पड़ताल – राजस्थान के सीमावर्ती इलाकों में मस्जिदों पर कार्रवाई

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एपीसीआर की फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट ने उठाए कई अहम सवाल

राजस्थान के भारत-पाकिस्तान सीमा से लगे इलाकों में मस्जिदों, मदरसों, ईदगाहों, दरगाहों और कब्रिस्तानों पर हुई प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर अब बहस और तेज़ हो गई है। इसी बीच एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स, एपीसीआर की राजस्थान इकाई ने “नोटिसेज़, फेथ एंड जस्टिस” नाम से एक फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बाड़मेर, जैसलमेर और बीकानेर ज़िलों में कई धार्मिक स्थलों के खिलाफ की गई कार्रवाई के दौरान कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह पालन नहीं किया गया।

रिपोर्ट के मुताबिक़ इन इलाकों में मस्जिदों, मदरसों, ईदगाहों, दरगाहों और कब्रिस्तानों को राजस्थान लैंड रेवेन्यू एक्ट, पंचायती राज नियम, कॉलोनाइज़ेशन एक्ट और दूसरे क़ानूनी प्रावधानों के तहत नोटिस जारी किए गए। लेकिन कई मामलों में नोटिस जिस तारीख़ का था, वह संबंधित लोगों को कई दिन बाद मिला। इससे प्रभावित लोगों को अपना जवाब तैयार करने, दस्तावेज़ जुटाने या क़ानूनी मदद लेने के लिए सिर्फ़ एक से तीन दिन का ही समय मिल सका। एपीसीआर का कहना है कि यह प्राकृतिक न्याय के बुनियादी उसूलों के ख़िलाफ़ है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अब तक बाड़मेर में छह मस्जिदों, जैसलमेर में दो मस्जिदों और कई मज़ारों तथा बीकानेर में एक मस्जिद और दो मज़ारों पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जा चुकी है। इसके अलावा कई दूसरे मामलों में बेदखली और ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया जारी है, जबकि कुछ मामले अदालतों में विचाराधीन हैं।

एपीसीआर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हर ज़मीन की अपनी अलग क़ानूनी हैसियत होती है। कहीं ज़मीन गोचर है, कहीं ओरन, कहीं खातेदारी और कहीं आबादी की श्रेणी में दर्ज है। कई जगह पुराने सरकारी रिकॉर्ड और मौजूदा दस्तावेज़ों में भी अंतर दिखाई देता है। इसलिए किसी एक जैसी कार्रवाई के बजाय हर मामले की अलग-अलग और निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जिन मामलों की सुनवाई अदालतों में चल रही है, उनमें अंतिम फ़ैसला आने तक ऐसी कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए जिससे बाद में स्थिति को पहले जैसा करना संभव न रहे। साथ ही लोगों को पर्याप्त समय देकर अपनी बात रखने का मौक़ा मिलना चाहिए और ज़मीन के रिकॉर्ड तथा वक़्फ़ दस्तावेज़ों की स्वतंत्र जाँच कराई जानी चाहिए। एपीसीआर का कहना है कि बातचीत, पारदर्शिता और संवैधानिक प्रक्रिया के ज़रिए ऐसे विवादों का बेहतर समाधान निकाला जा सकता है।

संगठन ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसकी यह रिपोर्ट किसी समुदाय के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। रिपोर्ट का मक़सद सिर्फ़ यह सुनिश्चित करना है कि प्रशासन की हर कार्रवाई संविधान, क़ानून और प्राकृतिक न्याय के उसूलों के मुताबिक़ हो। एपीसीआर का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, नागरिक अधिकार और सांप्रदायिक सद्भाव एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि तीनों को साथ लेकर चलना ही लोकतंत्र की असली पहचान है।

रिपोर्ट के अनुसार यह पूरी कार्रवाई केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय की ओर से सीमा से लगभग पंद्रह किलोमीटर के दायरे में कथित अवैध अतिक्रमण हटाने के निर्देशों के बाद तेज़ हुई। एपीसीआर का मानना है कि यह अभियान केवल कुछ स्थानों तक सीमित नहीं है और आगे दूसरे सीमावर्ती ज़िलों तक भी पहुँच सकता है।

यह रिपोर्ट क्षेत्र के दौरे, स्थानीय लोगों, मस्जिद कमेटियों, वकीलों, जनप्रतिनिधियों और उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड के अध्ययन के आधार पर तैयार की गई है। इस समय यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट सहित विभिन्न अदालतों में भी विचाराधीन है। ऐसे में आने वाले दिनों में अदालतों के फ़ैसले और प्रशासन की आगे की कार्रवाई पर सभी की नज़रें टिकी रहेंगी।

क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

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