अगर साथ होते, तो तस्वीर बदल सकती थी

Date:

  (रईस खान)

महाराष्ट्र के हालिया नगर पालिका और म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन चुनावों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि चुनाव केवल नारों से नहीं, बल्कि गणित और संगठन से जीते जाते हैं। 2025 के लोकल बॉडी चुनाव हों या 2026 के मुंबई महानगरपालिका समेत अन्य कॉर्पोरेशनों के नतीजे, तस्वीर लगभग एक जैसी रही।बीजेपी-नेतृत्व वाली महायुति ने शानदार जीत दर्ज की और विपक्ष बिखरा हुआ नज़र आया।

इस चुनावी जीत को केवल बीजेपी की लोकप्रियता या सरकार की योजनाओं तक सीमित करके देखना पूरी सच्चाई नहीं होगी। असल वजह यह रही कि गैर-बीजेपी दल एक मंच पर नहीं आ सके। कांग्रेस, उद्धव ठाकरे की शिवसेना, शरद पवार की एनसीपी, मजलिस, समाजवादी पार्टी, आघाड़ी और एमएनएस,सभी ने अलग-अलग दिशा में लड़ाई लड़ी। नतीजा यह हुआ कि वोट तो विपक्ष के पास थे, लेकिन सीटें महायुति की झोली में चली गईं।

मुंबई महानगरपालिका इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आंकड़े बताते हैं कि महायुति को लगभग 42 प्रतिशत वोट मिले, जबकि गैर-बीजेपी दलों को कुल मिलाकर करीब 58 प्रतिशत वोट हासिल हुए। इसके बावजूद बीएमसी पर कब्जा महायुति का रहा। कारण साफ है, वोटों का बिखराव।

पहले-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली में वोट बंटते ही हार तय हो जाती है, चाहे कुल वोट प्रतिशत कितना ही ज़्यादा क्यों न हो। यह हाल सिर्फ मुंबई तक सीमित नहीं रहा। पुणे, नागपुर, ठाणे, नाशिक जैसे बड़े शहरों में भी यही कहानी दोहराई गई। कई जगह हार-जीत का अंतर कुछ सौ वोटों का था। ऐसे कई वार्ड थे, जहां अगर कांग्रेस, ठाकरे गुट और अन्य विपक्षी दल एक उम्मीदवार पर सहमत हो जाते, तो नतीजा बिल्कुल अलग हो सकता था।कांकवली जैसे उदाहरण बताते हैं कि जहां स्थानीय स्तर पर विपक्ष ने एकजुट होकर लड़ाई लड़ी, वहां बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा।

मुस्लिम और दलित वोटों का बंटवारा भी विपक्ष के लिए भारी पड़ा। मुंबई जैसे शहरों में मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाता है, लेकिन मजलिस, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच यह वोट बिखर गया। इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला, भले ही उसके पास उस वर्ग में मजबूत समर्थन न रहा हो। यही वजह है कि अधिक वोट होने के बावजूद विपक्ष कम सीटों पर सिमट गया।

सवाल उठता है कि अगर गैर-बीजेपी दल एकजुट होकर चुनाव लड़ते तो क्या तस्वीर बदल सकती थी? राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो जवाब साफ तौर पर ‘हां’ है। अगर विपक्षी दल साझा रणनीति बनाते और सीटों का समझदारी से बंटवारा करते, तो न केवल मुंबई महानगरपालिका बल्कि दर्जनों नगर पालिकाओं में सत्ता परिवर्तन संभव था। तब महायुति की भारी जीत सीमित हो सकती थी और शहरी राजनीति में बीजेपी का दबदबा चुनौती में पड़ जाता।

लेकिन राजनीति सिर्फ गणित नहीं होती, उसमें अहंकार, आपसी अविश्वास और नेतृत्व की लड़ाई भी होती है। महाराष्ट्र में यही हुआ। कांग्रेस अपने दम पर मैदान में उतरने की सोचती रही, ठाकरे और पवार गुट अपनी-अपनी सियासी जमीन बचाने में लगे रहे और छोटे दल अपनी पहचान बनाने की कोशिश में अलग राह पकड़ते रहे। नतीजा यह हुआ कि एक मजबूत दिखने वाला विपक्ष चुनावी नतीजों में कमजोर साबित हुआ।

इन चुनावों ने महाराष्ट्र की राजनीति को एक साफ संदेश दिया है। बीजेपी की ताकत से ज़्यादा विपक्ष की कमजोरी ने उसे जिताया है। अगर यही हाल आगे भी रहा और विपक्ष 2029 के विधानसभा चुनाव तक भी एकजुट नहीं हुआ, तो महाराष्ट्र बीजेपी के लिए एक स्थायी किला बन सकता है। लोकतंत्र में विकल्प तभी मजबूत होता है, जब विरोधी ताकतें साथ खड़ी हों। इस बार विपक्ष बिखरा और सत्ता एक हाथ में चली गई। यह सबक आने वाले चुनावों के लिए बेहद अहम है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_img

पॉपुलर

और देखे
और देखे

मजलिस नेता इम्तियाज़ जलील ने ‘हरा रंग’ को लेकर बीजेपी पर राजनीति करने का आरोप लगाया 

मुंब्रा में आज ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के महाराष्ट्र...

ओवैसी की सियासत और गठबंधन प्रयासों की हकीकत

(रईस खान) असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM)...

असदुद्दीन ओवैसी पर आरोप: राजनीतिक आलोचना या मुस्लिम लीडरशिप को चुनौती 

 (रईस खान) हाल ही में मुस्लिम पत्रकारों की एक बैठक...