(रईस खान)
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और सांस्कृतिक एकता की भावना को दर्शाने वाले नामों की चर्चा हाल ही में कोटद्वार के एक युवा द्वारा खुद को ‘मुहम्मद दीपक’ कहने से फिर सुर्खियों में है। इस घटना ने इतिहासकारों और सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है कि क्या भारतीय इतिहास में गैर-मुस्लिम व्यक्तियों ने धार्मिक एकता के प्रतीक के रूप में अपने नाम में ‘मोहम्मद’ जोड़ा है?
मुख्य रूप से एक प्रमुख उदाहरण सामने आया, जो शहीद ऊधम सिंह का है। शहीद ऊधम सिंह, जो एक सिख थे और स्वतंत्रता संग्रामी, ने ब्रिटिश राज के खिलाफ अपनी लड़ाई में धार्मिक एकता को प्रतीक बनाया। 1940 में लंदन में माइकल डायर की हत्या के बाद गिरफ्तारी के समय, उन्होंने अपना नाम ‘राम मोहम्मद सिंह आजाद’ बताया। यह नाम हिंदू (राम), मुस्लिम (मोहम्मद) और सिख (सिंह) समुदायों की एकता को दर्शाता था, जबकि ‘आजाद’ स्वतंत्रता का प्रतीक था।
विकिपीडिया के अनुसार, ऊधम सिंह ने यह नाम ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ सभी धर्मों की एकजुटता दिखाने के लिए अपनाया। कुछ स्रोतों में यह भी उल्लेख है कि मूल नाम ‘मोहम्मद सिंह आजाद’ था, और ‘राम’ बाद में जोड़ा गया, लेकिन इसका उद्देश्य एकता ही था। ऊधम सिंह की बाजू पर यह नाम गुदा हुआ था, जो भारत की बहुलवादी भावना को रेखांकित करता है।
यह घटना हमें याद दिलाती है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत में एकता की भावना गहराई से रची-बसी है। शहीद ऊधम सिंह का उदाहरण आज भी प्रेरणा देता है कि कैसे नाम एक प्रतीक बन सकता है। हालांकि, ‘मुहम्मद दीपक’ जैसे नए मामले सोशल मीडिया पर बहस पैदा कर रहे हैं, जो फर्जी राष्ट्रवाद और सच्ची एकता के बीच फर्क पर सवाल उठाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी पहलें सकारात्मक हों, लेकिन इतिहास की गहराई समझना जरूरी है।

