पेश है महाराष्ट्र के सबसे बड़े तालीमी इदारे अंजुमन-ए-इस्लाम के प्रेसिडेंट डॉ. ज़हीर काज़ी से मुस्लिम समाज के तालीमी मसाएल पर की गई बातचीत। बात की है क़ौमी फ़रमान के एडिटर रईस खान ने
सवाल
दक्षिण और पश्चिम भारत के मुसलमान शिक्षा और तरक्की में आगे दिखाई देते हैं, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में स्थिति अभी भी चिंताजनक है। आप इसे कैसे देखते हैं?
डॉ. ज़हीर काज़ी:
अगर आप पूरे देश को देखें तो दक्षिण भारत और पश्चिम भारत के लोगों ने शिक्षा के क्षेत्र में लगातार मेहनत की है। उसी का नतीजा है कि आज वे हर क्षेत्र में आगे बढ़े हैं।
उत्तर प्रदेश और बिहार में अभी बहुत काम करने की ज़रूरत है। मेरा अपना अनुभव है कि वहाँ के बहुत से बच्चे ऐसे परिवारों से आते हैं जहाँ रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी ज़रूरतें भी पूरी नहीं होतीं। लेकिन इन बच्चों में पढ़ने और आगे बढ़ने की जो लगन होती है, वह कई बार उन बच्चों से भी ज़्यादा होती है जिनके पास हर तरह की सुविधा मौजूद है।
सवाल
अंजुमन-ए-इस्लाम को 152 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इसकी सफलता का राज़ क्या है?
जवाब
अंजुमन-ए-इस्लाम ने कभी एक जगह रुककर काम नहीं किया। पिछले 152 वर्षों में उसने लगातार तरक्की की है। इसकी सबसे बड़ी वजह इसके दूरदर्शी संस्थापक और बाद के नेतृत्व की बेहतर योजना रही। हर दौर में लोगों ने समय की ज़रूरत को समझा और उसी के अनुसार संस्थान को आगे बढ़ाया। इसलिए आज अंजुमन एक मिसाली तालीमी इदारा बन चुका है।
सवाल
क्या अंजुमन ने महाराष्ट्र के बाहर भी काम करने की कोशिश की?
जवाब
अभी तक हमारा ज़्यादातर काम महाराष्ट्र में ही रहा है। लेकिन हमने हमेशा कोशिश की कि उत्तर प्रदेश, बिहार और दूसरे राज्यों के लोग भी मिलकर शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ें।
अफसोस की बात यह है कि अक्सर लोग बड़े जोश के साथ शुरुआत करते हैं, लेकिन कुछ ही समय बाद वह जोश ठंडा पड़ जाता है। यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी रही है।
सवाल
आपने बिहार के किशनगंज का ज़िक्र किया था ?
जवाब
जी हाँ। जब हम वहाँ गए तो देखा कि मदरसे तो हैं, लेकिन आधुनिक शिक्षा के संस्थान बहुत कम हैं। यही वजह है कि मुस्लिम समाज की शिक्षा से जुड़ी जो राष्ट्रीय तस्वीर सामने आती है, उसमें हमारी स्थिति पीछे दिखाई देती है। अगर इस पूरे क्षेत्र में योजनाबद्ध तरीके से मेहनत की जाए तो बहुत तेज़ी से बदलाव लाया जा सकता है।
सवाल
आजकल उलमा भी दीन के साथ-साथ दुनियावी शिक्षा पर ज़ोर दे रहे हैं। क्या आप इसे सकारात्मक बदलाव मानते हैं?
जवाब
बिल्कुल। यह बहुत अच्छी और ज़रूरी सोच है। मदरसों में भी जागरूकता आई है और लोग अब समझ रहे हैं कि केवल दीन की नहीं, बल्कि दुनिया की शिक्षा भी ज़रूरी है। आज के दौर में दोनों का साथ होना ही समाज की ज़रूरत है।
सवाल
फिर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में शिक्षा का स्तर अपेक्षित क्यों नहीं बन पाया?
जवाब
मेरे विचार से इसका एक कारण यह भी है कि जिन लोगों ने व्यापार और दूसरे क्षेत्रों में बड़ी सफलता हासिल की, उन्होंने अपने इलाकों की शिक्षा पर उतना ध्यान नहीं दिया।
मैं हाल ही में कनाडा गया था। वहाँ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्रों के कार्यक्रम में शामिल हुआ। मैंने देखा कि कई लोग अपने-अपने शहरों और जिलों में छोटे स्तर पर बच्चों की पढ़ाई के लिए काम शुरू कर चुके हैं। वे अच्छे ट्यूटर रखते हैं, बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराते हैं और उनका दाखिला बेहतर संस्थानों में कराने की कोशिश करते हैं।
यह अच्छी शुरुआत है, लेकिन हमें छोटे-छोटे प्रयासों से आगे बढ़कर बड़े स्तर पर काम करना होगा। हमारे पास समय कम है और शिक्षा का जो बैकलॉग है, उसे तेज़ी से पूरा करना होगा।
सवाल
क्या उत्तर प्रदेश में अंजुमन-ए-इस्लाम जैसी संस्था विकसित की जा सकती है?
जवाब
हमारी कोशिश लगातार जारी है। बाराबंकी के जहाँगीराबाद इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के साथ भी हमने बातचीत की। हमारी विशेषज्ञ टीम वहाँ गई, सर्वे किया और विस्तृत रिपोर्ट तैयार की। हमारी इच्छा है कि वहाँ शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर बनाई जाए।
हमारा उद्देश्य केवल इमारतें खड़ी करना नहीं, बल्कि ऐसी शिक्षा देना है जिससे छात्रों को अच्छी नौकरियाँ और बेहतर भविष्य मिल सके।
सवाल
आपके संस्थान की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
जवाब
हमारा मॉडल व्यावसायिक नहीं, बल्कि चैरिटेबल है। जो भी आय होती है, उसे फिर शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में लगाया जाता है।
हमारा अनुभव है कि सबसे बड़ी सफलता अक्सर उन्हीं बच्चों को मिलती है जो आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। अंग्रेज़ी में कहते हैं,
“The poorest of the poor have fire in their belly.”
यानी जिनके पास कम साधन होते हैं, उनके भीतर आगे बढ़ने की सबसे ज़्यादा भूख होती है।
अगर हमें उत्तर प्रदेश और बिहार में काम करने का अवसर मिला तो हमारा उद्देश्य भी यही रहेगा कि गरीब लेकिन प्रतिभाशाली बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले।
सवाल
मुस्लिम समाज की शैक्षिक पिछड़ेपन से निकलने के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
जवाब
मेरा अनुभव कहता है कि कोई भी काम असंभव नहीं है। हमें हर बात के लिए केवल सरकार की ओर देखने की आदत छोड़नी होगी।
हमारे समाज में अल्लाह ने ज़कात, सदक़ा और सामाजिक सहयोग का बेहतरीन निज़ाम दिया है। अगर हम उसे सही तरीके से लागू करें तो शिक्षा के लिए बहुत बड़े संसाधन तैयार किए जा सकते हैं।
मेरी अपील है कि सामाजिक संस्थाएँ, एनजीओ, मीडिया और मस्जिदें सभी शिक्षा के लिए जन-जागरण अभियान चलाएँ। जुमे के ख़ुत्बों में भी पाँच-दस मिनट शिक्षा की अहमियत पर बात होनी चाहिए।
दीन के साथ-साथ दुनियावी तालीम का पैग़ाम हर घर तक पहुँचना चाहिए।
सवाल
आख़िर में आप समाज के संपन्न लोगों से क्या कहना चाहेंगे?
जवाब
मैं समाज के संपन्न लोगों और सियासी नेतृत्व से भी कहना चाहूँगा कि आपकी तरक्की, समाज की बदौलत ही संभव हुई है। इसलिए अब आपकी ज़िम्मेदारी है कि अपनी व्यक्तिगत सफलता के साथ-साथ पूरी कौम की तरक्की के लिए भी आगे आएँ।
अगर हम शिक्षा में निवेश करेंगे तो आने वाली नस्लें मज़बूत होंगी और समाज अपने आप आगे बढ़ेगा।
क़ौमी फ़रमान से बातचीत में डॉ. ज़हीर काज़ी ने साफ़ कहा कि मुस्लिम समाज की तरक्की का सबसे बड़ा रास्ता शिक्षा है। उन्होंने दीन और दुनियावी तालीम के संतुलन, सामाजिक सहयोग, संस्थागत प्रयास और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को भविष्य की कुंजी बताया। उनके अनुसार यदि समाज मिलकर योजनाबद्ध तरीके से काम करे तो उत्तर प्रदेश, बिहार और देश के अन्य पिछड़े इलाकों में भी शिक्षा की नई क्रांति लाई जा सकती है।

