उत्तर प्रदेश चुनाव, ओवैसी की सियासी रणनीति, मुस्लिम नेतृत्व, उर्दू भाषा और संवैधानिक अधिकारों पर पत्रकारों व बुद्धिजीवियों ने की चर्चा
मुंबई। क़ौमी फ़रमान
देश में मुस्लिम समाज की राजनीतिक भागीदारी, चुनावी रणनीति और सामाजिक समस्याओं पर विचार-विमर्श के लिए गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को मुंबई में पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक अहम बैठक हुई। यह बैठक दक्षिण मुंबई की सांकली स्ट्रीट स्थित दारुल फैज़ टावर में जमात-ए-इस्लामी हिंद, महाराष्ट्र के कार्यालय में आयोजित की गई। करीब तीन घंटे चली इस बैठक में देश के मौजूदा हालात और मुस्लिम समाज के सामने मौजूद चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा हुई।
बैठक का मुख्य मुद्दा 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी की चुनावी रणनीति रहा। उत्तर प्रदेश में करीब 80 सीटों पर उम्मीदवार उतारने के उनके ऐलान के संभावित असर पर भी विचार किया गया।
मुस्लिम वोटों की एकजुटता पर चर्चा
बैठक में इस बात पर चिंता जताई गई कि उत्तर प्रदेश के कुछ विधानसभा क्षेत्रों में अलग-अलग राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से मुस्लिम वोट बंट सकते हैं। इससे चुनावी नतीजों पर क्या असर पड़ेगा, इस सवाल पर भी चर्चा हुई।
हालांकि, प्रतिभागियों का मानना था कि केवल आशंकाओं या भावनाओं के आधार पर किसी राजनीतिक दल की रणनीति का आकलन करना सही नहीं होगा। इसके लिए पिछले चुनावों के नतीजों, उम्मीदवारों को मिले वोटों, जीत-हार के अंतर और हर विधानसभा क्षेत्र की स्थानीय परिस्थितियों का अध्ययन जरूरी है।
बैठक में मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका पर भी विचार किया गया। वक्ताओं ने कहा कि चुनावी सभाओं में भीड़ जुटना और सोशल मीडिया पर लोकप्रियता होना अपने आप में चुनावी सफलता की गारंटी नहीं है। असली सवाल यह है कि यह लोकप्रियता कितने वोटों में बदलती है और किसी उम्मीदवार के चुनाव लड़ने से दूसरे दलों के उम्मीदवारों पर क्या असर पड़ता है।
साझा सलाहकार मंच बनाने का सुझाव
बैठक में पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षा से जुड़े लोगों और समुदाय के प्रतिनिधियों को साथ लाकर एक साझा सलाहकार मंच या प्रेशर ग्रुप बनाने का सुझाव दिया गया।
इसका मकसद समाज से जुड़े जरूरी मुद्दों पर लगातार चर्चा करना, राजनीतिक दलों के सामने समस्याओं को उठाना और जनहित से जुड़े मामलों में सामूहिक रूप से आवाज बुलंद करना बताया गया।
प्रतिभागियों ने इस बात पर भी जोर दिया कि मुस्लिम समाज की समस्याओं पर अलग-अलग स्तर पर होने वाली कोशिशों के बीच बेहतर तालमेल होना चाहिए। पत्रकारों, सामाजिक संगठनों और शिक्षाविदों के बीच संवाद बढ़ाकर इन मुद्दों पर ठोस पहल की जा सकती है।
शिक्षा, बेरोजगारी और संवैधानिक अधिकार भी मुद्दा
बैठक में राजनीतिक मुद्दों के साथ शिक्षा, बेरोजगारी, महिलाओं के अधिकार, उर्दू स्कूलों की स्थिति और मस्जिदों व मदरसों के कानूनी दस्तावेजों से जुड़े सवाल भी उठाए गए। मतदाता सूची के पुनरीक्षण और उसमें नाम दर्ज कराने जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई।
प्रतिभागियों ने कहा कि समाज की तरक्की के लिए केवल चुनावी राजनीति पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जागरूकता पर भी लगातार काम करने की जरूरत है। लोगों को अपने कानूनी और संवैधानिक अधिकारों की जानकारी देना भी जरूरी है, ताकि वे सरकारी योजनाओं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में अपनी भागीदारी बेहतर तरीके से निभा सकें।
उर्दू को नई पीढ़ी से जोड़ने पर जोर
उर्दू भाषा और साहित्य के संरक्षण का मुद्दा भी बैठक में प्रमुखता से उठा। प्रतिभागियों ने कहा कि उर्दू की तरक्की के लिए केवल भावनात्मक बातें करने के बजाय स्कूलों, पढ़ाई और सांस्कृतिक गतिविधियों को मजबूत बनाना होगा।
नई पीढ़ी को उर्दू साहित्य, किताबों और भाषा से जोड़ने के लिए ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने की जरूरत बताई गई, जिनमें युवाओं की दिलचस्पी हो। इसके लिए आधुनिक संचार माध्यमों और सोशल मीडिया का भी बेहतर इस्तेमाल करने पर जोर दिया गया।
दूसरे राज्यों के चुनावी अनुभवों पर भी चर्चा
बैठक में महाराष्ट्र, गुजरात और गोवा के चुनावी अनुभवों का भी उल्लेख किया गया। हालांकि, प्रतिभागियों ने कहा कि एक राज्य के चुनावी नतीजों को दूसरे राज्य पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। उत्तर प्रदेश की सामाजिक बनावट, स्थानीय राजनीतिक समीकरण और उम्मीदवारों की स्थिति को ध्यान में रखकर ही चुनावी रणनीति का आकलन किया जाना चाहिए।
बैठक में सुझाव दिया गया कि पिछले विधानसभा चुनावों के आंकड़ों का व्यवस्थित अध्ययन किया जाए। इसमें उम्मीदवारों को मिले वोट, जीत और हार का अंतर, अलग-अलग दलों का प्रदर्शन और क्षेत्रवार राजनीतिक रुझान शामिल हों। ऐसे अध्ययन से चुनावी रणनीति पर ज्यादा तथ्यपूर्ण और व्यावहारिक चर्चा की जा सकती है।
कई वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हुए शामिल
इस बैठक में वरिष्ठ पत्रकार सरफराज आरज़ू, जावेद जमालुद्दीन, आसिम जलाल, कुतुबुद्दीन शाहिद, फरहान हनीफ, मोहम्मद वजिहुद्दीन, फारूक अंसारी, मोहम्मद अकील, मुशीर अंसारी, निहाल सगीर, सलीम शेख, ग़ज़नफरुल्लाह, मुशर्रफ शम्सी और एजाज अंसारी सहित अन्य लोगों ने हिस्सा लिया।
बैठक में हुई चर्चा का मुख्य संदेश यह रहा कि मुस्लिम समाज से जुड़े राजनीतिक और सामाजिक सवालों पर गंभीर संवाद, तथ्यों के आधार पर आकलन और आपसी तालमेल की जरूरत है। चुनावी भागीदारी के साथ शिक्षा, भाषा, रोजगार और संवैधानिक अधिकारों जैसे मुद्दों पर भी लगातार काम करना जरूरी है।
–क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

