बांग्लादेशी नागरिक’ होने के शक में 87 दिन हिरासत

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70 वर्षीय जलील अख्तर को मिली जमानत

पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले के बागरुई गांव निवासी 70 वर्षीय जलील अख्तर को कथित तौर पर बांग्लादेशी नागरिक होने के शक में 87 दिन हिरासत में रखने के बाद अदालत ने जमानत दे दी। एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (एपीसीआर) के मुताबिक, संगठन की कानूनी कोशिशों और दस्तावेजों की जांच के बाद यह राहत मिली। जलील अख्तर को 15 सितंबर को औपचारिक रूप से हिरासत से रिहा किया गया।

जलील अख्तर को 19 जून की रात डालखोला थाने की पुलिस ने उस समय हिरासत में लिया था, जब वह अपने घर के बाहर सो रहे थे। इसके बाद उन्हें करीब 35 किलोमीटर दूर निजामपुर स्थित हिरासत केंद्र और इस्लामपुर जेल के बीच स्थानांतरित किया जाता रहा। एपीसीआर के अनुसार, उन्हें चार से पांच दिनों तक बांग्लादेश सीमा के नजदीक भी रखा गया।

हिरासत में लिए जाने के बाद उनके परिवार ने उनकी भारतीय नागरिकता के समर्थन में कई सरकारी दस्तावेज अदालत के सामने पेश किए। परिवार के मुताबिक, जलील अख्तर का नाम 1995 की मतदाता सूची के साथ-साथ 2002 और 2026 की चुनावी सूचियों में भी दर्ज है। पुलिस की केस डायरी में मौजूद रिकॉर्ड का हवाला देते हुए परिवार ने अदालत को बताया कि जलील अख्तर 1982 से होने वाले चुनावों में मतदान करते रहे हैं।

इस मामले में इस्लामपुर अदालत में सुनवाई के दौरान एपीसीआर की फैक्ट फाइंडिंग और कानूनी टीम ने दस्तावेजों की औपचारिक जांच कराने की मांग की। टीम में अधिवक्ता फिरोज अहमद और हाई कोर्ट के वकील सैयद नाफिरुल इस्लाम शामिल थे। अदालत के निर्देश पर जांच अधिकारी ने बाद में अपनी रिपोर्ट पेश की, जिसमें जलील अख्तर के वोटर आईडी कार्ड, पैन कार्ड, 1995 की मतदाता सूची में दर्ज रिकॉर्ड और 2002 के एसआईआर रिकॉर्ड की प्रामाणिकता की पुष्टि की गई।

जलील अख्तर की जमानत याचिका पर सुनवाई चार बार टली। एपीसीआर के मुताबिक, पुलिस ने हर बार दस्तावेजों की पुष्टि में देरी को इसकी वजह बताया। बचाव पक्ष ने अदालत में यह भी दलील दी कि भारतीय नागरिकता कानून के तहत 1987 से पहले जन्मे व्यक्ति के लिए अपनी नागरिकता साबित करने के लिए माता-पिता के जन्म प्रमाणपत्र पेश करना अनिवार्य नहीं है।

2 सितंबर को हुई सुनवाई में अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अदालत में पेश किए गए सरकारी रिकॉर्ड और जलील अख्तर की हिरासत की परिस्थितियों पर विचार किया। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि उन्हें देश से बाहर भेजने की कई कोशिशें पूरी नहीं हो सकीं और उनकी नागरिकता का अंतिम फैसला अभी संबंधित सक्षम प्राधिकारी द्वारा किया जाना बाकी है।

अदालत ने अपने आदेश में जलील अख्तर की उम्र, किसी पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड का नहीं होना, पेश किए गए कुछ सरकारी दस्तावेजों का सत्यापन, लगातार चुनावी सूचियों में उनका नाम दर्ज होना और दस्तावेजों के फर्जी होने का कोई प्रमाण सामने नहीं आने जैसे पहलुओं पर गौर किया। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि पुलिस ने आगे हिरासत में रखकर जांच करने की मांग नहीं की थी और उनके फरार होने या जांच में बाधा डालने का कोई ठोस आधार सामने नहीं आया।

इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने कहा कि जलील अख्तर को आगे हिरासत में रखने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा और उन्हें जमानत दे दी। हालांकि, अदालत के आदेश के अनुसार उनकी नागरिकता का अंतिम निर्धारण अभी सक्षम प्राधिकारी द्वारा किया जाना बाकी है।

एपीसीआर ने कहा कि मामले में उसकी भूमिका में तथ्य-जांच, कानूनी सहायता और परिवार की ओर से पेश किए गए दस्तावेजों के सत्यापन के लिए प्रयास शामिल थे। संगठन की टीम ने कानूनी सहायता उपलब्ध कराने वाले वकील और बचाव पक्ष के अधिवक्ता के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि महत्वपूर्ण दस्तावेज अदालत के सामने रखे जाएं और उनकी आधिकारिक पुष्टि हो सके।

क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

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