(रईस खान)
शामली की कहानी में सच आखिर किसके पास है?
“मैं 12 साल पहले ही मुस्लिम बन चुका था।”
यह दावा उस युवक का है जिसे पिछले कुछ दिनों से देश का एक हिस्सा “ब्रेनवॉश का शिकार” बता रहा है। दूसरी तरफ उसका परिवार कह रहा है कि बेटे को एक सुनियोजित जाल में फंसाया गया, उसका धर्म बदला गया और उसे परिवार से दूर कर दिया गया।
शामली की यह कहानी केवल आयुष मलिक और चांदनी कुरैशी की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी भी है जहां प्रेम, मजहब और पहचान जब एक ही फ्रेम में आ जाते हैं तो सच्चाई अक्सर शोर में दब जाती है।
टीवी स्क्रीन पर हेडलाइन चमकती है, “मायाजाल”, “ब्रेनवॉश”, “निकाह ट्रैप”, “साजिश”।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हर अंतरधार्मिक रिश्ता किसी षड्यंत्र की पैदाइश होता है? या फिर हम पहले फैसला कर लेते हैं और बाद में सबूत तलाशते हैं? दो कहानियां, दो दावे।एफआईआर की कहानी अलग है।
परिवार का आरोप है कि आयुष की मुलाकात एक जिम ट्रेनर से हुई, रिश्ता बढ़ा, धर्म परिवर्तन हुआ और फिर निकाह कराया गया। पुलिस ने इन्हीं आरोपों के आधार पर मुकदमा दर्ज किया और गिरफ्तारियां कीं।
लेकिन दूसरी कहानी खुद आयुष की है।मीडिया से बातचीत में उसने कहा, “मैं मुस्लिम हूं” और यह भी दावा किया कि उसने वर्षों पहले अपनी मर्जी से इस्लाम अपनाया था। उसने चांदनी की गिरफ्तारी पर भी एतराज जताया।
यानी इस मुकदमे का सबसे अहम किरदार खुद उस नैरेटिव से इत्तेफाक नहीं रखता जो उसके बारे में गढ़ा जा रहा है। यहीं से पत्रकारिता शुरू होती है।
क्या मोहब्बत इंसान को बदल देती है? इस सवाल का जवाब शायद हर इंसान जानता है। मोहब्बत में लोग शहर बदल देते हैं।करियर बदल देते हैं।खान-पान बदल देते हैं। परिवार से लड़ जाते हैं। कई बार धर्म भी बदल लेते हैं। लेकिन यही पूरी सच्चाई नहीं है।
इतिहास यह भी बताता है कि प्रेम के नाम पर धोखे हुए हैं, दबाव डाला गया है, पहचान छुपाई गई है और लोगों का शोषण भी हुआ है।
इसलिए हर धर्मांतरण को “इश्क़ की जीत” कहना उतना ही गलत है जितना हर धर्मांतरण को “ब्रेनवॉश” कह देना।
अदालतें बार-बार क्या कहती हैं? भारतीय अदालतों ने कई मामलों में यह सिद्धांत दोहराया है कि बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने और अपने विश्वास के अनुसार जीवन जीने का अधिकार है। अदालतों का जोर आमतौर पर इस बात पर रहता है कि फैसला स्वतंत्र इच्छा से लिया गया है या दबाव में।
यानी कानून का असली सवाल हिंदू या मुस्लिम नहीं है।सवाल है, रजामंदी थी या नहीं? धोखा था या नहीं? दबाव था या नहीं?
मीडिया की अदालत क्या करती है? शामली की कहानी में एक दिलचस्प बात और है। जैसे ही तस्वीरें वायरल हुईं, सोशल मीडिया दो खेमों में बंट गया। एक पक्ष कह रहा था कि यह सुनियोजित धर्मांतरण का मामला है।
दूसरा पक्ष पूछ रहा था कि अगर संबंधित व्यक्ति खुद कह रहा है कि उसने अपनी मर्जी से फैसला लिया, तो फिर उसे पीड़ित क्यों माना जा रहा है?
यही हमारे दौर की सबसे बड़ी मुश्किल है। हम अक्सर इंसान को नहीं देखते। हम केवल उसकी धार्मिक पहचान देखते हैं। अगर धर्म बदलकर हमारे समूह में आया है तो “सत्य की खोज”।अगर हमारे समूह से गया है तो “ब्रेनवॉश”।
शायद शामली की इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल चांदनी या आयुष नहीं हैं। सवाल हम हैं। क्या हम अपने बच्चों को इतना समझदार मानते हैं कि वे अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले सकें?
या हम केवल वही फैसले स्वीकार करते हैं जो हमारी सामाजिक और धार्मिक पसंद से मेल खाते हों?
इस सवाल का जवाब अदालत दे सकती है, पुलिस जांच दे सकती है, लेकिन समाज को भी कभी न कभी देना पड़ेगा।
क्योंकि हर प्रेम कहानी साजिश नहीं होती। और हर प्रेम कहानी मासूम भी नहीं होती। सच्चाई अक्सर इन दोनों के बीच कहीं खड़ी होती है, शोर से दूर, कैमरों से दूर और हेडलाइनों से बहुत दूर।

