(रईस खान )
ईरान के हार्मोजगान प्रांत के मिनाब शहर में लड़कियों के स्कूल पर हुए खौफनाक हमले के नए राज खुलने से अमेरिका के लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। यह हमला 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल की संयुक्त कार्रवाई ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ का हिस्सा था, जिसमें दर्जनों मासूम बच्चियां शहीद हो गईं। पहले तो पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे ईरानी सरकार का ‘गलत निशाना’ बताया था, लेकिन अब खुफिया रिपोर्टों से साबित हो गया है कि अमेरिकी हवाई हमले ही जिम्मेदार थे। इससे अमेरिकी अवाम में जबरदस्त रोष फैल गया है, और लोग ट्रंप को ‘बच्चों का कातिल’ कहकर उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।
यह मामला 28 फरवरी को तब सुर्खियों में आया जब अमेरिका-इजरायल ने ईरान पर ‘प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक्स’ किए। पेंटागॉन ने इसे ‘एपिक फ्यूरी’ नाम दिया, जबकि इजरायल ने ‘रोरिंग लायन’ कहा। हमले का मकसद ईरान की परमाणु सुविधाओं और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना था, लेकिन एक प्राइमरी गर्ल्स स्कूल पर बम गिर गया। ईरानी मीडिया के मुताबिक, स्कूल में क्लास चल रही थी जब मिसाइलें गिरीं, और 7 से 12 साल की 50 से ज्यादा बच्चियां मारी गईं। बाद की रिपोर्टों में मरने वालों की तादाद 175 से ऊपर पहुंच गई, जिसमें ज्यादातर मासूम लड़कियां शामिल थीं। ईरानी अधिकारियों ने इसे ‘जंग के बहाने नरसंहार’ करार दिया, जबकि ट्रंप ने एयर फोर्स वन से कहा कि ‘ईरान की मिसाइलें इतनी लापरवाह हैं कि खुद अपना स्कूल बर्बाद कर दिया।’
लेकिन 6 मार्च को नेशनल ब्रॉडकास्टिंग कंपनी की रिपोर्ट ने सब कुछ उलट-पुलट कर दिया। बंद कमरों में कांग्रेस को दी गई ब्रिफिंग में ट्रंप के अधिकारियों ने कबूल किया कि अमेरिकी हमला ही स्कूल पर गिरा था। फ्रांस 24 की जांच ने भी पुष्टि की कि यूएस जिम्मेदार है। इससे अमेरिका में तूफान आ गया। वाशिंगटन, न्यूयॉर्क और लॉस एंजिल्स की सड़कों पर हजारों लोग उतर आए, जिनके नारे थे- ‘ट्रंप मर्डरर!’, ‘नो वॉर फॉर ऑयल!’ और ‘चिल्ड्रन आर नॉट टारगेट्स!’। डेमोक्रेट नेता हैरी सिसन ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘ट्रंप ने बच्चों को बमों से उड़ाया और अब बहाना बना रहे हैं। यह शर्मनाक है।’
सोशल मीडिया पर भी गुस्सा फूट पड़ा। एक यूजर ने लिखा, ‘ट्रंप ने ‘महिलाओं को आजाद’ करने के नाम पर स्कूल पर बम गिराया। क्या यह आजादी है? फक ऑफ!’ दूसरे ने कहा, ‘यह ट्रंप का अंत है। 40 मासूम लड़कियां मरीं, क्या तुम्हें गर्व है?’ ब्रिटिश यूनियन लीडर हॉवर्ड बेकेट ने ट्वीट किया, ‘ट्रंप और नेतन्याहू ने 115 बच्चों का कत्ल किया। तेहरान में लोग चिल्ला रहे हैं- डेथ टू अमेरिका!’ अमेरिकी कंजर्वेटिव यूनियन के चेयरमैन मैट श्लैप के बयान ने आग में घी डाला, जब उन्होंने कहा कि ‘ये लड़कियां बुर्के में जिंदा रहने से बेहतर मर गईं।’ इससे प्रोटेस्ट और तेज हो गए।
ट्रंप प्रशासन पर इम्पीचमेंट की मांग तेज हो गई है। डेमोक्रेट्स कह रहे हैं कि यह बिना कांग्रेस की मंजूरी के जंग है, जो संविधान का उल्लंघन है। ईरान में सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या भी इसी ऑपरेशन में हुई, जिससे मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह हमला ईरान की अर्थव्यवस्था और विरोध प्रदर्शनों को दबाने का बहाना था, लेकिन अब अमेरिका खुद आग के मुंह में है।
अमेरिकी अवाम का गुस्सा साफ बयान दे रहा है- जंग के नाम पर बच्चों का खून बहाना बर्दाश्त नहीं। ट्रंप की ‘नो न्यू वॉर्स’ वाली बात अब झूठी साबित हो गई। क्या यह प्रोटेस्ट ट्रंप सरकार को गिरा देंगे? आने वाले दिन बताएंगे। फिलहाल, मिनाब की शहीद बच्चियों की चीखें अमेरिकी सियासत को हिला रही हैं।

