कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेंगलुरु के अब्दुल रहीम को दी बड़ी राहत, बांग्लादेश निर्वासन पर लगाई रोक

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बेंगलुरु में कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति की पहचान को लेकर उठे विवाद में बड़ी राहत देते हुए उसके बांग्लादेश निर्वासन पर फिलहाल रोक लगा दी है। अब्दुल रहीम नाम के इस शख्स को पुलिस और एफआरआरओ ने कथित तौर पर अवैध बांग्लादेशी नागरिक बताकर मार्च महीने से डिटेंशन सेंटर में रखा हुआ था। कोर्ट ने मामले की गहन जांच का आदेश दिया है।

रहीम का दावा भारतीय नागरिकता का

अब्दुल रहीम ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया कि उनका जन्म 14 अप्रैल 1979 को दिल्ली के न्यू सीमापुरी में हुआ था। वे पूरे जीवन भारत में ही रहे, काम किया और कारोबार चलाया। उनके पास जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट, आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी, ड्राइविंग लाइसेंस और परिवार से जुड़े कई अन्य सरकारी दस्तावेज मौजूद हैं। 2014 से वे बेंगलुरु में वेस्ट मैनेजमेंट और स्क्रैप ट्रेडिंग का कारोबार चला रहे हैं। उनके पास जीएसटी रजिस्ट्रेशन भी है।

कब और कैसे हुई गिरफ्तारी

5 मार्च को बेंगलुरु पुलिस ने कथित अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान अभियान के दौरान रहीम को परप्पना अग्रहरा पुलिस स्टेशन में हिरासत में लिया। उसी दिन एफआरआरओ ने विदेशी कानून की धारा के तहत आदेश जारी कर उन्हें कोठनूर के यूटाइल फाउंडेशन डिटेंशन सेंटर में भेज दिया। एफआरआरओ के आदेश में उन्हें मोहम्मद रहीम हवलदार पुत्र मोहम्मद मोतलेब हवलदार बताया गया।

यूपी का पुराना केस और दोहरी सजा का मुद्दा

याचिका में बताया गया कि 2010 में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में एक केस दर्ज हुआ था। 2012 में अदालत ने रहीम को विदेशी कानून के तहत दोषी ठहराया। उसमें उन्हें बांग्लादेश का रहने वाला बताया गया। लेकिन रहीम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील की जो अभी लंबित है और उन्हें जमानत भी मिली हुई है। उनके वकील क्लिफ्टन डी रोजारियो ने कोर्ट में कहा कि एफआरआरओ का आदेश दोहरी सजा के सिद्धांत का उल्लंघन है।

हाईकोर्ट का फैसला

जस्टिस सुरज गोविंदराज ने सोमवार को सुनवाई के दौरान एफआरआरओ को रहीम की पहचान की गहन जांच करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने पूछा कि क्या यूपी का केस और यह मामला एक ही व्यक्ति से जुड़ा है। एफआरआरओ को इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित अपील की स्थिति भी स्पष्ट करने को कहा गया। कोर्ट ने कहा कि अगली सुनवाई 14 जुलाई को होगी और तब तक रहीम को निर्वासित नहीं किया जाए।

कानूनी सवाल

याचिका में दावा किया गया कि बिना नोटिस दिए, बिना सुनवाई का मौका दिए और बिना सही जांच के डिटेंशन आदेश जारी किया गया। इससे संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 22 का उल्लंघन हुआ। परिवार में पत्नी और छोटे बच्चे होने के कारण भी काफी परेशानी हो रही है।

यह मामला उन कई घटनाओं में से एक है जहां पहचान को लेकर विवाद खड़ा हो रहा है। हाईकोर्ट का यह अंतरिम आदेश रहीम को तत्काल राहत देता है लेकिन असली फैसला जांच और अगली सुनवाई के बाद होगा।

क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

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