अलविदा ज़ैनब चौहान — बिसलेरी की ‘फर्स्ट लेडी’ की खामोश लेकिन असरदार कहानी

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(रईस खान, मुम्बई) 

कुछ लोग किसी कंपनी के नाम से पहचाने जाते हैं और कुछ लोग उस कंपनी की कहानी का ऐसा हिस्सा बन जाते हैं, जिसके बिना उसकी कामयाबी का सफर अधूरा लगता है। ज़ैनब रमेश चौहान का नाम बिसलेरी इंटरनेशनल की ऐसी ही कहानी से जुड़ा रहा। परिवार की ओर से प्रकाशित शोक-संदेश के बाद उनकी जिंदगी, उनकी कारोबारी भूमिका और समाज के लिए किए गए काम एक बार फिर चर्चा में हैं।

बिसलेरी इंटरनेशनल की आधिकारिक वेबसाइट उन्हें कंपनी की ‘फर्स्ट लेडी’ कहती है। वेबसाइट के मुताबिक वह कंपनी के चेयरमैन रमेश चौहान की पत्नी और वाइस चेयरपर्सन जयंती चौहान की मां थीं। लेकिन उनकी पहचान केवल एक कारोबारी परिवार की सदस्य तक सीमित नहीं थी। कंपनी के आधिकारिक परिचय के अनुसार, 1970 के दशक में थम्स अप, लिम्का और गोल्ड स्पॉट जैसे मशहूर ब्रांड्स की बुनियाद मजबूत करने में उनकी अहम भूमिका रही। उस समय सॉफ्ट ड्रिंक का कारोबार काफी हद तक पुरुषों के हाथ में था और ज़ैनब चौहान शुरुआती दौर की उन महिलाओं में थीं, जिन्होंने खुद बाजार में जाकर फ्रेंचाइज़ी पार्टनर्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स के साथ काम किया।

यह बात इसलिए भी अहम है कि आज जब कारोबार की दुनिया में महिला नेतृत्व सामान्य दिखाई देता है, उस दौर में किसी महिला का बाजार की सीधी जिम्मेदारी संभालना अपने आप में अलग बात थी। बिसलेरी की अपनी कहानी में ज़ैनब चौहान को सिर्फ परिवार की सदस्य नहीं, बल्कि उस कारोबारी सफर की एक अहम कड़ी के रूप में पेश किया गया है। कंपनी के मुताबिक उन्होंने फ्रेंचाइज़ी नेटवर्क के साथ रिश्ते बनाने और बाजार में ब्रांड की मौजूदगी मजबूत करने में काम किया।

परदे के पीछे की साझेदारी

रमेश चौहान ने भारतीय पेय कारोबार को जिस दौर में नई पहचान दी, उस सफर में ज़ैनब चौहान की मौजूदगी लगातार बनी रही। बिसलेरी के आधिकारिक परिचय में उन्हें रमेश चौहान की ‘पिलर ऑफ स्ट्रेंथ’ यानी मजबूत सहारा बताया गया है। यह कोई मामूली पारिवारिक परिचय नहीं, बल्कि उस साझेदारी की ओर इशारा करता है जिसमें कारोबार के सामने की दुनिया के साथ-साथ परिवार और कंपनी के पीछे की जिम्मेदारियां भी साथ चलती रहीं।

ज़ैनब चौहान का कारोबारी सफर उस समय से जुड़ा है जब चौहान परिवार के पेय कारोबार ने भारतीय बाजार में अपनी जगह बनाई। थम्स अप, लिम्का और गोल्ड स्पॉट बाद में भारतीय सॉफ्ट ड्रिंक संस्कृति के बेहद पहचाने जाने वाले नाम बने। 1993 में इन ब्रांड्स को कोका-कोला को बेच दिया गया और इसके बाद ज़ैनब चौहान ने कारोबारी भागदौड़ से खुद को पीछे करते हुए समाजी कामों पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया। बिसलेरी की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, उन्होंने वंचित बच्चों की तालीम को सपोर्ट किया और जरूरतमंद लोगों को खाना खिलाने जैसे कामों में दिलचस्पी ली।

कारोबार से ख़िदमत तक

उनकी जिंदगी का यह पहलू शायद कारोबारी दुनिया की चमक से ज्यादा महत्वपूर्ण है। कंपनी के अपने प्रोफ़ाइल के मुताबिक ज़ैनब चौहान को पढ़ने, शायरी, कला और अदब में खास दिलचस्पी थी। कारोबारी जिम्मेदारियों से पीछे हटने के बाद उनका वक्त समाजी कामों, तालीम और उन चीज़ों में गुजरा जिनसे उन्हें निजी तौर पर गहरा लगाव था।

यही वजह है कि उनकी तस्वीर केवल एक कामयाब कारोबारी परिवार की महिला की नहीं बनती। एक तरफ वह ऐसे दौर में बाजार में उतरीं जब कारोबार में महिलाओं की मौजूदगी आज जैसी आम नहीं थी, दूसरी तरफ बाद के दौर में उन्होंने अपनी तवज्जो उन बच्चों और जरूरतमंद लोगों की तरफ की जिन्हें मदद की जरूरत थी।

मां की परवरिश और जयंती का सफर

ज़ैनब और रमेश चौहान की बेटी जयंती चौहान आज बिसलेरी इंटरनेशनल की वाइस चेयरपर्सन हैं। बिसलेरी की आधिकारिक वेबसाइट उन्हें कंपनी की नेतृत्व टीम का हिस्सा बताती है। कारोबारी रिकॉर्ड में भी जयंती चौहान और ज़ैनब रमेश चौहान दोनों बिसलेरी इंटरनेशनल के निदेशक के रूप में दर्ज रही हैं।

अपनी मां के इसी निस्वार्थ प्यार और उनके वजूद को दुनिया के सामने सलाम करने के लिए बेटी जयंती ने अपने नाम के बीच में मां का उपनाम ‘खान’ जोड़कर खुद को जयंती खान चौहान लिखना शुरू किया। यह ज़ैनब जी की परवरिश का ही असर था कि उनकी बेटी आज ₹7,000 करोड़ के इस बिजनेस एम्पायर को बखूबी संभाल रही हैं।

बिसलेरी के कारोबार से जुड़ी एक दिलचस्प बात यह भी है कि मार्च 2024 तक उपलब्ध कारोबारी आंकड़ों के मुताबिक रमेश चौहान के पास कंपनी की 54 प्रतिशत हिस्सेदारी, जयंती चौहान के पास 33 प्रतिशत और ज़ैनब चौहान के पास 13 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। उसी वित्तीय वर्ष में कंपनी की परिचालन आय 2,689.69 करोड़ रुपये और कुल समेकित राजस्व 2,814.04 करोड़ रुपये दर्ज हुआ था, जबकि मुनाफा 316.95 करोड़ रुपये रहा।

इस कारोबारी साम्राज्य की कहानी में जयंती चौहान का आज का मुकाम भी एक अलग अध्याय है, लेकिन उसके पीछे परिवार की पिछली पीढ़ी की मेहनत और परवरिश की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

बिसलेरी से आगे की विरासत

ज़ैनब चौहान की कहानी को सिर्फ थम्स अप, लिम्का, गोल्ड स्पॉट या बिसलेरी के कारोबार तक सीमित करना शायद उनकी जिंदगी को छोटा कर देना होगा। उनकी असल कहानी उस बदलाव की कहानी है जिसमें एक महिला ने पहले कारोबारी दुनिया में अपनी जगह बनाई, बाजार की जमीनी हकीकत को समझा और फिर कामयाबी के बाद समाज और तालीम की तरफ अपना ध्यान लगाया।

उनकी जिंदगी का एक खास पहलू यह भी रहा कि उन्होंने शोहरत को अपने व्यक्तित्व पर हावी नहीं होने दिया। बिसलेरी की अपनी वेबसाइट उन्हें अदब, शायरी और कला की शौकीन बताती है। कारोबार की दुनिया में लंबे समय तक रहने के बावजूद उनकी पहचान सिर्फ बोर्डरूम या कंपनी के आंकड़ों से नहीं बनी।

आज जब बिसलेरी भारतीय कारोबारी दुनिया के सबसे पहचाने जाने वाले नामों में शामिल है, उसके इतिहास के पन्ने पलटने पर जयंती और रमेश चौहान के साथ ज़ैनब चौहान का नाम भी सामने आता है। उनका योगदान शायद उन लोगों की तरह सुर्खियों में नहीं रहा जो हर दिन कैमरों के सामने दिखाई देते हैं, लेकिन कंपनी की अपनी कहानी में उनकी जगह साफ तौर पर दर्ज है।

ज़ैनब चौहान की जिंदगी का सबसे खूबसूरत पहलू शायद यही है कि उन्होंने कामयाबी को सिर्फ दौलत और कारोबार तक सीमित नहीं रखा। बाजार में मेहनत करने से लेकर वंचित बच्चों की तालीम और जरूरतमंदों की मदद तक, उनके सफर में कारोबार के साथ इंसानी रिश्तों और ख़िदमत की भी जगह रही।

बिसलेरी की कहानी में उनका नाम लंबे समय तक एक ऐसी महिला के तौर पर याद किया जाएगा, जिसने शोहरत से ज्यादा अपने काम को अहमियत दी और कारोबार की चकाचौंध के पीछे रहकर उस सफर को मजबूती दी, जिसने भारतीय पेय बाजार की तस्वीर बदल दी।

 

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