(रईस खान)
मुस्लिम समाज के सामने आज सवालों की कमी नहीं है। वक्फ़ कानून से लेकर यूनिफॉर्म सिविल कोड, धार्मिक आज़ादी, व्यक्तिगत कानून और संवैधानिक अधिकारों तक कई मुद्दे सीधे समाज के भविष्य से जुड़े हैं। ऐसे समय में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी राष्ट्रीय संस्था से सिर्फ़ बयान नहीं, बल्कि साफ़ रणनीति, मजबूत तैयारी और मुश्किल हालात में रास्ता निकालने वाली लीडरशिप की उम्मीद की जाती है।
एआईएमपीएलबी ने 17 सितंबर से संविधान, शरीयत, धार्मिक आज़ादी और नागरिकों के अधिकारों के लिए अभियान शुरू करने की घोषणा की थी। जंतर-मंतर पर कार्यक्रम की अनुमति न मिलने के बाद कार्यक्रम की रणनीति में बदलाव करना पड़ा।
सवाल यह नहीं है कि प्रशासन ने अनुमति क्यों नहीं दी। असल सवाल यह है कि क्या इतने बड़े राष्ट्रीय अभियान की तैयारी केवल एक जगह पर कार्यक्रम की अनुमति मिलने या न मिलने तक सीमित थी? अगर जंतर-मंतर का दरवाज़ा बंद हो जाए तो अगला रास्ता क्या होगा? अगर धरने की अनुमति न मिले तो प्रेस कॉन्फ्रेंस, जनसभाएं, राज्यवार कार्यक्रम, कानूनी कार्रवाई और जनसंपर्क अभियान की पूरी योजना पहले से क्यों तैयार नहीं होनी चाहिए?
किसी आंदोलन की ताकत भीड़ की संख्या से ही नहीं, उसकी तैयारी से भी तय होती है। सरकार या प्रशासन से अनुमति मांगना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन अनुमति न मिलने के बाद आंदोलन की दिशा तय करना नेतृत्व की जिम्मेदारी है। यही वह जगह है जहां बड़े संगठनों की असली परीक्षा होती है।
मुस्लिम समाज को आज ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो हर घटना के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय घटनाओं से पहले तैयारी करे। अदालत में मामला जाने से पहले मजबूत कानूनी टीम तैयार हो। कानून आने के बाद विरोध करने के बजाय उसके हर प्रावधान का अध्ययन पहले हो। संसद, अदालत, मीडिया, सिविल सोसाइटी और आम जनता तक अपनी बात पहुंचाने की अलग-अलग रणनीति हो। और सबसे बढ़कर, आम मुसलमान को यह पता हो कि उसके नेतृत्व के पास आगे का रास्ता क्या है।
सिर्फ़ प्रेस कॉन्फ्रेंस, बयान और सोशल मीडिया अपील से कोई आंदोलन मजबूत नहीं होता। बयान जरूरी हैं, लेकिन बयान के बाद कार्रवाई का रास्ता उससे भी ज्यादा जरूरी है। समाज को यह भरोसा चाहिए कि मुश्किल आने पर उसकी संस्थाएं केवल प्रतिक्रिया नहीं देंगी, बल्कि रास्ता भी दिखाएंगी।
यह भी समझना होगा कि हर मुद्दे को सड़क के आंदोलन से ही हल नहीं किया जा सकता। कुछ लड़ाइयां अदालत में लड़ी जाती हैं, कुछ संसद और लोकतांत्रिक संस्थाओं के भीतर, कुछ जनमत के स्तर पर और कुछ समाज के अंदर शिक्षा और जागरूकता के जरिए। एक समझदार नेतृत्व इन सभी मोर्चों को एक-दूसरे का विकल्प नहीं, बल्कि एक-दूसरे का हिस्सा मानता है।
तीन तलाक के दौर से लेकर वक्फ़ और यूसीसी तक मुस्लिम समाज ने कई बड़े कानूनी और सामाजिक विवाद देखे हैं। इन घटनाओं ने यह साफ किया है कि सिर्फ़ विरोध दर्ज करा देना काफी नहीं है। कानून की भाषा समझने वाले विशेषज्ञ, संवैधानिक मामलों के जानकार, डेटा और दस्तावेज जुटाने वाली टीम, मीडिया से संवाद करने वाले लोग और जमीनी स्तर पर काम करने वाला संगठनात्मक ढांचा भी चाहिए।
सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब नेतृत्व की घोषणा और जमीन की तैयारी के बीच फासला दिखाई देने लगे। बड़ी घोषणा होती है, उम्मीद पैदा होती है और फिर आखिरी समय में कार्यक्रम बदल जाता है। ऐसी स्थिति में सिर्फ़ प्रशासन को जिम्मेदार ठहराने से काम नहीं चलेगा। नेतृत्व को भी अपने फैसलों, तैयारी और रणनीति का हिसाब समाज के सामने रखना होगा।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को अब यह तय करना होगा कि वह केवल संकट आने के बाद बयान जारी करने वाली संस्था बने रहना चाहता है या आने वाले वर्षों के लिए एक मुकम्मल रणनीतिक संगठन के रूप में खुद को तैयार करेगा।
आत्ममंथन यानी मुहासबा किसी संस्था की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत की निशानी है। गलतियों को स्वीकार करना और उनसे सीखकर रणनीति बदलना ही लीडरशिप है। समाज को नारों से ज्यादा दिशा चाहिए, भावनाओं से ज्यादा तैयारी चाहिए और बयानों से ज्यादा अमल चाहिए।
आज जरूरत किसी एक व्यक्ति या संस्था को कटघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि नेतृत्व की पूरी कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाने की है। आखिर कब तक हर नए संकट के बाद बैठक होगी, बयान आएगा, प्रेस कॉन्फ्रेंस होगी और फिर अगली चुनौती का इंतजार किया जाएगा?
समाज की तकदीर सिर्फ़ बड़े बयानों से नहीं बदलती। उसके लिए दूरदृष्टि, तैयारी, कानूनी समझ, संगठनात्मक क्षमता और मुश्किल वक्त में फैसला लेने का हौसला चाहिए।

