प्रतिरोध — न्यूयॉर्क में टकराईं ताकतें, गूंजी हक की आवाज़

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संयुक्त राष्ट्र में ईरान का तेवर, ग़ज़ा का दर्द और करबला की याद

(इमरान जैदी)

न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा का मंच इस समय सिर्फ भाषणों का मंच नहीं है। दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच बढ़ते तनाव, ईरान-अमेरिका टकराव, ग़ज़ा की तबाही और पश्चिम एशिया में लगातार बिगड़ते हालात ने इस बार की महासभा को बेहद संवेदनशील बना दिया है। 22 सितंबर से शुरू हुई 81वीं महासभा में दुनिया के नेता ऐसे समय जुटे हैं, जब संयुक्त राष्ट्र के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि युद्धों को रोका कैसे जाए और अंतरराष्ट्रीय कानून की बात को जमीन पर उतारा कैसे जाए।

इसी माहौल में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान न्यूयॉर्क पहुंचे हैं। उनके आने से पहले ही तेहरान का संदेश साफ था, ईरान बातचीत से पीछे नहीं हटेगा, लेकिन दबाव और धमकी को स्वीकार नहीं करेगा। पेज़ेश्कियान ने रवाना होने से पहले कहा कि बातचीत की मेज पर हुए समझौतों का बार-बार उल्लंघन हुआ है और ग़ज़ा, सीरिया, यमन और ईरान में आम नागरिकों की मौतों पर दुनिया को जवाब देना होगा।

सवाल सिर्फ ईरान का नहीं

ईरान की शिकायतों के बीच एक बड़ा सवाल ग़ज़ा का भी है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने 22 सितंबर को महासभा के उद्घाटन भाषण में कहा कि ग़ज़ा में बड़े पैमाने पर मौत और तबाही हुई है और मानवीय मदद जरूरत के मुकाबले बहुत कम रही है। उन्होंने साफ कहा कि लड़ाई रुकनी चाहिए, मानवीय सहायता पहुंचनी चाहिए और अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान होना चाहिए।

यही वह जगह है जहां ईरान की आवाज़ अपने समर्थकों के लिए सिर्फ ईरान की आवाज़ नहीं रह जाती। तेहरान ग़ज़ा और दूसरे इलाकों में आम लोगों की मौत को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की नाकामी से जोड़ता है। दूसरी ओर अमेरिका और इज़राइल ईरान की नीतियों और क्षेत्रीय गतिविधियों को सुरक्षा के नजरिए से देखते हैं। इसलिए न्यूयॉर्क में टकराव सिर्फ दो देशों के बीच नहीं, बल्कि दो बिल्कुल अलग राजनीतिक दावों के बीच भी दिखाई देता है।

ट्रम्प का जवाब

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 22 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र में ईरान को लेकर बेहद कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि अगर समझौता नहीं होता तो अमेरिका आगे भी सैन्य कार्रवाई कर सकता है और ईरान को लेकर बेहद सख्त चेतावनी दी। उसी दौरान ईरानी प्रतिनिधिमंडल के सदस्य उनके भाषण के दौरान बाहर चले गए।

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है। रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच पर्दे के पीछे बातचीत की कोशिशें जारी हैं। ईरान ने मध्यस्थों के जरिए 16 सितंबर को अमेरिका को एक प्रस्ताव भी भेजा था और ईरानी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि कूटनीति का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।

यानी मंच पर तल्खी है, मगर पर्दे के पीछे बातचीत की खिड़की अभी बंद नहीं हुई है।

करबला की याद क्यों आती है?

ईरान की राजनीति और सार्वजनिक जीवन में इस्लामी इतिहास, खासकर इमाम हुसैन और करबला की याद का गहरा असर रहा है। इसलिए जब ईरानी नेतृत्व दुनिया की बड़ी ताकतों के सामने दबाव न मानने और प्रतिरोध की बात करता है, तो उसके समर्थकों के बीच करबला के प्रतीक और हुसैनी जज़्बे की याद आना स्वाभाविक है।

करबला की सबसे बड़ी सीख सिर्फ तलवार और जंग नहीं थी। वह सवाल था, जब ताकतवर और कमजोर आमने-सामने हों, तो इंसान किसके साथ खड़ा होता है? हक के साथ या ताकत के साथ?

सैयदा ज़ैनब की भूमिका भी इसी वजह से याद की जाती है। करबला के बाद उन्होंने यज़ीद की सत्ता के सामने अपनी आवाज़ उठाई और उस घटना को इतिहास की याद से मिटने नहीं दिया। यही वजह है कि मुस्लिम समाज के बड़े हिस्से में सैयदा ज़ैनब को जुल्म के सामने बेखौफ आवाज़ की मिसाल माना जाता है।

आज की दुनिया, वही सवाल

आज न्यूयॉर्क में बैठे नेता आधुनिक हथियारों, मिसाइलों, प्रतिबंधों और कूटनीति की भाषा में बात कर रहे हैं। मगर जमीन पर सवाल बहुत पुराना है, आखिर आम इंसान की जान की कीमत क्या है?

ईरान अमेरिका पर समझौतों और अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी का आरोप लगाता है। अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बताता है। इज़राइल भी ईरान और उसके सहयोगी समूहों से सुरक्षा खतरे की बात करता है। दूसरी तरफ ग़ज़ा की मानवीय तबाही पर दुनिया भर में सवाल उठ रहे हैं। इन सभी दावों और आरोपों के बीच सबसे ज्यादा कीमत आम नागरिक चुका रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र से बाहर की दुनिया

संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भाषण खत्म हो जाएंगे। कैमरे बंद हो जाएंगे। नेता अपने देशों को लौट जाएंगे। लेकिन युद्धग्रस्त इलाकों में रहने वाले लोगों की जिंदगी इतनी आसानी से सामान्य नहीं होगी।

इसलिए इस बार न्यूयॉर्क की बहस का असली मतलब सिर्फ यह नहीं कि किस नेता ने किसे जवाब दिया। असली सवाल यह है कि क्या दुनिया की ताकतें अपनी ताकत को कानून, बातचीत और इंसानी जिंदगी की हिफाजत के लिए इस्तेमाल करेंगी?

संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष खलीलुर रहमान ने भी अपने उद्घाटन भाषण में यही सवाल उठाया कि लोग अब सिर्फ यह नहीं पूछ रहे कि संयुक्त राष्ट्र मौजूद है या नहीं, बल्कि यह पूछ रहे हैं कि क्या वह काम भी करता है?

यही सवाल न्यूयॉर्क की चमकती इमारतों से निकलकर ग़ज़ा, तेहरान और पश्चिम एशिया की गलियों तक पहुंचता है।

*कुर्सियां बदलती रहती हैं, ताकतें बदलती रहती हैं और समझौते भी बदल सकते हैं। लेकिन आम इंसान का दर्द, वह किसी कूटनीतिक बयान से खत्म नहीं होता।*

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