(रईस खान)
असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) आज भारतीय राजनीति में एक अहम और चर्चित नाम बन चुके हैं। ओवैसी न सिर्फ मुसलमानों के मुद्दों पर मुखर रहते हैं, बल्कि दलितों, पिछड़े वर्गों और दूसरे कमजोर तबकों के हक़ की बात भी मजबूती से रखते हैं। इसके बावजूद उन पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि वे “बीजेपी की बी-टीम” हैं या केवल मुस्लिम राजनीति करते हैं। लेकिन जब उनके राजनीतिक सफर और गठबंधन की कोशिशों को गंभीरता से देखा जाए तो यह तस्वीर बिल्कुल अलग नज़र आती है।
गठबंधन की कोशिशें, जोड़ने की सियासत
ओवैसी और मजलिस को अक्सर “वोट काटने वाली पार्टी” कहा जाता है, जबकि हकीकत यह है कि उन्होंने कई बार विपक्षी दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की पहल की है। बिहार इसका बड़ा उदाहरण है, जहां मजलिस ने विधानसभा चुनाव में पांच सीटें जीतने के बाद राजद, कांग्रेस और वाम दलों के महागठबंधन में शामिल होने की कोशिश की। पार्टी की तरफ से यह कहा गया कि उनका मकसद सेक्युलर वोटों को बिखरने से बचाना है, लेकिन जब गठबंधन ने मजलिस को जगह नहीं दी, तब पार्टी को अकेले चुनाव लड़ना पड़ा। इसके बाद सीमांचल न्याय यात्रा के जरिए मजलिस ने यह संदेश दिया कि वह टकराव नहीं बल्कि हिस्सेदारी की राजनीति चाहती है।
उत्तर प्रदेश में भी ओवैसी ने यही रवैया अपनाया। उन्होंने बाबू सिंह कुशवाहा और भारत मुक्ति मोर्चा के साथ मिलकर भागीदारी परिवर्तन मोर्चा बनाया, जिसमें दलित, ओबीसी और मुसलमानों को एक साझा मंच पर लाने की कोशिश की गई। यहां तक कहा गया कि सत्ता आने पर मुख्यमंत्री ओबीसी और दलित समाज से होंगे और एक उपमुख्यमंत्री मुस्लिम समाज से। यह साफ दिखाता है कि ओवैसी की राजनीति सिर्फ एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय के व्यापक एजेंडे पर आधारित है।
बीजेपी से दूरी और स्पष्ट रुख
ओवैसी पर “बीजेपी की बी-टीम” होने का आरोप सबसे ज़्यादा लगाया जाता है, जबकि उन्होंने खुद बार-बार कहा है कि बीजेपी से उनका कोई समझौता संभव ही नहीं है। महाराष्ट्र में उन्होंने खुले तौर पर कहा कि बीजेपी और मजलिस के रास्ते कभी एक नहीं हो सकते। कहीं-कभार स्थानीय स्तर पर कोई ग़लत राजनीतिक कदम उठा भी तो पार्टी ने उसे तुरंत सुधारा और स्पष्ट किया कि बीजेपी से कोई वैचारिक या राजनीतिक समझौता उनकी नीति के खिलाफ है। यह रुख बताता है कि ओवैसी की सियासत सत्ता के लिए नहीं, विचारधारा के आधार पर चलती है।
मजलिस की बदलती पहचान, मुस्लिम पार्टी से आगे
मजलिस को अब केवल मुस्लिम पार्टी कहना भी पूरी सच्चाई नहीं है। हालिया महाराष्ट्र नगर निगम चुनावों में पार्टी ने करीब 125 सीटें जीतकर सबको चौंकाया, जिनमें कई गैर-मुस्लिम उम्मीदवार भी शामिल थे। दलित, हिंदू और आदिवासी समाज से आने वाले उम्मीदवारों की जीत यह बताती है कि मजलिस अब अलग-अलग समुदायों को अपने साथ जोड़ रही है। मुंबई के गोवंडी इलाके से दलित उम्मीदवार विजय उबाले की जीत इस बदलती पहचान की एक मजबूत मिसाल है। खुद उबाले ने कहा कि मजलिस सिर्फ मुसलमानों की पार्टी नहीं है, बल्कि हर उस इंसान की पार्टी है जो इंसाफ और बराबरी चाहता है।
दलित और पिछड़ों की आवाज़
ओवैसी की राजनीति का एक अहम पहलू यह भी है कि वे संसद में और बाहर लगातार दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के मुद्दे उठाते रहे हैं। मॉब लिंचिंग हो, दलितों पर अत्याचार हो, ओबीसी आरक्षण का सवाल हो या आदिवासी अधिकारों की बात,ओवैसी हर मंच से इन मुद्दों पर बोलते नज़र आते हैं। उनका मानना है कि जब तक दलित, पिछड़े और मुसलमान साथ नहीं आएंगे, तब तक सामाजिक न्याय का सपना पूरा नहीं हो सकता। यही सोच उन्हें पारंपरिक मुस्लिम राजनीति से आगे ले जाती है।
“सिर्फ मुस्लिम राजनीति” का इल्ज़ाम क्यों?
ओवैसी पर “मुस्लिम परस्त” होने का आरोप अक्सर इसलिए लगाया जाता है क्योंकि उनकी पार्टी के नाम में “मुस्लिम” शब्द जुड़ा है और वे खुलकर मुसलमानों के अधिकारों की बात करते हैं। लेकिन जब कोई दलित या पिछड़े वर्ग का नेता अपने समाज की बात करता है तो उसे कभी सांप्रदायिक नहीं कहा जाता। असल में यह आरोप कई बार राजनीतिक ब्लैकमेलिंग का हिस्सा बन जाता है, ताकि मुसलमान अपनी स्वतंत्र राजनीतिक सोच से दूर रहें और डर के मारे पुराने विकल्पों तक सीमित रहें।
आरोपों से आगे देखने की ज़रूरत
ओवैसी और मजलिस की सियासत को केवल नारों या आरोपों से समझना एक बड़ी भूल होगी। उनकी राजनीति गठबंधन की कोशिशों, सामाजिक न्याय के एजेंडे और समावेशी प्रतिनिधित्व पर आधारित है। उनसे असहमति हो सकती है, उनकी आलोचना भी होनी चाहिए, लेकिन वह तथ्यों और सच्चाई के आधार पर होनी चाहिए, न कि डर और गलतफहमियों पर। आज ज़रूरत इस बात की है कि राजनीतिक बहस आरोपों से ऊपर उठे और असल मुद्दों जैसे रोज़गार, शिक्षा, सुरक्षा और बराबरी पर केंद्रित हो। यही लोकतंत्र की असली ताकत है।

