(रईस खान)
इनसे मिलिए आवेश अहमद से जो कर्नाटक के छोटे से गांव अल्दूर में पैदा हुए लेकिन आज बेंगलुरु में पृथ्वी की निगरानी करने वाली सैटेलाइट बना रहे हैं। ये पंचर नहीं बल्कि हाइपरस्पेक्ट्रल सैटेलाइट बनाते हैं जो जमीन पानी फसल और पर्यावरण को बहुत बारीकी से देखती हैं। पिक्सेल नाम की उनकी कंपनी आज भारत की सबसे चर्चित स्पेस टेक कंपनी बन गई है।
गांव का बचपन और स्पेस का जुनून
आवेश का बचपन इंटरनेट और स्मार्टफोन के बिना गुजरा। वे किताबें और एनसाइक्लोपीडिया पढ़कर स्पेस के दीवाने हो गए। चिक्कमगलूर जिले के इस गांव से पांच घंटे दूर बेंगलुरु है। स्कूल की लाइब्रेरी उनके लिए खजाना थी। बाद में BITS पिलानी कॉलेज में मैथमेटिक्स की पढ़ाई की। कॉलेज के दिनों में ISRO के साथ स्टूडेंट सैटेलाइट प्रोजेक्ट पर काम किया और हाइपरलूप इंडिया टीम में इंजीनियरिंग लीड बने। स्पेसएक्स के कॉम्पिटिशन में भारत की तरफ से पहुंचने वाली टीम में शामिल थे।
दस हजार रुपये से शुरू हुई कंपनी
सन् दो हजार उन्नीस में अभी पढ़ाई खत्म नहीं हुई थी तब दोस्त क्षितिज खंडेलवाल के साथ पिक्सेल कंपनी शुरू की। पैसे अब्बा से उधार लिए। महीने का खर्च सिर्फ दस हजार रुपये में चलाते हुए काम आगे बढ़ाया। कोई बड़ा ऑफिस नहीं कोई बड़ा निवेश नहीं बस जुनून और मेहनत थी। कंपनी का मकसद पृथ्वी का हेल्थ मॉनिटर बनाना था जो सामान्य सैटेलाइट से ज्यादा डिटेल दे सके।
मुश्किलें और मेहनत का सफर
शुरू के दिनों में बहुत चुनौतियां आईं। हार्डवेयर वाली स्पेस कंपनी शुरू करना आसान नहीं था। लेकिन आवेश और उनकी टीम ने हिम्मत नहीं हारी। पहले कुछ डेमो सैटेलाइट लॉन्च किए जैसे शकुंतला और आनंद। इनसे मिले डेटा ने दिखाया कि उनकी टेक्नोलॉजी कितनी ताकतवर है। कंपनी ने अपना बड़ा फैक्टरी भी बनाया जहां सैटेलाइट बनाए जाते हैं।
बड़ी कामयाबी और नासा का कॉन्ट्रैक्ट
आज पिक्सेल ने फायरफ्लाई नाम के छह कमर्शियल सैटेलाइट लॉन्च कर दिए हैं। ये सैटेलाइट दो सौ पचास से ज्यादा स्पेक्ट्रल बैंड में देखती हैं यानी बहुत ज्यादा जानकारी देती हैं। कृषि माइनिंग पर्यावरण और क्लाइमेट चेंज सबमें मदद करती हैं। कंपनी को गूगल रेडिकल वेंचर्स लाइटस्पीड और दूसरे बड़े निवेशकों से पचानवे मिलियन डॉलर यानी करीब नौ सौ करोड़ रुपये मिल चुके हैं।
सन् दो हजार चौबीस में नासा ने पिक्सेल को बड़ा कॉन्ट्रैक्ट दिया। ये भारत की पहली प्राइवेट स्पेस कंपनी है जिसे नासा से सीधा काम मिला। अमेरिकी सरकार और रिसर्चर्स को हाइपरस्पेक्ट्रल डेटा देगी। कंपनी टाइम मैगजीन वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम एमआईटी इनोवेटर्स अंडर थर्टी और फोर्ब्स थर्टी अंडर थर्टी जैसी बड़ी लिस्ट में शामिल हो चुकी है।
पृथ्वी की सेवा और आगे का सपना
पिक्सेल सिर्फ सैटेलाइट नहीं बनाती बल्कि डेटा का पूरा प्लेटफॉर्म भी तैयार करती है। इससे किसान बेहतर फसल उगा सकते हैं कंपनियां पर्यावरण बचाने का काम कर सकती हैं और सरकारें सही फैसले ले सकती हैं। आवेश का सपना है कि स्पेस टेक्नोलॉजी से पृथ्वी को बेहतर बनाया जाए और आगे चलकर सोलर सिस्टम में भी रिसोर्सेस ढूंढे जाएं।
प्रेरणा का सबक
आवेश अहमद की कहानी बताती है कि छोटे गांव से निकलकर भी बड़े सपने पूरे किए जा सकते हैं। अब्बा से उधार लेकर शुरू की गई कंपनी आज दुनिया भर में चर्चा का विषय है। मेहनत जुनून और सही दिशा से कुछ भी नामुमकिन नहीं। भारत की स्पेस इंडस्ट्री में प्राइवेट कंपनियों का यह सफर देश के लिए गर्व की बात है।
आवेश जैसे युवा हमें याद दिलाते हैं कि सपनों को हकीकत बनाने के लिए बस शुरूआत जरूरी है। पिक्सेल का सफर अभी जारी है और आगे और बड़ी कामयाबी का इंतजार है।

