तुर्की में अरबी ज़बान की वापसी, एर्दोगान का तारीख़ी फैसला या उस्मानी रूह का इंक़लाब?

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(रईस खान )

तुर्की के सदर रजब तैय्यब एर्दोगान ने एक ऐसा फैसला लिया है जो न सिर्फ तुर्की बल्कि पूरी इस्लामी दुनिया में हलचल मचा रहा है। ये फैसला अरबी ज़बान को इमामों और उलेमा के लिए अनिवार्य बनाने और स्कूलों में ऑप्शनल सब्जेक्ट के तौर पर शामिल करने का है। लेकिन क्या ये सिर्फ एजुकेशन पॉलिसी है, या 100 साल पुरानी उस्मानी तहजीब की वापसी का ऐलान? आइए डिटेल में देखें, क्या है पूरा मामला, इतिहास की परछाईं और इसका असर।

तुर्की सरकार ने 2014 में नेशनल एजुकेशन काउंसिल के जरिए एक बड़ा चेंज किया। रिलिजियस हाई स्कूलों (इमाम हतीप स्कूलों) में ओटोमन तुर्किश, जो अरबी अल्फाबेट में लिखी जाती है, को कंपलसरी कर दिया गया। रेगुलर स्कूलों में इसे ऑप्शनल सब्जेक्ट बनाया गया। एर्दोगान ने कहा कि ये ज़बान तुर्की की पुरानी तहजीब से जुड़ी है, और इसे सीखना ज़रूरी है ताकि नई नस्ल अपनी जड़ों से कट न जाए।

खास तौर पर इमाम हतीप स्कूलों में, जहां इमाम और प्रीचर्स की ट्रेनिंग होती है, अरबी और कुरान की पढ़ाई को बढ़ावा दिया गया। यहां करीब आधा कोर्स रिलिजियस है, जिसमें कुरान, अरबी और इस्लामी इल्म शामिल है।

2012 से ही एर्दोगान सरकार ने एजुकेशन रिफॉर्म्स शुरू किए, जिसमें ऑप्शनल सब्जेक्ट्स जैसे “लाइफ ऑफ प्रॉफेट मुहम्मद” और “होली कुरान” को शामिल किया। अब इमामों और मशाएख के लिए अरबी सीखना जरूरी है, क्योंकि ये कुरान की ज़बान है और इस्लामी इल्म की बुनियाद।

हालांकि, हाल के सालों में कोई नया फैसला नहीं आया, लेकिन एर्दोगान की पॉलिसी अब भी जारी है। 2020s में इमाम हतीप स्कूलों की तादाद 450 से बढ़कर 4,500 हो गई है, और रिलिजियस एजुकेशन को और मजबूत किया जा रहा है।

ये फैसला सिर्फ ज़बान का नहीं, बल्कि तारीख़ का है। 1923 में मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने तुर्की को सेक्युलर रिपब्लिक बनाया। उन्होंने उस्मानी साम्राज्य की इस्लामी पहचान को खत्म किया। अरबी स्क्रिप्ट को लैटिन अल्फाबेट से बदल दिया, रिलिजियस स्कूलों को बंद किया, और इस्लामी कैलेंडर को ग्रेगोरियन से रिप्लेस किया। अरबी, फारसी और इस्लामी तहजीब को हटा दिया गया, ताकि तुर्की वेस्टर्न स्टाइल में आगे बढ़े।

एर्दोगान अब उसी को रिवर्स कर रहे हैं। वो कहते हैं कि ओटोमन ज़बान “तुर्की की कभी न पुरानी होने वाली फॉर्म” है, और इसे सीखना ज़रूरी है। ये उस्मानी रूह की वापसी जैसा लगता है, क्योंकि अरबी न सिर्फ ज़बान है, बल्कि कुरान, उम्मत और इस्लामी इल्म की चाबी है। एर्दोगान की एकेपी पार्टी 2002 से सत्ता में है, और उन्होंने एजुकेशन को इस्तेमाल करके “पायस जेनरेशन” यानी पवित्र नस्ल तैयार करने का ऐलान किया।

ये फैसला सेक्युलर तुर्कों को पसंद नहीं आया। अपोजिशन कहती है कि एर्दोगान इस्लामी एजेंडा चला रहे हैं, और सेक्युलरिज्म को खत्म कर रहे हैं। एक अपोजिशन लीडर ने कहा कि “एर्दोगान की असल मंशा अरबी अल्फाबेट को वापस लाना है।” पैरेंट्स भी डिवाइडेड हैं, कुछ को रिलिजियस एजुकेशन अच्छा लगता है, कुछ मानते हैं कि ये स्टैंडर्ड्स को गिरा रहा है।

दूसरी तरफ, एर्दोगान के सपोर्टर्स इसे तुर्की की पहचान की वापसी मानते हैं। ये इस्लामी वैल्यूज को क्यूरिकुलम में डाल रहा है, जैसे हिजाब का एक्सप्लेनेशन और इस्लाम-साइंस की कम्पेटिबिलिटी। फॉरेन पॉलिसी में भी असर, तुर्की को इस्लाम का प्रोटेक्टर दिखाया जा रहा है।

एर्दोगान का ये कदम एजुकेशन रिफॉर्म से ज्यादा लगता है। ये उस्मानी सोच की तरफ लौटने का इशारा है। तुर्की अब “तुर्क दाना” बनने की राह पर है, जहां ज़बान के जरिए नस्लों की सोच बदलेगी। लेकिन क्या ये कामयाब होगा? वक्त बताएगा। अगर आपकी राय है, तो कमेंट में बताएं , क्या ये “एजुकेशन रिफॉर्म” है या “उस्मानी रूह की वापसी”?

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