(अल्लामा ओबेदुल्ला खान आज़मी)
अगर पूरे तौर पर देखा जाए तो हिंदुस्तानी मुसलमानों में ऐसी तालीम की तरफ़ रुझान कम रहा है, जो सीधे तौर पर पावर और फैसले लेने वाले निज़ाम तक पहुंचाती हो। जैसे, ज्यूडिशरी, सिविल सर्विस, मीडिया, फाइनेंस, पॉलिसी मेकिंग, रिसर्च, टेक्नोलॉजी वगैरह। लेकिन इसे सिर्फ़ दिलचस्पी की कमी कहना सही नहीं होगा। इसके पीछे तारीखी, समाजी, मआशी और नफ़्सियाती वजहें हैं।
1857 के बाद मुसलमानों में एक डर और बचाव वाली सोच पैदा हो गई। हुकूमत खत्म होने के बाद क़ौम ने क़ियादत से ज़्यादा अपनी बक़ा यानी बचाव को अहमियत दी। इसी वजह से सरकारी इदारों से दूरी, सिस्टम पर एतबार की कमी और सुरक्षित रोज़गार की तरफ़ झुकाव बढ़ गया। इसलिए छोटा कारोबार, मदरसे की तालीम, खाड़ी मुल्कों की नौकरी या मामूली ग्रेजुएशन आम रास्ते बन गए।
एक बड़ा मसला यह भी है कि बहुत से घरों में तालीम का मकसद सिर्फ़ नौकरी, डिग्री या रोज़ी-रोटी समझा जाता है। जबकि कामयाब क़ौमें तालीम को इदारा बनाने, कानून लिखने, मीडिया चलाने, पॉलिसी तय करने और मआशी ताक़त हासिल करने का ज़रिया मानती हैं। वो अपने बच्चों को सिर्फ़ नौकरी के लिए नहीं, बल्कि फैसले लेने वाली कुर्सी तक पहुंचाने के लिए पढ़ाती हैं। यही सोच हमारे यहां कमज़ोर है।
रोल मॉडल की कमी भी बड़ी वजह है। गांव और छोटे शहरों में बच्चे अक्सर मौलवी, छोटे कारोबारी, लोकल नेता या खाड़ी में नौकरी करने वालों को ही कामयाब मानते हैं। लेकिन जज, आईएएस अफसर, बड़े पत्रकार, चार्टर्ड अकाउंटेंट या पॉलिसी एक्सपर्ट उनकी नज़रों से दूर रहते हैं। इंसान वही ख्वाब देखता है जो अपने आसपास देखता है।
छोटे शहरों में करियर गाइडेंस, सही रहनुमाई, कॉम्पिटिशन का माहौल और बड़ी सोच की कमी है। बहुत से होनहार बच्चे यह तक नहीं जानते कि सिविल सर्विस क्या होती है, ज्यूडिशरी में कैसे जाएं, मीडिया में असरदार जगह कैसे बनाएं या फाइनेंस सेक्टर में एंट्री कैसे करें।
गरीबी और जल्दी कमाने का दबाव भी बड़ी वजह है। क्योंकि आईएएस, जज, रिसर्च या पॉलिसी जैसे फील्ड में लंबी मेहनत और सब्र चाहिए। लेकिन गरीब घर जल्दी आमदनी चाहते हैं। इसलिए छोटे कोर्स और कमज़ोर डिग्रियां ज़्यादा चुनी जाती हैं।
एक गलत दीन और दुनिया की तफरीक ने भी नुकसान पहुंचाया। कुछ लोगों ने यह समझ लिया कि दीन सिर्फ़ मस्जिद और मदरसे तक है, जबकि अदालत, मीडिया, कारोबार और हुकूमत सिर्फ़ दुनियावी चीज़ें हैं। जबकि इस्लामी तारीख़ में काज़ी, वज़ीर, सफीर, मआशियात के माहिर और कानूनदान सब क़ौम और दीन की खिदमत का हिस्सा माने जाते थे।
असल मसला तालीमी विज़न का है। आम तौर पर लोग पूछते हैं, “हमारे बच्चे क्या बनेंगे?” लेकिन तरक़्क़ी करने वाली क़ौमें पूछती हैं, “हमारे बच्चे कहां फैसले करेंगे?” यही फर्क पावर स्ट्रक्चर बनाता है।इस हालात को बदलने के लिए सबसे पहले सोच बदलनी होगी।
गांव-गांव यह पैग़ाम पहुंचाना होगा कि:
आईएएस सिर्फ़ नौकरी नहीं, पॉलिसी की ताक़त है।
ज्यूडिशरी सिर्फ़ कानून नहीं, इंसाफ़ की ताबीर है।
मीडिया सिर्फ़ खबर नहीं, लोगों की सोच बनाने का ज़रिया है।
फाइनेंस सिर्फ़ पैसा नहीं, मआशी इक़्तेदार है।
लोगों में मकसद वाली तालीम का एहसास पैदा करना होगा। हर इलाके में यह सवाल होना चाहिए:
हमारे शहर से अगला जज कौन बनेगा?
अगला आईएएस कौन होगा?
अगला बड़ा एडिटर या पॉलिसी एक्सपर्ट कौन होगा?
जब सवाल बदलते हैं, तब ख्वाब भी बदलते हैं।
छोटे शहरों में तालीमी और प्रोफेशनल माहौल बनाना बहुत ज़रूरी है। जैसे:
करियर गाइडेंस सेमिनार
सिविल सर्विस कोचिंग और लाइब्रेरी
कानूनी जागरूकता कैंप
मीडिया वर्कशॉप
फाइनेंस और बिजनेस अवेयरनेस प्रोग्राम
डिबेट क्लब और मॉक पार्लियामेंट
अगर किसी जिले से एक आईएएस, एक जज या एक बड़ा पत्रकार निकलता है, तो उसे पूरी कम्युनिटी का रोल मॉडल बनाना चाहिए। क्योंकि एक कामयाब इंसान सैकड़ों नए ख्वाब पैदा करता है।
मदारिस और मॉडर्न एजुकेशन के बीच भी पुल बनाना होगा। मदरसों में संविधान, कानून, मीडिया लिटरेसी, अंग्रेज़ी, कंप्यूटर और डिजिटल स्किल्स का तआरुफ़ होना चाहिए। वहीं मॉडर्न स्कूलों में अख़लाक़, तहज़ीब और समाजी ज़िम्मेदारी की तालीम होनी चाहिए।
गांवों में छोटी लाइब्रेरी, अखबार पढ़ने की आदत, स्टडी सर्कल, इल्मी मजलिस और इंटरव्यू गाइडेंस जैसे छोटे कदम भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं। बड़ी तहरीकें अक्सर छोटे कमरों की लाइब्रेरी से शुरू हुई हैं। वालिदैन की सोच बदलना भी ज़रूरी है। उन्हें समझाना होगा कि सिर्फ़ बीए या मामूली डिग्री काफी नहीं है। बल्कि स्ट्रैटेजिक एजुकेशन, बड़े इदारों में नुमाइंदगी और लीडरशिप वाले रास्ते चुनना ज़रूरी है।
अगर किसी गांव या छोटे शहर में सिर्फ़ ये पांच काम लगातार शुरू कर दिए जाएं:
हर हफ्ते करियर और तालीमी गाइडेंस मीटिंग
कॉम्पिटिटिव एग्जाम की लाइब्रेरी
सिविल सर्विस और ज्यूडिशरी में मेंटरशिप ग्रुप
स्कूलों में डिबेट और राइटिंग कल्चर
सालाना विज़न कॉन्फ्रेंस
तो 5–10 साल में पूरा माहौल बदल सकता है।
याद रखिए…
तालीम सिर्फ़ नौकरी नहीं देती, बल्कि कानून लिखती है, अदालत चलाती है, मीडिया बनाती है, मआशियात कंट्रोल करती है और मुल्क का नैरेटिव तय करती है। जो क़ौमें इन इदारों में कमज़ोर होती हैं, वो सिर्फ़ आबादी से ताक़तवर नहीं बनतीं।
इसलिए आज ज़रूरत सिर्फ़ तालीम की नहीं, बल्कि ऐसी तालीम की है जो सही दिशा दे, इदारे बनाए और क़ौम को फैसले लेने वाली जगह तक पहुंचाए।

