं। उनके मुताबिक कुरआन हक की पहचान कराने वाला बयान और दलील है और जो इसके मुताबिक चले और इसके बताए रास्ते पर अमल करे, वह सीधी राह की तरफ पहुंचता है।

यानी कुरआन सिर्फ यह नहीं बताता कि अल्लाह कौन है, बल्कि यह भी बताता है कि अल्लाह को मानने के बाद इंसान को कैसा इंसान बनना है।

सच क्या है?

झूठ क्या है?

हलाल क्या है?

हराम क्या है?

इंसाफ क्या है?

जुल्म क्या है?

मां-बाप का हक क्या है?

गरीब और यतीम का हक क्या है?

कारोबार कैसे करना है?

दूसरों के साथ कैसा बर्ताव करना है?

इन सब सवालों में कुरआन इंसान को रास्ता दिखाता है।

फिर “अज़ाब” की बात क्यों आई?

आयत का दूसरा हिस्सा बहुत गंभीर है:

और जिन्होंने अपने रब की आयतों का इनकार किया, उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है।”

यहां सिर्फ इतना नहीं कहा गया कि जिन्होंने आयतें नहीं पढ़ीं। बात है “कफ़रू बिआयाति रब्बिहिम”, यानी जिन्होंने अपने रब की आयतों को जान-बूझकर झुठलाया और उनका इनकार किया।

इमाम तबरी बताते हैं कि इससे उन लोगों की तरफ इशारा है जो कुरआन में मौजूद हक की निशानियों और दलीलों को झुठलाते हैं, उन पर ईमान नहीं लाते और उनके मुताबिक अमल नहीं करते।

यहां एक जरूरी बात समझनी चाहिए: किसी खास इंसान के बारे में खुद फैसला कर देना कि वह काफिर है और उसे अज़ाब मिलेगा, हमारा काम नहीं है। दिलों का हाल और अंतिम फैसला अल्लाह ही जानता है।

“रिज़्ज़िन अलीम” कितना सख्त लफ्ज़ है?

आयत के आखिर में “रिज़्ज़िन अलीम” आया है।

अलीम यानी बहुत दर्द देने वाला।

इब्ने कसीर रहमतुल्लाह अलैह इसकी तफसीर में इसे ऐसा अज़ाब बताते हैं जो तकलीफ देने वाला और दर्दनाक है।

यानी अल्लाह पहले इंसान को हिदायत देता है, समझाता है, निशानियां दिखाता है और सही रास्ता बताता है। लेकिन अगर कोई इंसान हक सामने आने के बाद भी उसे ठुकराता और झुठलाता है तो उसके लिए आखिरत में सख्त चेतावनी है।

इससे पहले की आयतें भी कुछ कह रही हैं

इस आयत को अकेले पढ़ने के बजाय इसके आसपास की आयतों को देखना ज्यादा बेहतर है।

सूरह जासिया की शुरुआती आयतों में अल्लाह इंसान को आसमान और जमीन, इंसान की पैदाइश, जानवरों और बारिश के निजाम में अपनी निशानियां देखने की दावत देता है।

फिर कुरआन की तरफ इशारा करके कहता है:

“यह हिदायत है।”

यानी ईमान सिर्फ आंख बंद करके मान लेने का नाम नहीं। अल्लाह इंसान को देखने, सोचने और समझने की भी दावत देता है।

यह बात कुरआन के दूसरे स्थान पर भी आती है:

“क्या वे कुरआन में गौर नहीं करते?”

(सूरह मुहम्मद 47:24)

इसलिए कुरआन से हमारा रिश्ता सिर्फ तिलावत तक सीमित नहीं होना चाहिए। तिलावत के साथ तदब्बुर, समझ और अमल भी जरूरी है।

नबी ﷺ ने भी कुरआन को जिंदगी बनाने वाली किताब बनाया

रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:

“तुममें सबसे बेहतर वह है जो कुरआन सीखे और उसे सिखाए।”

यह हदीस सहीह बुखारी में हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है।

गौर कीजिए, इसमें सिर्फ पढ़ने का जिक्र नहीं बल्कि सीखने और सिखाने की बात है।

और कुरआन की हिदायत का असल फायदा तभी है जब वह हमारे किरदार में दिखाई दे।

अगर कुरआन कहता है सच बोलो, तो हमारी जुबान सच्ची हो।

अगर कहता है नाप-तौल में कमी मत करो, तो हमारा कारोबार ईमानदार हो।

अगर कहता है जुल्म मत करो, तो ताकत मिलने पर भी हम किसी पर जुल्म न करें।

अगर कहता है मां-बाप के साथ अच्छा सुलूक करो, तो हमारा घर इसकी गवाही दे।

यही कुरआन की हिदायत का असल मतलब है।

बुजुर्गों की नजर में कुरआन

सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम और शुरुआती बुजुर्गों का कुरआन से रिश्ता सिर्फ याद करने तक नहीं था। वे आयत सीखते, उसका मतलब समझते और फिर उसके मुताबिक जिंदगी गुजारने की कोशिश करते थे।

इसी वजह से उनके लिए कुरआन किताब नहीं, जिंदगी का रास्ता था।

एक बहुत खूबसूरत बात यूं समझिए:

कुरआन को पढ़ने वाला कुरआन से सवाब लेता है,

कुरआन को समझने वाला रास्ता पाता है,

और कुरआन पर चलने वाला अपनी जिंदगी बदल देता है।

हमारे लिए सबसे बड़ा सबक

सूरह जासिया की आयत 11 हमें डराने के लिए ही नहीं, जगाने के लिए भी है।

अल्लाह ने पहले कहा:

“यह हिदायत है।”

यानी दरवाजा खुला है।

रास्ता सामने है।

रोशनी मौजूद है।

फिर चेतावनी दी:

जो इस हिदायत को जान-बूझकर ठुकराएगा, उसके लिए अज़ाब है।

इसलिए एक मुसलमान को इस आयत को पढ़कर सिर्फ दूसरों के बारे में नहीं सोचना चाहिए कि “कौन कुरआन को नहीं मानता?”

बल्कि खुद से पूछना चाहिए:

क्या मैं कुरआन को समझता हूं?

क्या मैं इसकी बात अपने घर में लागू करता हूं?

क्या मेरा कारोबार कुरआन की हिदायत के मुताबिक है?

क्या मेरे रिश्ते, मेरी जुबान और मेरा अखलाक कुरआन की गवाही देते हैं?

क्योंकि कुरआन हमारे हाथ में होना बड़ी नेमत है, लेकिन कुरआन का हमारे किरदार में उतर जाना उससे भी बड़ी नेमत है।

और यही इस आयत का सबसे खूबसूरत पैगाम है:

“कुरआन हिदायत है, उसे सिर्फ पढ़िए नहीं, उससे रास्ता भी लीजिए।”

क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_img

पॉपुलर

और देखे
और देखे

हादसा –पूल में डूबे दो मासूम, परिवार पर टूटा ग़म

गुजरात के आनंद ज़िले में उमेटा के पास मौजूद...

इंटीग्रल यूनिवर्सिटी में आज़ादी का जश्न

इंटीग्रल यूनिवर्सिटी, लखनऊ में देश का 80वां स्वतंत्रता दिवस...

मस्जिद परिचय: समझ और भाईचारे की एक खूबसूरत पहल

  (रईस ख़ान/शिब्ली रामपुरी) मुंबई में ऐतिहासिक जामा मस्जिद, क्रॉफर्ड...