राष्ट्रीय कार्यकारिणी में दो मुस्लिम चेहरों तारिक़ मंसूर और कुंवर बासित अली को किया गया शामिल

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सपा और कांग्रेस को चुनाव में शिकस्त देने के लिए भाजपा की बड़ी राजनीतिक रणनीति

                  (शिब्ली रामपुरी)
उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने बड़ी राजनीतिक रणनीति की तैयारी कर ली है और इसी रणनीति के तहत भारतीय जनता पार्टी ने दो मुस्लिम चेहरों को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह दी है. भाजपा ने डॉक्टर तारिक मंसूर और कुंवर बासित अली को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल किया है. माना जा रहा है कि भाजपा अगले साल होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट गई है और इसी के चलते उसने दो मुस्लिम चेहरों को प्रमुखता दी है. जानिए कौन है डॉक्टर तारिक मंसूर और बासित अली.

डॉ. तारिक मंसूर
बीजेपी ने डॉ. तारिक मंसूर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है. डॉ. तारिक मंसूर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के पूर्व कुलपति रह चुके हैं. बीजेपी ने उन्हें उत्तर प्रदेश विधान परिषद का सदस्य (MLC) मनोनीत किया था. मंसूर को पार्टी के भीतर बौद्धिक और प्रबुद्ध मुस्लिम चेहरे के रूप में देखा जाता है. वे पसमांदा मुस्लिम समुदाय के बीच बीजेपी की पहुंच को मजबूत करने और नीतियों को पहुंचाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं. अब पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय टीम में जगह देकर बड़ा संदेश दिया है.

कुंवर बासित अली
बीजेपी ने कुंवर बासित अली को अल्पसंख्यक मोर्चा का अध्यक्ष बनाया है. कुंवर बासित अली लंबे समय से जमीन पर सक्रिय रहे हैं और वे उत्तर प्रदेश बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष हैं. बासित अली जमीनी स्तर पर पार्टी की विभिन्न पहलों जैसे ‘कौमी चौपाल’, ‘मदरसों और दरगाहों में योग सत्र’, और ‘मोदी मित्र’ अभियानों का नेतृत्व करते आए हैं. नितिन नवीन के यूपी दौरे के दौरान मुस्लिम समाज और महिलाओं को जोड़ने की रणनीति की अगुवाई भी उन्होंने ही की थी.

राजनीति में गहरी जानकारी रखने वालों का मानना है कि जिस तरह से भाजपा ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी में उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले दो मुस्लिम चेहरों को अहमियत दी है उससे मुसलमानों को पार्टी से जोड़ने की ये एक कोशिश है. यूं तो उत्तर प्रदेश में मुस्लिम सबसे अधिक समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ नजर आते हैं लेकिन माना जा रहा है कि कई ऐसे मुद्दे हैं कि जिन पर इन दोनों पार्टियों की खामोशी और विशेष तौर पर आजम खान के मामले को लेकर कहीं ना कहीं इस समाज में नाराजगी भी है.

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