मालेगांव 2006 फैसला- जांच, सियासत और भरोसे का इम्तिहान

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(रईस खान)
साल 2006 में मालेगांव में हुआ बम धमाका आज भी लोगों के ज़ेहन में ज़िंदा है। इस हादसे में 37 बेगुनाह लोगों की जान गई और पूरा मुल्क सदमे में आ गया। लंबे अरसे तक चली जांच और अदालत की कार्यवाही के बाद जो फैसला सामने आया, उसने सिर्फ आरोपियों को राहत नहीं दी बल्कि जांच तंत्र, सियासी माहौल और इंसाफ़ के निज़ाम पर भी कई अहम सवाल खड़े कर दिए।

इस केस की शुरुआत महाराष्ट्र एटीएस की जांच से हुई, जिसकी कमान उस वक्त हेमंत करकरे के हाथ में थी। करकरे और उनकी टीम ने जांच के दौरान कुछ ऐसे नामों और संगठनों तक पहुंचने की कोशिश की, जिन्हें आमतौर पर पहले ऐसे मामलों से नहीं जोड़ा जाता था। यही वजह है कि यह केस शुरू से ही बहस और विवाद के घेरे में रहा।

आज जब अदालत ने यह कहा कि आरोप साबित करने के लिए पुख्ता सबूत मौजूद नहीं हैं और आरोपी कानूनी तौर पर बरी होते हैं, तो यह एक सीधा कानूनी फैसला है। अदालत का काम वही था जो उसने किया, जो सबूत सामने आए, उन्हीं के आधार पर फैसला देना। गवाही में कमी, सबूतों की कमजोर कड़ी और जांच की खामियां, इन सबने मिलकर केस को इतना कमजोर बना दिया कि अदालत के मुताबिक सज़ा देना मुमकिन नहीं रहा।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। समाज में एक बड़ा तबका यह सवाल भी उठा रहा है कि क्या जांच की दिशा समय के साथ बदली। क्या जिन लोगों और संगठनों के खिलाफ शुरू में सबूत जुटाए गए थे, उनके प्रति बाद में रुख नरम हो गया। यह भी कहा जा रहा है कि जब सियासी हालात बदले और ऐसी ताकतें सत्ता में आईं जिन पर कभी उंगली उठी थी, तो जांच एजेंसियों पर दबाव पड़ा और केस की धार कुंद हो गई।

ये इल्ज़ाम बेहद संगीन हैं, मगर यह भी सच है कि अदालत ने अपने फैसले में ऐसी किसी सियासी साजिश की पुष्टि नहीं की। कोर्ट ने सिर्फ इतना कहा कि जो सबूत पेश किए गए, वो कानूनी कसौटी पर खरे नहीं उतरे।

इसी बहस के बीच एस एम मुशरिफ की किताब ‘ हू किल्ड करकरे ?’ का भी जिक्र बार-बार आता है। इस किताब में कई ऐसे दावे किए गए हैं जो आधिकारिक जांच से अलग कहानी पेश करते हैं। हालांकि ये दावे अदालत में साबित नहीं हुए हैं, लेकिन यह जरूर दिखाते हैं कि समाज के एक हिस्से में शक और बेचैनी कितनी गहरी है।

असल मसला यह है कि जब किसी केस में जांच बार-बार दिशा बदले, गवाह अपने बयान से पलट जाएं और सबूत अदालत में टिक न पाएं, तो लोगों का भरोसा हिलना लाज़मी है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आरोपी बरी क्यों हुए, बल्कि यह भी है कि असली गुनहगार कौन हैं और क्या वे कभी कानून के दायरे में आएंगे।

यह फैसला हमें एक अहम सबक भी देता है। भले अदालत ने कानून के उसूलों को निभाया है। लेकिन इसके साथ ही यह जिम्मेदारी जांच एजेंसियों पर आती है कि वे अपने काम को और ज्यादा पेशेवर, साफ और मजबूत और निष्पक्ष बनाएं, ताकि भविष्य में ऐसे मामलों में सच्चाई तक पहुंचना आसान हो मजलूमों को इंसाफ मिल सके।

मालेगांव 2006 का यह फैसला एक तरह से हमारे सिस्टम का आईना है। इसमें अदालत ने अपना काम किया, मगर जांच और सियासत को लेकर जो सवाल उठे हैं, उनके जवाब अभी भी बाकी हैं। जब तक इन सवालों का साफ और भरोसेमंद जवाब नहीं मिलता, तब तक यह मामला सिर्फ एक कानूनी फाइल नहीं, बल्कि एक अधूरी कहानी बना रहेगा।

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