मुंबई से करीब 50 किलोमीटर दूर ठाणे जिले के अंबरनाथ इलाके में पहाड़ी पर स्थित हाजी मलंग की दरगाह एक ऐसी जगह है, जहां सदियों से अलग-अलग समुदायों के लोग आस्था के साथ पहुंचते रहे हैं। लेकिन पिछले कई दशकों से इस जगह की पहचान और प्रबंधन को लेकर विवाद अदालतों तक पहुंचा हुआ है।
हाल में 1982 में दाखिल पुराने मुकदमे में नए वादियों को शामिल करने की अर्जी खारिज किए जाने के बाद यह विवाद एक बार फिर चर्चा में है। हालांकि इससे मूल विवाद का अंतिम फैसला नहीं हुआ है। इसलिए इसे हाजी मलंग स्थल की पहचान पर अदालत का अंतिम फैसला समझना सही नहीं होगा।
क्या है विवाद?
हाजी मलंग, जिसे मलंगगढ़ भी कहा जाता है, माथेरान पहाड़ियों की श्रृंखला में करीब 3,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। मुस्लिम श्रद्धालु इसे हाजी अब्दुल रहमान यानी हाजी मलंग बाबा की दरगाह मानते हैं। दूसरी तरफ कुछ हिंदू संगठन और नाथ संप्रदाय से जुड़े लोग इसे मछिंद्रनाथ से जुड़ा धार्मिक स्थल बताते हैं।
इस जगह की खास बात यह है कि इसकी परंपरा सिर्फ एक समुदाय तक सीमित नहीं रही। पुराने अदालती रिकॉर्ड में भी इस स्थल पर हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों की आस्था का जिक्र मिलता है। 1953 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में हाजी मलंग को दरगाह बताया गया और यह भी दर्ज है कि वहां मुस्लिम संत की कब्र के साथ एक हिंदू राजकुमारी की कब्र भी थी तथा दोनों स्थानों पर अलग-अलग समुदायों के लोग चढ़ावा चढ़ाते थे।
1882 के गजट में क्या दर्ज है?
इस विवाद में इतिहास के पुराने रिकॉर्ड बेहद अहम हैं। 1882 में प्रकाशित बॉम्बे प्रेसीडेंसी गजेटियर में हाजी मलंग की दरगाह का उल्लेख मिलता है। इसमें इसे अरब मिशनरी हाजी अब्दुल रहमान से जुड़ा स्थल बताया गया है और इसकी मौजूदगी को कई सदियों पुराना बताया गया है।
इतिहासकारों के अनुसार इससे भी पुराने संदर्भ 18वीं सदी तक मिलते हैं। एक इतिहास शोध में 1774 का संदर्भ सामने आता है, जबकि केतकर परिवार के पास मौजूद दस्तावेजों में 1718 तक के रिकॉर्ड होने का दावा किया गया है।
केतकर परिवार की भूमिका
हाजी मलंग की कहानी का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि दरगाह के प्रबंधन में लंबे समय से एक हिंदू परिवार की भूमिका रही है।
गजेटियर के मुताबिक 18वीं सदी में केतकर परिवार के पूर्वजों को इस स्थल की देखरेख से जोड़ा गया था। 1817 में प्रबंधन को लेकर विवाद हुआ और उस समय लॉटरी के जरिए केतकर परिवार के प्रतिनिधि को संरक्षक की जिम्मेदारी मिली। तब से इस परिवार की कई पीढ़ियां दरगाह के प्रबंधन से जुड़ी रही हैं।
यही कारण है कि हाजी मलंग का विवाद सिर्फ मंदिर बनाम दरगाह का सवाल नहीं रहा, बल्कि प्रबंधन, धार्मिक पहचान और पुराने अधिकारों से जुड़े कई सवाल इसमें शामिल हो गए।
1982 में पहुंचा अदालत तक
1980 के दशक में शिवसेना नेता आनंद दिघे ने हाजी मलंग को लेकर आंदोलन शुरू किया। उनका दावा था कि यह स्थान नाथ परंपरा से जुड़ा हिंदू धार्मिक स्थल है।
इसी माहौल में 1982 में मोहन आनंद गोखले और उनके साथियों की ओर से ठाणे जिला अदालत में एक प्रतिनिधि मुकदमा दायर किया गया। इसमें स्थल की मौजूदा धार्मिक पहचान और रजिस्ट्रेशन को चुनौती दी गई तथा इसे हिंदू धार्मिक स्थल के रूप में मान्यता देने की मांग की गई।
मुकदमा आगे बढ़ा, लेकिन समय के साथ मूल वादियों की मृत्यु और दूसरी कानूनी प्रक्रियाओं के कारण मामला लंबा होता गया।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले क्यों अहम हैं?
हाजी मलंग विवाद को समझने के लिए 1950 के दशक के सुप्रीम कोर्ट के फैसले बेहद महत्वपूर्ण हैं।
1953 में सुप्रीम कोर्ट के सामने मामला दरगाह के प्रबंधन से जुड़ा था। अदालत के रिकॉर्ड में इसे हाजी मलंग की दरगाह कहा गया। फैसले में यह भी सामने आया कि दर्गाह का प्रबंधन करने का दावा करने वाले लोग ब्राह्मण थे, जबकि स्थल मुस्लिम संत से जुड़ा था।
बाद के मुकदमों में भी हाजी मलंग दरगाह की संपत्ति और प्रबंधन से जुड़े सवाल अदालतों के सामने आए। 1960 के दशक के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दरगाह की संपत्ति से जुड़े विवाद पर फैसला दिया।
इसलिए आज की बहस में केवल राजनीतिक दावों के बजाय इन पुराने न्यायिक रिकॉर्ड और दस्तावेजों को देखना बेहद जरूरी है।
नया विवाद क्यों उठा?
1982 के पुराने मुकदमे को आगे बढ़ाने के लिए हाल के वर्षों में नए लोगों को वादी के रूप में शामिल करने की कोशिश की गई। मार्च 2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक हिंदू संगठन की ओर से इस विवाद को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख भी किया गया है। दूसरी तरफ दरगाह से जुड़े पक्ष का कहना है कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था और पुराने आदेशों के अनुसार ही मामले को देखा जाना चाहिए।
इससे साफ है कि विवाद अभी खत्म नहीं हुआ है।
दोनों पक्षों की अपनी दलील
हिंदू पक्ष पुराने धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों के आधार पर इसे नाथ परंपरा से जुड़ा स्थल मानता है। उसका कहना है कि ऐतिहासिक पहचान को दोबारा सामने लाने और मौजूदा रजिस्ट्रेशन पर सवाल उठाने का अधिकार उसे है।
मुस्लिम पक्ष और दरगाह से जुड़े ट्रस्टी पुराने गजेटियर, अदालती रिकॉर्ड और लंबे समय से चली आ रही परंपरा का हवाला देते हैं। उनका कहना है कि हाजी मलंग की पहचान को राजनीतिक आंदोलन के जरिए बदलने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
यह सिर्फ एक धार्मिक विवाद नहीं
हाजी मलंग की कहानी को केवल हिंदू मुस्लिम विवाद के रूप में देखना शायद इस जगह के पूरे इतिहास को समझना नहीं होगा।
यहां एक मुस्लिम सूफी संत की दरगाह है, उसके साथ हिंदू परंपरा से जुड़ी मान्यताएं हैं और लंबे समय से एक हिंदू परिवार प्रबंधन से जुड़ा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने रिकॉर्ड में भी दोनों समुदायों की मौजूदगी और आस्था का उल्लेख मिलता है।
यानी यह जगह महाराष्ट्र की उस साझा संस्कृति की भी मिसाल रही है, जहां धार्मिक पहचानें एक-दूसरे से पूरी तरह अलग होकर नहीं बल्कि कई जगहों पर स्थानीय परंपराओं के साथ जुड़ती रही हैं।
अब आगे क्या?
हाल की अदालत की कार्रवाई ने पुराने मुकदमे में नए वादियों को शामिल करने की कोशिश को रोक दिया है, लेकिन इससे हाजी मलंग की धार्मिक पहचान पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
आगे की लड़ाई अदालत में दस्तावेजों, पुराने रिकॉर्ड, कानूनी अधिकारों और प्रमाणों के आधार पर ही तय होगी।
इस मामले में सबसे जरूरी बात यही है कि इतिहास का फैसला नारों से नहीं, दस्तावेजों और अदालत से होना चाहिए।
हाजी मलंग की पहाड़ी पर सदियों से श्रद्धालु पहुंचते रहे हैं। इस जगह की असली विरासत अगर किसी चीज में है तो वह केवल उसकी इमारत में नहीं, बल्कि उस साझा परंपरा में भी है जिसने अलग-अलग समुदायों के लोगों को वहां आने की जगह दी।
44 साल पुराने इस विवाद का समाधान जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह भी है कि समाधान के रास्ते में महाराष्ट्र की सामाजिक शांति और साझा विरासत को नुकसान न पहुंचे।
-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

