मुंबई(रईस खान/शिब्ली रामपुरी)महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में हाल ही में एक ऐसी बैठक हुई, जिसने मुस्लिम समाज के सामने मौजूद चुनौतियों और उनके हल पर गंभीर चर्चा का रास्ता खोला। इस बैठक में समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने हिस्सा लिया और इस बात पर जोर दिया कि मौजूदा हालात में सिर्फ शिकायतों और प्रतिक्रियाओं से काम नहीं चलेगा, बल्कि दूरदर्शिता, संगठन और व्यावहारिक कदमों की ज़रूरत है।
मराठी पत्रकार संघ में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान राज्यसभा के पूर्व सदस्य और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना उबैदुल्लाह आज़मी ने कहा कि देश इस समय एक नाज़ुक दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय में लोगों को एक-दूसरे के करीब आने और दिलों में पैदा हुई दूरियों को मिटाने की कोशिश करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज में अमन, भाईचारा और आपसी भरोसा मजबूत करना हम सबकी साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने मीडिया से भी उम्मीद जताई कि वह संविधान की मजबूती और सामाजिक सद्भाव को बढ़ाने में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाएगी।
इसी सिलसिले में इस्लाम जिमखाना में फेडरेशन ऑफ महाराष्ट्र मुस्लिम्स की ओर से एक महत्वपूर्ण सलाहकार बैठक आयोजित की गई। इसमें विधायक, पूर्व न्यायाधीश, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता, धार्मिक विद्वान और समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि बड़ी संख्या में शामिल हुए। बैठक का उद्देश्य किसी सरकार या राजनीतिक दल के खिलाफ मोर्चा खोलना नहीं था, बल्कि समाज के सामने मौजूद समस्याओं के व्यावहारिक समाधान तलाशना था।
बैठक की शुरुआत करते हुए जमात-ए-इस्लामी हिंद महाराष्ट्र के अध्यक्ष मौलाना इल्यास खान फलाही ने कहा कि राज्य में लगातार बन रहे मुस्लिम विरोधी माहौल ने युवाओं के भीतर चिंता और बेचैनी पैदा कर दी है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि समाज केवल प्रतिक्रियाएं देने के बजाय भविष्य की ठोस योजना बनाए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या समाज के नेतृत्व के पास आने वाले दस वर्षों के लिए कोई स्पष्ट कार्ययोजना है। उनका मानना था कि केवल भावनात्मक भाषणों से समस्याएं हल नहीं होतीं, बल्कि जमीन पर उतरकर काम करने से बदलाव आता है।
बैठक में मौजूद अधिकांश वक्ताओं ने इस विचार का समर्थन किया कि अब केवल प्रस्ताव पारित करने या भाषण देने से आगे बढ़ना होगा। समाज को शिक्षा, कानूनी जागरूकता, सामाजिक संगठन और लोकतांत्रिक भागीदारी के क्षेत्र में गंभीर प्रयास करने होंगे।
चर्चा के दौरान कई मुद्दों पर चिंता व्यक्त की गई। धर्म की स्वतंत्रता से जुड़े प्रस्तावित कानून, भीड़ की हिंसा, नफरत फैलाने वाले बयान, बुलडोजर कार्रवाई, समान नागरिक संहिता और मतदाता सूचियों से नाम हटाए जाने जैसे विषयों पर विस्तार से विचार किया गया। प्रतिभागियों ने कहा कि हर नागरिक को संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों की रक्षा मिलनी चाहिए और कानून का इस्तेमाल किसी भी वर्ग को डराने या परेशान करने के लिए नहीं होना चाहिए।
बैठक में यह भी महसूस किया गया कि समाज को अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति अधिक जागरूक होना होगा। खास तौर पर युवाओं को शिक्षा, कानून और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की जानकारी हासिल करनी चाहिए। साथ ही मतदाता सूची में अपने और अपने परिवार के नाम दर्ज करवाने, पहचान पत्रों और अन्य जरूरी दस्तावेजों की गलतियों को समय रहते ठीक कराने पर भी जोर दिया गया।
बैठक का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह रहा कि समाज को निराशा या गुस्से के बजाय समझदारी, धैर्य और संगठित प्रयासों का रास्ता अपनाना चाहिए। वक्ताओं ने कहा कि चुनौतियां चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, उनका मुकाबला संविधान, कानून और लोकतांत्रिक मूल्यों के दायरे में रहकर ही किया जाना चाहिए।
मुंबई में हुई यह बैठक केवल समस्याओं पर चर्चा तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने यह संदेश भी दिया कि किसी भी समाज की ताकत उसकी एकता, जागरूकता और भविष्य के लिए बनाई गई ठोस योजना में होती है। आज जब देश में आपसी विश्वास और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने की जरूरत पहले से अधिक महसूस की जा रही है, तब ऐसे संवाद और विचार-विमर्श समाज को नई दिशा देने का काम कर सकते हैं।बैठक में पूर्व जज अभय थिप्से, विधायक अमीन पटेल, साजिद पठान, हारून खान, अबू आसिम आजमी, रईस शेख और पूर्व राज्यसभा सांसद उबैदुल्लाह खान आजमी ने भाग लिया। इनके अलावा जमीयत उलेमा-ए-महाराष्ट्र के अध्यक्ष मौलाना हलीमउल्लाह खान, एपीसीआर (APCR) महाराष्ट्र के सचिव शाकिर शेख, एमपीजे (MPJ) महाराष्ट्र के सिराज अहमद, अमन कमेटी के फरीद शेख, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता मौलाना उमरेन महफूज रहमानी, शब्बीर भोपालवाला और मौलाना जहीर अब्बास रिजवी सहित कई राष्ट्रीय व क्षेत्रीय नेता मौजूद थे, जिन्होंने संवैधानिक दायरे में रहकर मुसलमानों के अधिकारों की कानूनी और सामाजिक लड़ाई लड़ने का संकल्प लिया।
अंत में सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि अमन, भाईचारा, न्याय और संविधान के प्रति भरोसा ही वह रास्ता है, जो समाज को आगे बढ़ा सकता है और देश को और मजबूत बना सकता है।

