भारत-यूएई समझौते से गिफ्ट सिटी में खुलेगा फर्स्ट अबू धाबी बैंक, क्या यह इस्लामिक बैंकिंग की शुरुआत है?

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 (रईस खान)

भारत और यूएई के बीच हुए समझौते से गुजरात के गिफ्ट सिटी में फर्स्ट अबू धाबी बैंक खुलेगा। क्या यह भारत में इस्लामिक बैंकिंग की शुरुआत है? खबर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मुलाकात के बाद दोनों देशों ने कई बड़े करार किए हैं। इनमें यूएई की कंपनियों को भारत में काम बढ़ाने की इजाजत दी गई है। फर्स्ट अबू धाबी बैंक और डीपी वर्ल्ड को गिफ्ट सिटी में दफ्तर खोलने की मंजूरी मिली है। यह कदम दोनों देशों के व्यापार को 2032 तक 200 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखता है।

समझौते की मुख्य बात यह है कि फर्स्ट अबू धाबी बैंक यूएई का सबसे बड़ा बैंक है और वह गिफ्ट सिटी में अपनी पहली शाखा खोलेगा। इसका काम व्यापार और निवेश को बढ़ाना होगा। गिफ्ट सिटी भारत का अंतरराष्ट्रीय वित्त केंद्र है जहां पहले से कई बैंक और कंपनियां काम कर रही हैं। डीपी वर्ल्ड कंपनी जहाजों और बंदरगाहों का काम करती है और गिफ्ट सिटी से वह दुनिया भर में जहाजों का किराया देगी। इसके अलावा दोनों देशों ने ऊर्जा, रक्षा, अंतरिक्ष, एआई और परमाणु तकनीक में साथ काम करने पर सहमति जताई है।

भारत और यूएई का व्यापार पहले से ही 100 अरब डॉलर से ज्यादा है। अब सवाल है कि क्या फर्स्ट अबू धाबी बैंक एक इस्लामिक बैंक है? इसे फर्स्ट अबू धाबी बैंक इस्लामिक कहकर फैलाया जा रहा है लेकिन यह पूरी तरह ठीक नहीं है। यह बैंक यूएई का सामान्य बैंक है जो सामान्य और इस्लामिक दोनों तरह की सेवाएं देता है। इसकी एक अलग हिस्सा इस्लामिक है जो शरिया के नियमों से चलता है लेकिन पूरा बैंक सिर्फ शरिया पर नहीं चलता।

समझौते में इसे सामान्य बैंक के तौर पर ही बताया गया है न कि सिर्फ इस्लामिक बैंकिंग के लिए। भारत में इस्लामिक बैंकिंग की इजाजत नहीं है क्योंकि यहां के बैंकिंग कानून ब्याज पर आधारित हैं जबकि शरिया में ब्याज की मनाही है। आरबीआई ने 2016-17 में इस पर सोचा था लेकिन अभी तक कोई पूरा इस्लामिक बैंक नहीं खुला। गिफ्ट सिटी में यह शाखा व्यापार बढ़ाएगी लेकिन पूरी तरह शरिया पर नहीं चलेगी।

आगे देखें तो यह करार भारत की अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद है। गिफ्ट सिटी में विदेशी बैंकों से नौकरियां बढ़ेंगी और पैसा आएगा। लेकिन इस्लामिक बैंकिंग पर चर्चा जारी रहेगी। सरकार कहती है कि यह धार्मिक नहीं बल्कि आर्थिक फैसला है। जानकार सलाह देते हैं कि ऐसे मुद्दों पर राजनीति से ऊपर सोचें ताकि देश की प्रगति न रुके।

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