(रईस खान)
मुंबई के भायखला स्थित ऐतिहासिक ऑल इंडिया खिलाफत हाउस में सोमवार, 28 सितंबर को उस समय विवाद बढ़ गया, जब मजलिस के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व विधायक वारिस पठान अपने समर्थकों के साथ वहां पहुंचे और कार्यालय के दरवाजे पर ताला लगा दिया।
खिलाफत हाउस सिर्फ एक सामान्य कार्यालय नहीं है। यह 1919 में शुरू हुए खिलाफत आंदोलन से जुड़ी ऐतिहासिक संस्था है। मुंबई में यह जगह लंबे समय से ईद-ए-मिलाद के जुलूस और सामाजिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र रही है।
विवाद की पृष्ठभूमि क्या है?
खिलाफत कमेटी के कामकाज को लेकर पिछले कुछ समय से सवाल उठते रहे हैं। 2024 में ईद-ए-मिलाद के मुंबई के पहले जुलूस के इतिहास को लेकर भायखला पुलिस स्टेशन में शिकायत भी की गई थी। शिकायतकर्ता वरिष्ठ पत्रकार सईद हमीद का दावा था कि कमेटी जुलूस के इतिहास को गलत तरीके से पेश कर रही है। इसके जवाब में कमेटी के चेयरमैन सरफराज आरजू ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि खिलाफत आंदोलन और उससे जुड़े दस्तावेज मौजूद हैं और संस्था के पास अपने दावों के ऐतिहासिक प्रमाण हैं।
यानी इस मामले में इतिहास को लेकर दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं और इन्हें अंतिम तथ्य मानने से पहले मूल दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच जरूरी है।
वक्फ बोर्ड का नोटिस भी बना मुद्दा
विवाद का एक दूसरा पहलू महाराष्ट्र वक्फ बोर्ड से जुड़ा है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई के जिला वक्फ कार्यालय ने 16 सितंबर को ऑल इंडिया खिलाफत कमेटी को नोटिस जारी कर खातों, ऑडिट रिपोर्ट और वक्फ फंड से संबंधित जानकारी मांगी थी। नोटिस में संस्था को वक्फ बोर्ड के साथ पंजीकृत बताया गया और जवाब नहीं देने पर संबंधित कानून के तहत कार्रवाई की चेतावनी दी गई।
दूसरी ओर, कमेटी के चेयरमैन सरफराज आरजू ने वक्फ बोर्ड के अधिकार क्षेत्र पर ही सवाल उठाया है। उनका कहना है कि ऑल इंडिया खिलाफत कमेटी 1954 से चैरिटी कमिश्नर के पास पब्लिक ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत है और जिस जमीन पर संस्था है, वह जिला कलेक्टर की जमीन है। इसलिए उनके अनुसार इसे वक्फ ट्रस्ट नहीं माना जाना चाहिए। कमेटी ने यह भी कहा है कि नोटिस के बावजूद प्रस्तावित 120 बेड के अस्पताल का निर्माण प्रभावित नहीं हुआ है।
वारिस पठान का रुख
28 सितंबर की तालाबंदी के संबंध में अभी उपलब्ध रिपोर्ट में वारिस पठान की ओर से विस्तृत लिखित बयान प्रकाशित नहीं हुआ है। हालांकि, पिछले वर्षों में वह खिलाफत कमेटी की गतिविधियों से जुड़े कार्यक्रमों में शामिल रहे हैं। 2024 में भी वे खिलाफत हाउस से निकलने वाले ईद-ए-मिलाद कार्यक्रम में मौजूद थे।
इसलिए मौजूदा तालाबंदी को केवल किसी एक पुराने विवाद से जोड़ना जल्दबाजी होगी। वारिस पठान के वास्तविक आरोपों और मांगों को उनकी ओर से जारी आधिकारिक बयान या पूरे वीडियो के आधार पर ही स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाना उचित होगा।
असली सवाल क्या है?
मौजूदा विवाद में तीन अलग-अलग मुद्दे दिखाई देते हैं—संस्था का प्रशासन, उसका कानूनी दर्जा और खिलाफत हाउस से जुड़ा इतिहास। एक तरफ कमेटी अपने ट्रस्ट के दर्जे और ऐतिहासिक विरासत की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ उसके कामकाज और ऐतिहासिक दावों को लेकर सवाल उठाए गए हैं। अब वारिस पठान की तालाबंदी ने इस पुराने विवाद को फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वक्फ बोर्ड के नोटिस, ट्रस्ट के दस्तावेज, संस्था के पुराने रिकॉर्ड और दोनों पक्षों के आधिकारिक बयानों को सामने रखकर ही पूरे मामले की तस्वीर साफ हो सकती है। तालाबंदी के बाद पुलिस और प्रशासन की आगे की कार्रवाई भी इस विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगी।
–क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

