पुणे में सीरत-उन-नबी जलसा, सामाजिक बुराइयों के ख़िलाफ़ एकजुट होने की अपील
जमात-ए-इस्लामी हिंद, पुणे की ओर से एसआईओ और जीआईओ के सहयोग से विशाल सीरत-उन-नबी जलसे का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का विषय ‘दहर में इस्मे मोहम्मद से उजाला कर दे’ रखा गया। जलसे में शहर के सैकड़ों पुरुषों और महिलाओं ने शिरकत की। वक्ताओं ने पैगंबर हज़रत मोहम्मद साहब की तालीम की रोशनी में सामाजिक नाइंसाफ़ी, भेदभाव और दूसरी बुराइयों को खत्म करने पर ज़ोर दिया।
जलसे के मुख्य वक्ता और जमात-ए-इस्लामी हिंद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एस. अमीनुल हसन ने कहा कि पैगंबर हज़रत मोहम्मद साहब की ज़िंदगी पूरी इंसानियत के लिए रहनुमाई और रोशनी का ज़रिया है। उन्होंने कहा कि पैगंबर साहब ने ऐसे दौर में इंसानों को नई राह दिखाई, जब समाज में ज़ुल्म, ऊंच-नीच और इंसानी हक़ों की पामाली आम थी।
उन्होंने कहा कि आज दुनिया ने विज्ञान और टेक्नोलॉजी के मैदान में बहुत तरक्की की है, लेकिन नैतिक और सामाजिक स्तर पर कई गंभीर समस्याएं अब भी मौजूद हैं। महिलाओं के साथ भेदभाव, आर्थिक शोषण, गरीबी और कमजोर तबकों के साथ नाइंसाफ़ी जैसी समस्याओं से निपटने के लिए पैगंबर साहब की तालीम को समझना और अपनी ज़िंदगी में उतारना ज़रूरी है।
अमीनुल हसन ने इस्लाम से पहले के अरब समाज का ज़िक्र करते हुए कहा कि उस दौर में कमजोरों, गुलामों और महिलाओं के साथ ज़्यादती होती थी। पैगंबर मोहम्मद साहब ने इन बुराइयों के खिलाफ़ अमली संघर्ष किया और इंसानों के बीच बराबरी, महिलाओं के हक़, अनाथों की देखभाल और गरीबों की मदद को समाज का अहम हिस्सा बनाया।
उन्होंने पैगंबर साहब की ज़िंदगी से जुड़ी चार अहम बातों पर खास तौर पर रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि हर इंसान इज़्ज़त का हक़दार है और जाति, रंग, नस्ल या दौलत की बुनियाद पर किसी को छोटा समझना सही नहीं है। उन्होंने इंसाफ़ को समाज की बुनियादी ज़रूरत बताते हुए कहा कि इंसाफ़ सिर्फ अपने लोगों के लिए नहीं, बल्कि विरोधियों के साथ भी बराबरी से होना चाहिए।
उन्होंने कानून की पाबंदी और उसकी बराबरी पर भी ज़ोर दिया। उनके मुताबिक एक बेहतर समाज में कानून ताकतवर और कमजोर, दोनों के लिए एक जैसा होना चाहिए। उन्होंने मक्का की फ़तह का हवाला देते हुए माफ़ी और रहम की अहमियत भी बताई और कहा कि असली ताकत बदला लेने में नहीं, बल्कि माफ़ करने में है।

जमात-ए-इस्लामी हिंद, महाराष्ट्र के प्रांतीय अध्यक्ष मौलाना इलियास फलाही ने कहा कि पैगंबर साहब की ज़िंदगी केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि आज भी इंसान के लिए एक अमली नमूना है। उन्होंने कहा कि सीरत को सिर्फ़ खास दिनों और कार्यक्रमों तक सीमित रखने के बजाय उसकी तालीम को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अपनाने की ज़रूरत है।
अमीनुल हसन ने भी लोगों से पैगंबर साहब की ज़िंदगी और तालीम का लगातार अध्ययन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि इंसान के व्यवहार, कारोबार और आपसी लेन-देन में सीरत-ए-पाक के उसूल दिखाई देने चाहिए।
कार्यक्रम की शुरुआत जमात-ए-इस्लामी हिंद, पुणे के शहर अध्यक्ष तजम्मुल खान के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने मेहमानों का स्वागत करते हुए जलसे के मक़सद पर रोशनी डाली। इसके बाद सूफियान कादरी ने नात पेश की। कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर मिर्जा आसिम ने किया।
जलसे के प्रभारी प्रोफेसर सैयद जावेद ने कार्यक्रम के सफल आयोजन पर मेहमानों, श्रोताओं और कार्यकर्ताओं का शुक्रिया अदा किया।
-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

