(रईस खान)
सर विलियम मार्क टली, जिन्हें दुनिया मार्क टली के नाम से जानती है, बीबीसी के वो मशहूर पत्रकार थे जिन्होंने भारत की बड़ी-बड़ी खबरों को दुनिया तक पहुंचाया। वो ९० साल की उम्र में २५ जनवरी २०२६ को नई दिल्ली के एक अस्पताल में चल बसे। उनकी जिंदगी भारत से इतनी जुड़ी हुई थी कि लोग उन्हें ‘भारत की आवाज़’ कहते थे। आज हम उनके पूरे सफर पर नज़र डालते हैं, खासकर १९९२ की बाबरी मस्जिद तबाही की घटना पर, जहां वो खुद गवाह बने और खतरे में पड़ गए।
मार्क टली का जन्म और शुरुआती दिन मार्क टली का जन्म २४ अक्टूबर १९३५ को कोलकाता के टॉलीगंज में हुआ था, जब भारत ब्रिटिश राज के नीचे था। उनके पिता एक ब्रिटिश व्यापारी थे। बचपन के पहले दस साल भारत में गुजरे, लेकिन अंग्रेज़ घराने में पले होने से हिंदुस्तानी लोगों से ज्यादा मिलना-जुलना नहीं हुआ। चार साल की उम्र में दार्जीलिंग के बोर्डिंग स्कूल भेज दिए गए, फिर नौ साल की उम्र में इंग्लैंड चले गए। वहां मार्लबोरो कॉलेज और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की, जहां धर्मशास्त्र पढ़ा। पहले वो चर्च ऑफ इंग्लैंड के पादरी बनना चाहते थे, लेकिन सेक्सुअलिटी पर शक होने से वो रास्ता छोड़ दिया।
बीबीसी में करियर
भारत की खबरों का सफर १९६४ में मार्क टली ने बीबीसी जॉइन किया और १९६५ में भारत लौट आए, जहां इंडिया करस्पॉन्डेंट बने। अगले ३० साल बीबीसी में गुजारे, जिसमें २० साल नई दिल्ली के ब्यूरो चीफ रहे। उन्होंने भारत की कई बड़ी घटनाओं को कवर किया, १९७१ का बांग्लादेश युद्ध, १९८४ का भोपाल गैस हादसा, ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या, और १९९२ की बाबरी मस्जिद की तबाही।
इमरजेंसी के दिनों में इंदिरा गांधी ने मीडिया पर पाबंदी लगाई, तो उन्हें भारत से बाहर कर दिया गया। उन्होंने १९९४ में बीबीसी से इस्तीफा दे दिया, क्योंकि वो बॉस जॉन बर्ट के तरीके से नाराज़ थे, कहते थे कि वो डर का माहौल बनाते हैं। इस्तीफे के बाद फ्रीलांस पत्रकार बने और किताबें लिखीं। हिंदी और इंग्लिश दोनों में माहिर थे, और रेडियो प्रोग्राम ‘समथिंग अंडरस्स्टुड’ चलाते रहे।
बाबरी मस्जिद तबाही
मार्क टली की आंखों देखी १९९२ की ६ दिसंबर को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई, और मार्क टली वहां मौजूद थे। वो ५ दिसंबर को पहुंचे थे। कारसेवकों में बीबीसी के खिलाफ गुस्सा था, क्योंकि बीबीसी ने एक पुरानी रायट की फुटेज इस्तेमाल की थी । अगले दिन, मस्जिद के पास एक इमारत से देखा कि १५०,००० की भीड़ ने पुलिस बैरियर तोड़ दिए। पुलिस वाले भाग गए, एक अफसर तो अपने आदमियों को धक्का देकर आगे निकला। भीड़ मस्जिद पर चढ़ गई, टेलीफोन तार उखाड़े, पत्रकारों को पीटा और कैमरे तोड़ दिए। मार्क टली अपनी कार में भागे और फैजाबाद के पोस्ट ऑफिस से लंदन को फोन पर रिपोर्ट दी, कहा कि मस्जिद गिराई जा रही है, पुलिस भाग गई, हालात काबू से बाहर।
वापस लौटे तो कार सेवकों ने घेर लिया। वो ‘मार्क टली को मौत’ के नारे लगा रहे थे। त्रिशूल से धमकाया, लेकिन जाना-पहचाना होने से पीटने से रुक गए। फिर उन्हें और उनके साथी कुरबान अली, गिलियन राइट को एक धर्मशाला में बंद कर दिया। बाहर भीड़ खून की प्यासी थी। एक लोकल अफसर, एसडीएम ने मदद की, एक महंत, मंदिर प्रमुख ने रेस्क्यू कराया। महंत ने मार्क को अपनी शॉल में छिपाया और सबको राम जन्मभूमि कर सेवक का बैंड पहनाया, ताकि छिपकर निकल सकें। मार्क टली नहीं मिले, लेकिन उनके चक्कर में कई विदेशी पत्रकार पिट गए, जिनमें दो महिलाएं भी थीं। इस घटना ने भारत की सेकुलरिज्म पर बड़ा सवाल उठाया, और दंगों में सैकड़ों लोग मारे गए।
किताबें और सम्मान
मार्क टली ने कई किताबें लिखीं। जिनमें ‘अमृतसर: मिसेज गांधीज लास्ट बैटल’ (ऑपरेशन ब्लू स्टार पर), ‘नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया’ (भारत पर निबंध), ‘इंडियाज अनएंडिंग जर्नी’ वगैरह। अवॉर्ड्स में ओबीई (१९८५), पद्म श्री (१९९२), नाइटहुड (२००२), पद्म भूषण (२००५) और बाफ्टा लाइफटाइम अचीवमेंट शामिल हैं।
मार्क टली की मौत से भारत ने एक दोस्त खो दिया, जो यहां की विविधता और धर्मों की एकता पर यकीन रखते थे। उनकी याद में, बीबीसी ने कहा कि वो युद्ध, अकाल, दंगे और हादसों को कवर करते रहे, लेकिन भारत से मोहब्बत कभी कम नहीं हुई।

