देश में पिछले एक दशक के दौरान सामने आए मॉब लिंचिंग और भीड़ की हिंसा के मामलों को दस्तावेज़ की शक्ल देने वाली किताब ‘Mob Lynching in India: A Record , 2014–2024’ का मंगलवार को नई दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में विमोचन किया गया। यह किताब एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स के तत्वावधान में सामने आई है। किताब का संपादन और संकलन डॉ. ज़फ़रुल-इस्लाम ख़ान ने किया है, जबकि इसका प्रकाशन फारोस ने किया है।
करीब एक दशक के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में सामने आए भीड़ की हिंसा और मॉब लिंचिंग के मामलों को एक जगह दर्ज करने वाली यह किताब घटनाओं के रिकॉर्ड के साथ-साथ उस दौर को समझने की कोशिश भी करती है, जिसमें ऐसी घटनाएं सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनीं।
दस्तावेज़ क्यों जरूरी
किताब के विमोचन के मौके पर शिक्षाविदों, वकीलों, शोधकर्ताओं, पत्रकारों और सिविल सोसाइटी से जुड़े लोगों ने हिस्सा लिया। वक्ताओं ने कहा कि हिंसा की घटनाएं समय बीतने के साथ अक्सर लोगों की याददाश्त से दूर हो जाती हैं। ऐसे में दस्तावेज़ीकरण किसी भी समाज के लिए उसके अतीत को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन जाता है।
कार्यक्रम में प्रोफेसर अपूर्वानंद, हर्ष मंदर, सैयदा हमीद, शाहीन नज़र, डॉ. ज़फ़रुल-इस्लाम ख़ान और मलिक मोअतसिम ख़ान ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन प्रशांत टंडन ने किया।
डर और राजनीति
प्रोफेसर अपूर्वानंद ने अपने संबोधन में कहा कि उनके अनुसार भीड़ की हिंसा के पीछे दो मकसद दिखाई देते हैं, मुसलमानों में डर पैदा करना और बड़ी संख्या में लोगों को अपराध की प्रक्रिया में शामिल कर ऐसी राजनीति के लिए जगह बनाना, जिसे वह हिंदुत्व की राजनीति के रूप में देखते हैं।
उनके बयान में मॉब लिंचिंग को सिर्फ अपराध की एक घटना के बजाय समाज और राजनीति पर असर डालने वाली प्रक्रिया के रूप में देखने की बात सामने आई।
‘प्रदर्शनी हिंसा’
सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने किताब को मौजूदा दौर का दस्तावेज़ बताया। उन्होंने कहा कि पिछले वर्षों में लिंचिंग जैसी घटनाओं ने समाज को गहराई से प्रभावित किया है।
उन्होंने मॉब लिंचिंग को ‘प्रदर्शनी हिंसा’ की संज्ञा दी। उनके मुताबिक, यह केवल हत्या नहीं बल्कि हिंसा का सार्वजनिक प्रदर्शन भी है, जिसके जरिए समाज में एक संदेश जाता है कि हिंसा करने वालों को जवाबदेही का सामना नहीं करना पड़ेगा।
इंसान को इंसान समझें
कार्यक्रम में सैयदा हमीद ने अपने दादा के शेरों को याद किया और देश में आपसी भाईचारे की जरूरत पर जोर दिया।
उन्होंने कहा,
«“तुम अगर चाहते हो मुल्क की खैर,
न किसी हमवतन को समझो गैर,
हों मुसलमान इसमें या हिंदू,
बौद्ध मजहब हो या कि हो ब्रह्मो,
सबको मीठी निगाह से देखो,
समझो आंखों की पुतलियां सबको।”»
सैयदा हमीद ने पत्रकारिता की भूमिका का भी जिक्र किया और कहा कि ऐसे समय में सच को सामने लाने वाली पत्रकारिता की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। उन्होंने कार्यक्रम में मौजूद पत्रकारों का आभार भी जताया।
याद रखने के लिए रिकॉर्ड
शाहीन नज़र ने कहा कि ऐसी घटनाओं का दस्तावेज़ीकरण इसलिए जरूरी है ताकि समाज उन्हें भूल न जाए। समय के साथ हालात बदल सकते हैं, लेकिन दस्तावेज़ अतीत की घटनाओं को याद रखने और उनसे सवाल करने का आधार देते हैं।
उन्होंने न्याय को लोकतांत्रिक समाज की बुनियादी जरूरत बताते हुए कहा कि न्याय के बिना कोई समाज टिकाऊ नहीं हो सकता। उन्होंने मौजूदा पत्रकारिता के स्तर पर भी चिंता जताई और कहा कि समाज को ऐसे दस्तावेज़ों को गंभीरता से लेना चाहिए तथा अपराधियों की जवाबदेही की मांग को मजबूत करना चाहिए।
छह-सात साल की मेहनत
किताब के संपादक डॉ. ज़फ़रुल-इस्लाम ख़ान ने बताया कि पुस्तक की तैयारी में करीब छह से सात साल का समय लगा। उन्होंने कहा कि बहुत-सी बड़ी घटनाएं इसलिए लोगों की याद से निकल जाती हैं क्योंकि उनका व्यवस्थित रिकॉर्ड मौजूद नहीं होता।
उनके अनुसार भीड़ की हिंसा कोई बिल्कुल नया सामाजिक घटनाक्रम नहीं है, लेकिन आज जिस तरह ऐसी घटनाओं को सामान्य स्थिति का हिस्सा मानने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, वह गंभीर चिंता का विषय है।
हिंसा से क्या सीख?
मलिक मोअतसिम ख़ान ने मॉब लिंचिंग की घटनाओं से मिलने वाले सबक पर बात की। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं यह सवाल खड़ा करती हैं कि समाज को बेहतर बनाने के नाम पर हिंसा करने वाले आखिर इंसानी जान की कीमत को किस तरह देखते हैं।
विमोचन कार्यक्रम के अंत में इस बात पर जोर दिया गया कि भीड़ की हिंसा जैसी घटनाओं की नियमित दस्तावेज़ीकरण, उन पर सार्वजनिक चर्चा और जवाबदेही की प्रक्रिया लोकतंत्र, न्याय और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए जरूरी है।
‘Mob Lynching in India: A Record- 2014–2024’ इसी कोशिश का एक दस्तावेज़ है, एक ऐसा रिकॉर्ड, जो 2014 से 2024 के बीच दर्ज घटनाओं को आने वाली पीढ़ियों के सामने रखने का प्रयास करता है।
–क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

