उत्तराखंड ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के दो साल बाद आंकड़ों की पड़ताल
देहरादून। उत्तराखंड में निवेश और रोजगार के बड़े सपने के साथ दिसंबर 2023 में आयोजित ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट को राज्य की आर्थिक विकास यात्रा का अहम पड़ाव बताया गया था। देहरादून के फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में हुए इस दो दिवसीय आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उद्घाटन और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के समापन संबोधन के बीच राज्य को देश के बड़े निवेश केंद्र के रूप में विकसित करने का रोडमैप सामने रखा गया।
समिट में 1,769 एमओयू पर दस्तखत हुए और इनकी कुल अनुमानित कीमत करीब 3.5 लाख करोड़ रुपये बताई गई। उस समय यह आंकड़ा उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी छलांग के तौर पर पेश किया गया था।
लेकिन अब सवाल यह है कि दो साल से ज्यादा समय गुजरने के बाद इन समझौतों में से वास्तव में कितना निवेश जमीन पर पहुंचा?
1.06 लाख करोड़ रुपये के निवेश का दावा
सरकार के मुताबिक फरवरी 2026 तक इन समझौतों में से 1.06 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश जमीन पर उतर चुका है। ऊर्जा क्षेत्र में सबसे ज्यादा निवेश होने की बात कही गई है। इसके बाद उद्योग, आवास, पर्यटन और शिक्षा जैसे क्षेत्र आते हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ओर से कई समीक्षा बैठकों में निवेश परियोजनाओं की प्रगति की जानकारी ली गई और अधिकारियों को बाकी समझौतों को भी तेजी से जमीन पर उतारने के निर्देश दिए गए।
सरकार इसे राज्य में बेहतर प्रशासन, आसान कारोबारी माहौल और निवेशकों के बढ़ते भरोसे का संकेत मान रही है।
लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है।
एमओयू और हकीकत के बीच अंतर
स्वतंत्र पड़ताल और आरटीआई से सामने आई जानकारी में कुछ ऐसे सवाल उठते हैं, जिनका जवाब मिलना जरूरी है।
ग्राउंडिंग की सूची में 3,000 से ज्यादा इकाइयों का जिक्र मिलता है, जबकि मूल एमओयू की संख्या 1,769 थी। सूची में कई बहुत छोटी इकाइयां भी शामिल हैं। इनमें आटा चक्की, खाद बीज की दुकान और छोटे क्लिनिक जैसे कारोबार बताए गए हैं, जिनमें निवेश की रकम कई मामलों में केवल एक या दो लाख रुपये है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या निवेश की संख्या बढ़ाने के लिए छोटी इकाइयों को भी उसी तरीके से गिना जा रहा है, जिस तरह करोड़ों रुपये की बड़ी परियोजनाओं को?
यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी निवेश समिट की कामयाबी केवल कितनी परियोजनाएं दर्ज हुईं, इससे नहीं मापी जा सकती। असली सवाल यह है कि कितना नया निवेश आया, कितनी परियोजनाएं शुरू हुईं और कितने लोगों को रोजगार मिला।
बड़े नाम, छोटी जमीन
पड़ताल में यह सवाल भी सामने आता है कि घोषित बड़े निवेश का एक हिस्सा सरकारी कंपनियों या पहले से चल रही परियोजनाओं से जुड़ा हुआ है।
कुछ बड़े समझौतों में घोषित रकम और बाद में जमीन पर दिखाई गई रकम के बीच भी अंतर नजर आता है। कहीं परियोजना आंशिक रूप से आगे बढ़ी तो कहीं निवेश की रकम काफी कम दिखाई गई।
इसलिए अब जरूरत केवल निवेश की कुल रकम बताने की नहीं है। सरकार को परियोजना वार जानकारी सामने रखनी चाहिए कि किस कंपनी ने कितना निवेश करने का समझौता किया था, अब तक कितना पैसा लगा, परियोजना शुरू हुई या नहीं और उससे कितने रोजगार पैदा हुए।
समिट पर करीब 100 करोड़ खर्च
एक और महत्वपूर्ण सवाल समिट पर हुए खर्च का है।
इस आयोजन पर करीब 100 करोड़ रुपये खर्च होने की बात सामने आई है। इतनी बड़ी रकम खर्च होने के बाद स्वाभाविक है कि जनता यह जानना चाहे कि इसके बदले राज्य को वास्तविक रूप से कितना निवेश मिला और कितने रोजगार पैदा हुए।
निवेश समिट करना गलत नहीं है। बल्कि उत्तराखंड जैसे राज्य के लिए निवेश आकर्षित करना जरूरी है। सवाल सिर्फ इतना है कि निवेश सम्मेलन का अंतिम पैमाना आयोजन की भव्यता नहीं, उसका जमीन पर दिखाई देने वाला परिणाम होना चाहिए।
एमओयू निवेश नहीं होता
यह बात समझना भी जरूरी है कि एमओयू यानी समझौता मूल रूप से निवेश की इच्छा या इरादे का दस्तावेज होता है। हर एमओयू का वास्तविक परियोजना में बदलना जरूरी नहीं होता।
कंपनी बाद में अपना फैसला बदल सकती है। जमीन, पर्यावरण मंजूरी, वित्त, बाजार, सड़क या बिजली जैसी कई वजहों से परियोजना रुक सकती है।
इसलिए हर एमओयू को वास्तविक निवेश मान लेना सही नहीं होगा।
लेकिन अगर सरकार खुद एमओयू के आंकड़ों को विकास की उपलब्धि के तौर पर पेश करती है तो फिर यह बताना भी उसकी जिम्मेदारी बनती है कि उनमें से कितने वादे पूरे हुए।
गुजरात से लेकर उत्तराखंड तक वही सवाल
यह बहस केवल उत्तराखंड की नहीं है। देश के कई राज्यों में ग्लोबल और इन्वेस्टर्स समिट के जरिए बड़े निवेश के ऐलान होते रहे हैं।
समिट के मंच पर करोड़ों और लाखों करोड़ रुपये के आंकड़े सुर्खियां बनते हैं। लेकिन बाद में असली चुनौती शुरू होती है। जमीन कहां मिलेगी? मंजूरी कितनी जल्दी मिलेगी? पैसा कब आएगा? फैक्ट्री कब चलेगी? होटल कब बनेगा? बिजली परियोजना कब शुरू होगी? और सबसे महत्वपूर्ण, स्थानीय लोगों को रोजगार कब मिलेगा?
यही किसी भी निवेश अभियान की असली परीक्षा है।
सीमावर्ती गांवों में दूसरी तस्वीर
उत्तराखंड की तस्वीर का दूसरा पहलू भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सीमावर्ती इलाकों में वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम के तहत सड़क, बिजली, पानी और रोजी रोजगार से जुड़े काम किए जा रहे हैं। कई जगहों पर इनका स्थानीय लोगों को फायदा भी मिल रहा है।
लेकिन बड़े निवेश के वादों और आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी के बीच अभी भी दूरी दिखाई देती है।
उत्तराखंड के युवा रोजगार चाहते हैं। स्थानीय कारोबारी बाजार चाहते हैं। पहाड़ी इलाकों में पलायन रोकने के लिए स्थायी आमदनी चाहिए।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि समिट कितनी बड़ी थी।
सवाल यह होना चाहिए कि समिट के बाद उत्तराखंड के आम आदमी की जिंदगी कितनी बदली।
अब आंकड़ों से आगे की जरूरत
उत्तराखंड के पास पर्यटन, प्राकृतिक संसाधन, ऊर्जा, आयुर्वेद, शिक्षा और सीमावर्ती रणनीतिक स्थिति जैसी कई बड़ी ताकतें हैं। राज्य में निवेश की वास्तविक संभावनाएं भी हैं।
लेकिन बड़े आंकड़े तभी मायने रखते हैं जब उनका असर जमीन पर दिखाई दे।
सरकार को अब एक साफ और सार्वजनिक परियोजना वार रिपोर्ट सामने रखनी चाहिए। इसमें एमओयू की कुल रकम, वास्तविक निवेश, शुरू हुई परियोजनाएं, पूरी हुई परियोजनाएं, लंबित परियोजनाएं और पैदा हुए रोजगार की संख्या अलग अलग बताई जानी चाहिए।
इससे सरकार के दावे भी ज्यादा मजबूत होंगे और जनता का भरोसा भी बढ़ेगा।
असली कसौटी रोजगार और बदलाव
निवेश सम्मेलन किसी राज्य को सुर्खियों में ला सकता है। बड़े कारोबारी राज्य में दिलचस्पी दिखा सकते हैं। करोड़ों रुपये के समझौते हो सकते हैं।
लेकिन विकास की असली तस्वीर तब बनती है जब कोई फैक्ट्री जमीन पर खड़ी होती है, कोई होटल खुलता है, कोई बिजली परियोजना शुरू होती है, कोई स्थानीय युवक नौकरी पाता है और किसी गांव के परिवार की आमदनी बढ़ती है।
उत्तराखंड को अब एमओयू की गिनती से आगे बढ़कर उनके नतीजों की गिनती करनी होगी।
क्योंकि निवेश का असली मतलब कागज पर लिखी रकम नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाला काम और लोगों की जिंदगी में आने वाला बदलाव है।
-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

