हस्तकला— करघे की आख़िरी आवाज़… और हमारी ख़ामोशी

Date:

बनारस की गलियों में कभी करघों की आवाज़ सुबह से रात तक गूंजती थी। हर घर में रेशम के धागे, ज़री की चमक और बुनकरों के हाथों की कला दिखाई देती थी। आज वही बनारस ख़ामोश होता जा रहा है।

7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया जाता है। यह दिन 1905 के स्वदेशी आंदोलन की याद दिलाता है, जब भारतीयों ने विदेशी कपड़ों का बहिष्कार कर देशी करघों को अपनाया था। आज इस दिन बनारस के बुनकरों की कहानी सुनना ज़रूरी है, क्योंकि उनकी कला सिर्फ़ कपड़ा नहीं, सदियों की मेहनत, धैर्य और संस्कृति है।

कभी की कहानी

बनारसी साड़ी की जड़ें 16वीं-17वीं शताब्दी में हैं। गुजरात से आए बुनकरों ने यहाँ रेशम की ब्रोकेड बुनाई शुरू की। मुगल दरबार के संरक्षण में यह कला खूब फूली-फली। क़िंख्वाब यानी सोने-चाँदी की ज़री वाला कपड़ा राजा-रानियों और शादी-ब्याह की शान बन गया।

मदनपुरा, जलालीपुरा, बजरडीहा, लोहता जैसी बस्तियों में हर घर करघा था। बाप से बेटा, बेटा से पोता, हुनर पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता था। हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदाय साथ काम करते थे। एक साड़ी में महीनों लगते थे। कढ़ुआ, तनचोई, जंगला जैसे डिज़ाइन हाथ से निकलते थे, हर धागा यादों का हिस्सा।

एक बुनकर ने कहा था, “करघा बुनाई यादों का काम है। छह मीटर की एक साड़ी बनाने में दो महीने लग जाते हैं। असली रेशम और ज़री से।”

आज की ख़ामोशी

अब वो आवाज़ धीमी पड़ गई है। सरकारी आँकड़ों और ज़मीनी रिपोर्ट्स के अनुसार वाराणसी में कभी लाखों हाथकरघे थे। आज शुद्ध हथकरघा बहुत कम बचे हैं, 10 से 25 हज़ार के आसपास। ज़्यादातर परिवार पावरलूम पर चले गए या काम छोड़कर सूरत, बेंगलुरु चले गए। रिक्शा चलाना, मज़दूरी, सब्ज़ी बेचना, ये नई रोज़ी बन गई।

एक अनुभवी बुनकर अशरफ़ कहते हैं, “दो महीने की मेहनत पर 10 हज़ार रुपये मिलते हैं। मेरा बेटा पावरलूम पर हर महीने 15 हज़ार कमाता है।” नफ़ीज़ अहमद बताते हैं कि बाज़ार में साड़ी 50 हज़ार से 4 लाख तक बिकती है, लेकिन बुनकर को सिर्फ़ 10 हज़ार मिलते हैं।

महमूद जैसे कारीगर कहते हैं, “पहले महीने में 5-6 साड़ियाँ बनती थीं, अब 2-3 ही। नयी पीढ़ी इस काम में आना नहीं चाहती।”

महिलाओं की कहानी और भी चुप है। कई घरों में औरतें टिक्की चिपकाना, मोती लगाना या कढ़ाई करती थीं। कोविड के बाद काम बंद हो गया। बानो निशा जैसी महिलाओं को अब साबुन-बिस्किट की छोटी दुकान चलानी पड़ती है। आँखें कमज़ोर हो गईं, कमाई नहीं रही।

क्यों ख़ामोश हो रहा है करघा?

पावरलूम की तेज़ी- हाथ से 10-12 दिन की साड़ी मशीन पर 1-2 दिन में बन जाती है। सस्ती नक़ल बाज़ार में छाई हुई है। सूरत से नक़ली बनारसी आ रही है।

कच्चे माल की महँगाई- असली रेशम और ज़री बहुत महँगे हो गए। बुनकर उधार पर भी नहीं ले पाते।

बिचौलियों का हिस्सा- साड़ी की क़ीमत का बड़ा हिस्सा व्यापारी ले लेते हैं। बुनकर को नाममात्र मिलता है।

बिजली, कर्ज़, बीमारी- बिजली बिल बढ़े, काम अनियमित, स्वास्थ्य ख़राब। युवा पढ़ाई छोड़ने या शहर भागने को मजबूर।

पुरानी मार- नोटबंदी, जीएसटी, कोविड, एक के बाद एक झटके।

रिपोर्ट्स बताती हैं कि पूर्वांचल के हस्तशिल्प-हथकरघा क्षेत्र को कोविड में हज़ारों करोड़ का नुकसान हुआ। कई परिवार एक समय खाना खाते थे।

उम्मीद की कुछ किरणें

कुछ योजनाएँ मदद कर रही हैं, मुद्रा ऋण, वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रॉडक्ट, सिल्क कार्ड, बुनकर क्रेडिट कार्ड। कुछ बुनकर भारतीय रेशम सस्ता पा रहे हैं और मशीनें बढ़ा रहे हैं। लेकिन शुद्ध हथकरघा वाले अभी भी संघर्ष में हैं। कुछ ब्रांड और डिज़ाइनर सीधे बुनकरों से जुड़कर असली साड़ी बेच रहे हैं।

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस हमें याद दिलाता है कि हथकरघा सिर्फ़ रोज़ी नहीं, हमारी पहचान है। यह पर्यावरण के अनुकूल है, महिलाओं को काम देता है और ग्रामीण रोज़गार का बड़ा स्रोत है। पूरे देश में 35 लाख से ज़्यादा लोग इससे जुड़े हैं।

हम क्या कर सकते हैं?

अगली बार साड़ी खरीदते समय पूछें, “क्या ये हाथ से बुनी है?” नक़ली सस्ती चीज़ छोड़कर असली बनारसी को अपनाएँ। बुनकरों के मेले, प्रदर्शनी और ऑनलाइन असली प्लेटफ़ॉर्म को सपोर्ट करें। सरकार को चाहिए कि कच्चे माल पर सब्सिडी, उचित मज़दूरी तय हो और नक़ली सामान पर कड़ी नज़र रहे।

बनारस की गलियाँ अभी पूरी तरह ख़ामोश नहीं हुईं। कुछ करघे अभी भी चल रहे हैं। जब बुनकर का हाथ धागे पर चलता है, तो सदियों की कहानी फिर से जीवित हो जाती है।

आज हथकरघा दिवस पर उनकी मेहनत को सलाम करें, ताकि कल फिर उन गलियों में करघों की मीठी आवाज़ गूँजे।

क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_img

पॉपुलर

और देखे
और देखे

अगर कौम को आगे बढ़ाना है तो दीन के साथ दुनिया की तालीम भी ज़रूरी है

पेश है महाराष्ट्र के सबसे बड़े तालीमी इदारे अंजुमन-ए-इस्लाम...

सिर्फ़ एक यूनिवर्सिटी की कहानी नहीं, बल्कि एक तहरीक की दास्तान

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) का नाम सिर्फ़ एक तालीमी...

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उनके मौलवी साहब शिक्षक की सच्ची कहानी

देश के रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह जी ने...

12 साल के अहमद का कमाल __चलते-चलते बिजली बनाने का सपना

एक बच्चे की सोच, जो दुनिया की ऊर्जा का...