असदुद्दीन ओवैसी पर आरोप: राजनीतिक आलोचना या मुस्लिम लीडरशिप को चुनौती 

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 (रईस खान)

हाल ही में मुस्लिम पत्रकारों की एक बैठक में वर्तमान राजनीतिक हालात पर चर्चा के दौरान अधिकांश पत्रकारों ने असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) को लेकर सवाल उठाए। यह चर्चा ऐसे समय में हो रही है जब मजलिस महाराष्ट्र नगर निगम चुनावों में उल्लेखनीय सफलता हासिल कर चुकी है, लेकिन ओवैसी पर पुराने आरोप फिर से उछाले जा रहे हैं। इनमें मुख्य रूप से उन्हें भारतीय जनता पार्टी की ‘बी-टीम’ बताना, सांप्रदायिकता फैलाने का इल्जाम और केवल मुस्लिम राजनीति करने का दावा शामिल है। सवाल यह उठता है कि क्या ये आरोप वास्तविक राजनीतिक विश्लेषण हैं या मुस्लिम समुदाय में स्वतंत्र नेतृत्व के उभरने से पैदा हुई असहजता का नतीजा?

मुस्लिम मुद्दे उठाना सांप्रदायिकता कब से?

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में हर समुदाय को अपनी राजनीति करने का अधिकार है। यदि कोई पार्टी किसानों के मुद्दे उठाती है तो उसे ‘किसान राजनीति’ कहा जाता है, दलितों के लिए आवाज उठाने वाली को ‘दलित राजनीति’। लेकिन जब मुस्लिम मुद्दों पर बात होती है तो इसे ‘सांप्रदायिक राजनीति’ का नाम दे दिया जाता है। ओवैसी ने खुद कई बार इन आरोपों का जवाब दिया है। एक हालिया इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “बीजेपी सत्ता में है क्योंकि विपक्ष नाकाम रहा है। वे हिंदू वोटों को मजबूत कर रहे हैं, इसमें मेरी क्या गलती?” नागरिकता संशोधन कानून , राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर , मॉब लिंचिंग, बुलडोजर पॉलिटिक्स और वक्फ संपत्तियों जैसे मुद्दों को उठाना क्या सांप्रदायिकता है? ये मुद्दे मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय से जुड़े हैं, लेकिन इन्हें उठाने का अधिकार किसी से छीना नहीं जा सकता।

संसद से सड़क तक: ओवैसी की राजनीति का दायरा

असदुद्दीन ओवैसी की राजनीति केवल मुस्लिम मुद्दों तक सीमित नहीं है। संसद में उन्होंने मॉब लिंचिंग पर कानून की मांग की, दलितों और आदिवासियों पर अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई, पिछड़ों के आरक्षण पर बहस की, नोटबंदी और बेरोजगारी पर सरकार को घेरा। हाल ही में महाराष्ट्र के परभानी में एक जनसभा में ओवैसी ने कहा, “कांग्रेस हमें बीजेपी की बी-टीम कहती है, लेकिन 2019 में UAPA संशोधन पर कांग्रेस ने ही बीजेपी का साथ दिया। हमने विरोध किया।” यदि यह ‘केवल मुस्लिम राजनीति’ है, तो सामाजिक न्याय की राजनीति क्या है? ओवैसी की पार्टी मजलिस ने तेलंगाना, महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश में दलित और पिछड़े वर्ग के उम्मीदवारों को टिकट दिए हैं, जो बहुजन राजनीति की दिशा में कदम है।

मुस्लिमों का कोई राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं” , लेकिन जब उभरता है तो?

अक्सर कहा जाता है कि मुस्लिम समुदाय में राष्ट्रीय स्तर का नेतृत्व नहीं है। लेकिन जब कोई स्वतंत्र नेतृत्व उभरता है, तो उस पर देश तोड़ने, बीजेपी को फायदा पहुंचाने या सेक्युलर वोट काटने के आरोप लगने लगते हैं। ओवैसी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “ये आरोप इसलिए लगाए जाते हैं क्योंकि हम स्वतंत्र हैं, नियंत्रित नहीं।” समस्या नेतृत्व की कमी में नहीं, बल्कि उसके उभरने में है, क्योंकि यह कुछ पार्टियों के वोट बैंक को चुनौती देता है।

महाराष्ट्र और मुंबई मनपा: मजलिस की जीत का मतलब

महाराष्ट्र नगर निगम चुनावों में मजलिस ने 125 सीटें जीतीं, जो मुस्लिम समुदाय की लोकतांत्रिक जागरूकता और हाशिए वाले तबकों की राजनीतिक भागीदारी का प्रतीक है। ओवैसी ने इसे ग्रास रूट मोबिलाइजेशन का नतीजा बताया। यदि कांग्रेस या एनसीपी हारती है, तो क्या मजलिस को राजनीति छोड़ देनी चाहिए? लोकतंत्र में सभी पार्टियों को जीतने का समान अधिकार है।

बीजेपी की बी-टीम” आरोप: कितना जायज?

ओवैसी को बीजेपी की बी-टीम कहना एक सरल लेकिन सतही विश्लेषण है। संसद में ओवैसी ने CAA, NRC, हिजाब, मस्जिद और मॉब लिंचिंग जैसे मुद्दों पर बीजेपी को सबसे ज्यादा चुनौती दी है। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “मैं किसी की बी-टीम नहीं हूं। मैं पार्टी चलाता हूं, एनजीओ नहीं।” बिहार चुनावों में मजलिस की सफलता के बाद राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस ने आरोप लगाए, लेकिन ओवैसी ने जवाब दिया कि विपक्ष की कमजोरी से बीजेपी जीत रही है। यह आरोप मुस्लिम वोटर्स को डराने की रणनीति है, ताकि वे स्वतंत्र विकल्प न चुनें।

दलित और पिछड़ों की राजनीति में मजलिस की भूमिका

मजलिस केवल मुस्लिम राजनीति तक सीमित नहीं। पार्टी ने दलित उम्मीदवार उतारे और पिछड़े वर्ग के नेताओं को मौका दिया। बिहार में मजलिस ने पांच सीटें जीतीं, जहां सभी मुस्लिम उम्मीदवारों को हराकर जीत हासिल की, लेकिन यह मुस्लिम नेतृत्व को मजबूत करने का प्रयास था। यदि यह ‘मुस्लिम राजनीति’ है, तो बहुजन राजनीति क्या है?

लोकतंत्र का तकाजा: सबको राजनीति का अधिकार

लोकतंत्र में हर विचारधारा को राजनीति करने का हक है। यदि कांग्रेस या समाजवादी पार्टी हारती है, तो अन्य पार्टियों को राजनीति छोड़ने की जरूरत नहीं। ओवैसी और मजलिस का राजनीतिक अस्तित्व उतना ही वैध है जितना किसी अन्य पार्टी का।

समस्या ओवैसी नहीं, स्वतंत्र मुस्लिम राजनीति का उभरना है 

असल समस्या असदुद्दीन ओवैसी में नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय के स्वतंत्र राजनीतिक पहचान में है। यह कुछ सेक्युलर और हिंदुत्ववादी खेमों को असहज करता है। ओवैसी की आलोचना होनी चाहिए, लेकिन तथ्यों पर आधारित, न कि साजिशों पर। क्योंकि लोकतंत्र में नेतृत्व से डरना सबसे खतरनाक है। मुस्लिम पत्रकारों की बैठक जैसे मंचों पर ऐसी चर्चाएं जारी रहनी चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आए।

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