(कमरुल ज़फर)
विदेश में फंसे भारतीयों के लिए उम्मीद बने भोपाल के सैयद आबिद हुसैन
रात का कोई वक्त हो सकता है।
मोबाइल की घंटी बजती है। दूसरी तरफ कोई मां रो रही होती है, कोई पिता परेशान होता है या कोई पत्नी अपने पति की सलामती के लिए बेचैन होती है।
कभी आवाज आती है,
“साहब, मेरा बेटा विदेश में फंस गया है। उसे किसी तरह घर वापस बुला दीजिए।”
कभी कोई मजदूर बताता है कि उसका पासपोर्ट उसके मालिक ने रख लिया है। पैसे खत्म हो चुके हैं। घर वालों से बात करना भी मुश्किल है।
और कभी मामला इससे भी ज्यादा दर्दनाक होता है। कोई भारतीय जेल में बंद है। किसी के पास कागज नहीं हैं। कोई एजेंट के झांसे में विदेश पहुंच गया और अब वापस आने का रास्ता नहीं मिल रहा।
ऐसी हर कॉल के बाद भोपाल में रहने वाले सैयद आबिद हुसैन की एक नई कोशिश शुरू हो जाती है।
उनके लिए यह सिर्फ किसी की मदद करने का मामला नहीं होता। यह उस परिवार को उसकी खोई हुई उम्मीद वापस देने की कोशिश होती है।
इसी वजह से लोग उन्हें प्यार से “रियल लाइफ बजरंगी भाईजान” कहते हैं।
लेकिन आबिद के लिए यह कोई तमगा नहीं है।
उनकी अपनी बात में इसका जवाब बहुत सीधा है,
“यह अल्लाह का काम है। कोई परिवार मदद के लिए आता है तो मैं अपनी कोशिश शुरू कर देता हूं।”
उत्तर प्रदेश के छोटे से गांव से भोपाल तक
आबिद हुसैन मूल रूप से उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर जिले के रुद्रपुर भगाही गांव के रहने वाले हैं।
साल 2006 में वह काम की तलाश में भोपाल आए। पेंटिंग और इंटीरियर डिजाइनिंग उनका पेशा बना। जिंदगी इसी काम में आगे बढ़ रही थी।
लेकिन शायद उनकी जिंदगी में एक दूसरा काम भी लिखा था।
ऐसा काम जिसके लिए न कोई दफ्तर था, न कोई बड़ी संस्था और न कोई तय वेतन।
सिर्फ एक मोबाइल फोन था और किसी परेशान इंसान की आवाज।
एक बच्चे से शुरू हुई सोच
2016 के आसपास एक मामला सामने आया। बांग्लादेश का एक बच्चा भोपाल में फंस गया था। आबिद ने उसकी मदद की और उसे घर पहुंचाने की कोशिश की।
इसी दौरान उनके मन में एक सवाल उठा।
अगर एक विदेशी बच्चा यहां फंस सकता है तो हमारे देश के लोग भी तो दूसरे देशों में मुसीबत में फंसे होंगे।
फिर एक और मामला सामने आया।
अंबेडकरनगर का जितेंद्र अर्जुनवार पाकिस्तान की जेल में बंद था। वह मानसिक रूप से कमजोर बताया गया था। उसकी घर वापसी आसान नहीं थी। लंबे प्रयास और सरकारी स्तर पर बातचीत के बाद वह भारत लौट सका।
यहीं से आबिद के लिए यह काम धीरे धीरे एक जिम्मेदारी बनता चला गया।
आबिद का दफ्तर एक मोबाइल फोन है
उनके पास कोई बड़ा कार्यालय नहीं है।
कोई लंबी चौड़ी टीम नहीं है।
उनका सबसे बड़ा सहारा उनका मोबाइल फोन है।
जब किसी भारतीय के विदेश में फंसने की जानकारी मिलती है तो सबसे पहले वह मामले को समझते हैं। फिर व्यक्ति की पहचान और उसके कागजात की जानकारी जुटाते हैं।
इसके बाद संबंधित भारतीय दूतावास, विदेश मंत्रालय और वहां के अधिकारियों से संपर्क शुरू होता है।
कई बार एक फोन से काम हो जाता है।
कई बार दर्जनों फोन करने पड़ते हैं।
कई बार सोशल मीडिया पर मामला उठाना पड़ता है।
और कभी कई सप्ताह तक इंतजार करना पड़ता है।
पासपोर्ट का मामला हो तो अलग प्रक्रिया। जेल का मामला हो तो अलग प्रक्रिया। बीमारी हो तो अलग परेशानी।
लेकिन आबिद की कोशिश तब तक जारी रहती है जब तक सामने वाले के लिए घर लौटने का कोई रास्ता नहीं निकल आता।
किसी के पास पैसे नहीं, किसी के पास कागज नहीं
विदेश जाना आज लाखों भारतीयों का सपना है।
कोई अच्छी नौकरी की उम्मीद में जाता है। कोई परिवार की गरीबी दूर करने के लिए। कोई बच्चों की पढ़ाई और घर बनाने के सपने लेकर।
लेकिन हर कहानी अच्छी नहीं होती।
कुछ लोग गलत एजेंट के चक्कर में फंस जाते हैं। कुछ को वहां के कानूनों की जानकारी नहीं होती। कुछ के साथ नौकरी के नाम पर धोखा होता है।
कई मजदूरों के पास लौटने के लिए पैसे नहीं बचते।
कुछ लोगों के पास पासपोर्ट नहीं रहता।
और जब घर से हजारों किलोमीटर दूर कोई इंसान ऐसी हालत में फंस जाता है तो उसके परिवार के लिए वह दूरी बहुत बड़ी हो जाती है।
ऐसे समय में आबिद का फोन उनके लिए उम्मीद बन जाता है।
पाकिस्तान से लेकर खाड़ी देशों तक
आबिद की कोशिशें किसी एक देश तक सीमित नहीं रही हैं।
पाकिस्तान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, ओमान, बहरीन, मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका और दूसरे देशों में फंसे भारतीयों की वापसी में उन्होंने मदद की है। अलग अलग राज्यों के लोग उनके संपर्क में आए हैं।
किसी के घर में बेटा वापस आया।
किसी के घर में पति।
किसी परिवार ने बरसों बाद अपने भाई को देखा।
इन कहानियों की कोई एक तस्वीर नहीं होती।
लेकिन हर कहानी का अंत एक ही होता है।
दरवाजा खुलता है और सामने अपना इंसान खड़ा होता है।
एक हजार से ज्यादा घरों में लौटी खुशी
हाल की जानकारी के मुताबिक आबिद हुसैन अब तक एक हजार से ज्यादा भारतीयों की वतन वापसी में मदद कर चुके हैं। यह संख्या कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हर मामले में अलग देश, अलग कानून और अलग सरकारी प्रक्रिया सामने आती है।
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि आबिद खुद अपनी मदद का हिसाब रखने में बहुत दिलचस्पी नहीं रखते।
उनके लिए संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण वह परिवार है जिसका इंतजार खत्म हो गया।
मदद के बदले कुछ नहीं
इस पूरी कहानी का शायद सबसे खूबसूरत हिस्सा यही है।
आबिद इन मदद के बदले लोगों से कोई फीस नहीं लेते।
उनका कहना है कि किसी मजबूर इंसान को घर पहुंचाने का काम किसी सौदे का हिस्सा नहीं हो सकता।
उन्हें कई सम्मान मिले हैं। समाजसेवा के लिए उन्हें अलग अलग जगहों पर सम्मानित किया गया है। लेकिन आबिद के लिए असली खुशी तब होती है जब कोई परेशान इंसान अपने परिवार के पास पहुंच जाता है।
सोशल मीडिया को शिकायत नहीं, सहारा बनाया
आज सोशल मीडिया पर बहुत कुछ वायरल होता है।
कभी अफवाहें फैलती हैं। कभी झूठी खबरें।
लेकिन आबिद ने इसी माध्यम को लोगों की मदद का रास्ता बना दिया।
किसी भारतीय के विदेश में फंसने की खबर मिलती है तो वह संबंधित लोगों तक मामला पहुंचाते हैं। अधिकारियों को जानकारी देते हैं। दूतावासों से संपर्क करते हैं और जरूरत पड़ने पर मामला सार्वजनिक भी करते हैं।
उनकी कोशिश का मकसद शोर मचाना नहीं होता।
मकसद होता है कि जिस इंसान की आवाज विदेश की दीवारों में दब गई है, वह भारत तक पहुंच सके।
आबिद की कहानी सिर्फ एक आदमी की कहानी नहीं
आबिद हुसैन की कहानी को केवल समाजसेवा की कहानी मान लेना शायद अधूरा होगा।
यह उस भारत की कहानी भी है जहां एक आम आदमी दूसरे आम आदमी के लिए खड़ा हो सकता है।
न कोई सरकारी पद।
न कोई बड़ी ताकत।
न कोई करोड़ों रुपये का फंड।
बस एक मोबाइल फोन, कुछ संपर्क, थोड़ा अनुभव और मदद करने का मजबूत इरादा।
एक परिवार के लिए शायद यह छोटी बात लगे।
लेकिन जिस मां का बेटा महीनों से विदेश में फंसा हो, उसके लिए एक फोन कॉल पूरी दुनिया बदल सकती है।
जिस पत्नी को पति की कोई खबर न मिल रही हो, उसके लिए आबिद की एक कोशिश उम्मीद बन सकती है।
और जिस मजदूर को लगने लगे कि अब वह कभी अपने घर नहीं लौट पाएगा, उसके लिए भारत की मिट्टी तक पहुंचना जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी हो सकती है।
वतन सिर्फ एक जगह नहीं होता
वतन वह जगह है जहां किसी की मां इंतजार कर रही होती है।
जहां बच्चे दरवाजे की तरफ देखते हैं।
जहां पत्नी हर फोन की घंटी पर चौंक जाती है।
जहां बूढ़ा पिता अपने बेटे की राह देखता है।
विदेश में फंसे किसी भारतीय को वापस लाना इसलिए सिर्फ यात्रा पूरी करवाना नहीं है।
यह एक परिवार को फिर से जोड़ना है।
आबिद हुसैन इसी काम में लगे हैं।
भोपाल में अपने रोजमर्रा के काम के साथ उनका मोबाइल लगातार बजता रहता है।
किसी अनजान देश से कोई आवाज आती है।
किसी मां की आंखों में आंसू होते हैं।
किसी परिवार के पास सिर्फ एक उम्मीद बची होती है।
और फिर आबिद कहते हैं,
“आप चिंता मत कीजिए, हम कोशिश करते हैं।”
शायद उनकी पूरी कहानी इसी एक वाक्य में छिपी है।
किसी की उम्मीद जब आखिरी सांस लेने लगे, तब उसके लिए खड़े हो जाना ही असली इंसानियत है।
और सैयद आबिद हुसैन आज भी इसी इंसानियत की लड़ाई लड़ रहे हैं।

