रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उनके मौलवी साहब शिक्षक की सच्ची कहानी

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देश के रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह जी ने कई बार एक भावुक याद साझा की है। यह कहानी सिर्फ़ एक नेता और शिक्षक की नहीं, बल्कि भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा की जीवंत मिसाल है।

राजनाथ सिंह जी का बचपन उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के भभौरा गांव में बीता। गांव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ते समय उनके शिक्षक थे, एक पंडित जी और एक मौलवी साहब। मौलवी साहब शारीरिक शिक्षा के गुरु थे। वे बच्चों को व्यायाम सिखाते और अनुशासन का पाठ पढ़ाते। अगर कोई शरारत करता तो पतली छड़ी से हल्की-सी सज़ा देते। राजनाथ सिंह जी खुद कहते हैं, “उनकी छड़ी की मार से चोट कम लगती, लेकिन डर बना रहता था। उसी डर से हम सही तरीके से एक्सरसाइज सीख लेते थे।

वर्षों बाद, जब राजनाथ सिंह करीब 38-39 साल के थे और उत्तर प्रदेश के शिक्षा मंत्री बने, तब एक दिन वे अपने काफिले के साथ गांव जा रहे थे। चंदौली के पास सड़क किनारे एक बुज़ुर्ग खड़े थे। उम्र करीब 90 साल, आँखों से कम दिखाई देता, रिटायर हो चुके। हाथ में फूलों की माला। राजनाथ सिंह जी तुरंत पहचान गए, ये वही मौलवी साहब हैं, जिन्होंने बचपन में उन्हें सिखाया था।

उन्होंने गाड़ी रुकवाई, बैक करवाई। मौलवी साहब माला लेकर खड़े थे। लेकिन राजनाथ सिंह जी ने खुद मौलवी साहब के गले में माला पहनाई, उनके चरण छुए और आशीर्वाद माँगा। मौलवी साहब की आँखों से आँसू निकल पड़े। राजनाथ सिंह भी भावुक हो गए।

यह घटना उन्होंने 2017 में लखनऊ विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में और 2023 में इंटीग्रल यूनिवर्सिटी के समारोह में विस्तार से सुनाई। हर बार उन्होंने छात्रों से कहा, “गुरु का सम्मान कभी मत भूलना। शिक्षक की खुशी शिष्य की सफलता में होती है।

यह कहानी तथ्यों पर आधारित है। द हिंदू, पीटीआई, नवभारत टाइम्स और अन्य विश्वसनीय स्रोतों में इसे दर्ज किया गया है। मौलवी साहब किसी मदरसे के नहीं, बल्कि गांव के साधारण प्राइमरी स्कूल के शिक्षक थे। वहाँ पंडित और मौलवी दोनों साथ पढ़ाते थे, भारत की साझा शिक्षा संस्कृति का जीवंत प्रमाण।

आज जब कुछ लोग बिना तथ्यों के मदरसों या मौलवी शब्द को ही संदेह की दृष्टि से देखते हैं, तब ऐसी कहानियाँ याद दिलाती हैं कि मूल्यांकन पूर्वाग्रह से नहीं, बल्कि योगदान और मानवीय संबंधों से होना चाहिए। गुरु-शिष्य का रिश्ता धर्म, जाति या संस्था से ऊपर होता है।

राजनाथ सिंह जी का यह व्यवहार हमारी प्राचीन परंपरा को दोहराता है, जहाँ शिष्य पद पर पहुँचकर भी गुरु के चरणों में झुकता है। आइए, ऐसी प्रेरणाओं से सीख लें। शिक्षा, संवाद और आपसी सम्मान के साथ एक सशक्त और प्रगतिशील भारत बनाएँ।

-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

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