अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) का नाम सिर्फ़ एक तालीमी इदारे के तौर पर नहीं लिया जाता, बल्कि इसे हिंदुस्तान में मुसलमानों के आधुनिक तालीमी सफ़र की सबसे अहम कड़ी माना जाता है। सर सैयद अहमद ख़ान ने जिस अलीगढ़ तहरीक की बुनियाद रखी थी, उसका मक़सद सिर्फ़ स्कूल या कॉलेज बनाना नहीं था, बल्कि एक ऐसे समाज की तामीर करना था जो दीन के साथ-साथ दुनिया की तालीम में भी आगे बढ़े।
इसी ऐतिहासिक सफ़र को नए अंदाज़ में सामने लाने वाली किताब “Aligarh Muslim University: A History” का विमोचन 6 अगस्त को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की सर सैयद अकादमी में किया गया। किताब के लेखक डॉ. शमीम अख्तर हैं, जो सेंटर फॉर कंटीन्यूइंग एंड एडल्ट एजुकेशन एंड एक्सटेंशन के निदेशक हैं।
इस मौके पर मशहूर इतिहासकार और एएमयू के प्रोफेसर एमेरिटस प्रो. इरफ़ान हबीब ने किताब का विमोचन किया। समारोह में प्रो वाइस चांसलर प्रो. मोहम्मद मोहसिन ख़ान, कुलपति प्रो. नईमा खातून, पूर्व कार्यवाहक कुलपति प्रो. मोहम्मद गुलरेज़, सर सैयद अकादमी के निदेशक प्रो. शाफ़े किदवई और विश्वविद्यालय के कई वरिष्ठ शिक्षक मौजूद रहे।
एएमयू का इतिहास सिर्फ़ इमारतों का नहीं
अपने संबोधन में प्रो. इरफ़ान हबीब ने कहा कि एएमयू का इतिहास कई बार लिखा जा चुका है, लेकिन यह किताब इसलिए अलग है क्योंकि इसमें सिर्फ़ घटनाओं का ज़िक्र नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था, उसके विकास और समाज में उसकी भूमिका को भी विस्तार से समझाया गया है।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि 1947 के बँटवारे के समय एएमयू ने बहुत कठिन दौर देखा। उस समय देश की नई सरकार ने विश्वविद्यालय को संभालने और उसे आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि इस ऐतिहासिक योगदान को भी याद रखा जाना चाहिए।
प्रो. हबीब ने कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने एएमयू के राष्ट्रीय महत्व को समझा। उन्होंने कई बार विश्वविद्यालय का दौरा किया और उसे दोबारा मज़बूती से खड़ा करने में सहयोग दिया।
सर सैयद का सपना आज भी ज़िंदा है
समारोह की अध्यक्षता कर रहे पूर्व कार्यवाहक कुलपति प्रो. मोहम्मद गुलरेज़ ने कहा कि एएमयू आज जिस मुकाम पर है, उसके पीछे हजारों लोगों की मेहनत और कुर्बानियाँ हैं। लेकिन सबसे बड़ा योगदान सर सैयद अहमद ख़ान का है, जिन्होंने उस दौर में आधुनिक शिक्षा की मशाल जलाई, जब मुसलमानों में नई तालीम को लेकर कई तरह की गलतफ़हमियाँ थीं।
उन्होंने बताया कि अलीगढ़ आंदोलन ने सिर्फ़ एक विश्वविद्यालय नहीं बनाया, बल्कि पूरे समाज में आधुनिक सोच और वैज्ञानिक नज़रिया पैदा किया। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि एएमयू का विमेंस कॉलेज 1938 में स्थापित हुआ, जो देश के कई बड़े महिला कॉलेजों से पहले अस्तित्व में आया।
इतिहास भविष्य का रास्ता दिखाता है
प्रो वाइस चांसलर प्रो. मोहम्मद मोहसिन ख़ान ने कहा कि कोई भी समाज अपना भविष्य तभी बेहतर बना सकता है जब वह अपने इतिहास को सही ढंग से समझे। उनके मुताबिक डॉ. शमीम अख्तर की यह किताब सिर्फ़ एएमयू के अतीत को दर्ज नहीं करती, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक अहम दस्तावेज़ है।
उन्होंने कहा कि सर सैयद अहमद ख़ान ने जिस प्रगतिशील सोच की शुरुआत की थी, उसकी ज़रूरत आज भी उतनी ही है।
नई बहसों का भी रास्ता खोलती है किताब
इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सैयद अली नदीम रिज़वी ने कहा कि किताब में विश्वविद्यालय को एक संवैधानिक, प्रशासनिक और शैक्षणिक संस्था के रूप में समझाने की अच्छी कोशिश की गई है। उन्होंने सुझाव दिया कि भविष्य के संस्करणों में कुछ और ऐतिहासिक पहलुओं को भी शामिल किया जा सकता है।
वहीं सर सैयद अकादमी के निदेशक प्रो. शाफ़े किदवई ने कहा कि विश्वविद्यालय के प्रशासन और उसके विकास को समझने के लिए यह किताब एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ साबित होगी।
आज भी ज़िंदा है अलीगढ़ तहरीक
करीब डेढ़ सौ साल पहले शुरू हुई अलीगढ़ तहरीक का मक़सद था कि मुसलमान आधुनिक शिक्षा हासिल करें, विज्ञान, प्रशासन, न्याय, पत्रकारिता और दूसरे क्षेत्रों में आगे बढ़ें। आज भी एएमयू से निकलने वाले लाखों छात्र देश और दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं।
ऐसे समय में, जब शिक्षा और इतिहास दोनों पर नई बहसें चल रही हैं, एएमयू के इतिहास पर प्रकाशित यह पुस्तक केवल अतीत का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि यह याद दिलाती है कि किसी भी समाज की तरक्की की असली बुनियाद तालीम, दूरअंदेशी और बेहतर नेतृत्व होती है।
-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

