नीट पेपर लीक होने से लाखों छात्रों के सपनों पर फिर चला भ्रष्टाचार का बुलडोजर

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(रईस खान)

एक बार फिर देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट यूजी विवादों में घिर गई है। इस बार भी पेपर लीक होने के आरोपों ने लाखों छात्रों और उनके परिवारों को गहरे संकट में डाल दिया है। करीब 23 लाख छात्रों की महीनों की मेहनत, माता पिता की जमा पूंजी और कर्ज लेकर की गई तैयारी पर पानी फिर गया।

3 मई 2026 को आयोजित परीक्षा के कुछ ही दिनों बाद सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर एक कथित गेस पेपर तेजी से वायरल हुआ, जिसमें 120 से 150 सवाल असली पेपर से मेल खाते पाए गए। बढ़ते विवाद और दबाव के बीच एनटीए को आखिरकार परीक्षा रद्द करनी पड़ी। अब दोबारा परीक्षा कराने की तैयारी की जा रही है, जबकि पूरे मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई है।

जांच एजेंसियों के अनुसार इस बार पेपर लीक का बड़ा नेटवर्क राजस्थान के जयपुर और सीकर से संचालित हो रहा था। राजस्थान एसओजी और सीबीआई ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए कई लोगों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार आरोपियों में मंगीलाल, विकास और दिनेश बिवाल नाम के तीन भाई शामिल हैं। इनके अलावा सीकर के करियर काउंसलर राकेश कुमार का नाम भी सामने आया है। महाराष्ट्र के नासिक से शुभम खैरनार नाम के एक मेडिकल छात्र को भी पकड़ा गया है, जिस पर पेपर खरीदकर हरियाणा तक पहुंचाने का आरोप है।

जांच में सामने आया है कि पेपर पांच हजार रुपये से लेकर तीस लाख रुपये तक में बेचा गया। सीबीआई ने 12 मई को एफआईआर दर्ज की और उसके बाद लगातार कई राज्यों में छापेमारी जारी है। अब तक पांच लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जबकि इस पूरे नेटवर्क के राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार, केरल और उत्तराखंड तक फैले होने की आशंका जताई जा रही है। जांच एजेंसियों के मुताबिक करीब 45 लोगों के नाम सामने आए हैं। शुरुआती जांच में प्रिंटिंग एजेंसी और कोचिंग माफिया के गठजोड़ की बात भी सामने आई है।

नीट परीक्षा में गड़बड़ी और पेपर लीक का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कई बार ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं। साल 2015 में एआईपीएमटी परीक्षा ब्लूटूथ डिवाइस के जरिए नकल कराने के कारण रद्द करनी पड़ी थी और दोबारा परीक्षा आयोजित की गई थी। इसके बाद 2024 में बिहार और झारखंड में बड़े पैमाने पर पेपर लीक का मामला सामने आया था। उस समय छात्रों से 30 से 50 लाख रुपये तक वसूले गए थे।

पुलिस ने 13 लोगों को गिरफ्तार किया था और मामला बाद में सीबीआई को सौंपा गया। जांच के दौरान आधे जले हुए प्रश्नपत्र भी बरामद हुए थे। सीबीआई ने उस मामले में 48 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया था। हालांकि उस समय पूरे एग्जाम को रद्द नहीं किया गया था, बल्कि कुछ चुनिंदा छात्रों के लिए दोबारा परीक्षा कराई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने तब कहा था कि वह पूरी तरह सिस्टेमिक लीक का मामला नहीं था।

इसके अलावा 2021 और अन्य वर्षों में भी सॉल्वर गैंग, प्रॉक्सी उम्मीदवारों और स्थानीय स्तर पर पेपर लीक के कई मामले सामने आए। हर बार कार्रवाई हुई, गिरफ्तारियां हुईं और सख्त सुरक्षा के दावे किए गए। बायोमेट्रिक सिस्टम, जीपीएस ट्रैकिंग और हाई सिक्योरिटी जैसी व्यवस्थाओं की घोषणा भी की गई, लेकिन इसके बावजूद हर साल नए तरीके से गड़बड़ियां सामने आती रहीं।

माना जा रहा है कि पेपर प्रिंटिंग, ट्रांसपोर्ट सिस्टम, कोचिंग माफिया और पैसे के दम पर काम करने वाले संगठित गिरोहों का गठजोड़ अभी भी सक्रिय है। एनटीए पर लगातार दबाव और निगरानी की कमी के कारण व्यवस्था में सुधार नहीं हो पा रहा है। कई मामलों में आरोपी जल्दी जमानत पर छूट जाते हैं या जांच और सुनवाई वर्षों तक लंबित रहती है।

अब इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की जा रही हैं। लाखों छात्र मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं। कई छात्रों का कहना है कि उनका एक साल बर्बाद हो गया और भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। सरकार ने परीक्षा शुल्क वापसी और दोबारा परीक्षा कराने का आश्वासन दिया है, लेकिन छात्रों और अभिभावकों का भरोसा बुरी तरह टूट चुका है।

यह मामला केवल एक परीक्षा में पेपर लीक का नहीं, बल्कि पूरे सरकारी सिस्टम की लापरवाही और भ्रष्टाचार पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। सीबीआई अब मामले की गहराई से जांच कर रही है और उम्मीद की जा रही है कि दोषियों तक पहुंचा जाएगा। लेकिन असली बदलाव तभी संभव होगा जब पेपर प्रिंटिंग और वितरण प्रणाली को पूरी तरह सुरक्षित बनाया जाए, डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था लागू की जाए और निगरानी को बेहद सख्त किया जाए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो हर साल छात्रों के सपने इसी तरह टूटते रहेंगे और शिक्षा माफिया अपना खेल खेलते रहेंगे।

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