बालिग बहनों की आज़ादी पर हाईकोर्ट की मुहर

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इस्लाम कबूल करने वाली दो बहनों को तुरंत रिहा करने का आदेश, माता-पिता और यूपी सरकार पर 25-25 लाख रुपये

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धर्म परिवर्तन और अपनी पसंद से शादी के मामले में दो बालिग बहनों को उनकी मर्जी के खिलाफ रोके रखने पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने दोनों बहनों को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है। साथ ही अदालत ने माता-पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को 25-25 लाख रुपये देने का आदेश दिया है।

मामला अंशु भाटिया उर्फ अमीना अंशु भाटिया, उम्र 35 साल और दिव्या भाटिया उर्फ जोया दिया भाटिया, उम्र 20 साल का है। दोनों बहनों ने अदालत के सामने कहा कि वे बालिग हैं और उन्होंने अपनी मर्जी से इस्लाम कबूल किया है। उनका यह भी कहना था कि वे अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करना चाहती हैं।

पिता पर गंभीर आरोप

बहनों का आरोप था कि उनके पिता ने मई 2025 में आगरा में उनके खिलाफ मामला दर्ज कराया और पुलिस की मदद से उन्हें उनकी इच्छा के खिलाफ करीब पांच साल तक रोके रखा। अदालत के सामने यह सवाल उठा कि क्या किसी बालिग महिला को केवल इसलिए उसकी मर्जी के खिलाफ रखा जा सकता है क्योंकि उसने धर्म और जीवनसाथी के बारे में परिवार की पसंद से अलग फैसला लिया है।

इससे पहले 30 जुलाई को हाईकोर्ट ने साफ कहा था कि 18 साल से ज्यादा उम्र की महिला अगर अपनी मर्जी से धर्म बदलती है और अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करती है तो उसके फैसले में पिता समेत किसी दूसरे व्यक्ति को दखल देने का अधिकार नहीं है।

व्यक्तिगत आजादी सबसे अहम

इस मामले में अदालत के सामने सिर्फ धर्म परिवर्तन का सवाल नहीं था। असल सवाल एक बालिग व्यक्ति की अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने की आजादी का था।

किस धर्म को मानना है, किस व्यक्ति से शादी करनी है और अपनी जिंदगी किस तरह जीनी है, ये फैसले किसी बालिग व्यक्ति की निजी आजादी से जुड़े हैं। अदालत का रुख इसी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को केंद्र में रखता दिखाई देता है।

पहले रिहाई का आदेश, फिर कार्रवाई

सियासत की रिपोर्ट के अनुसार हाईकोर्ट ने पहले ही पिता को अपनी बेटियों को छोड़ने का आदेश दिया था, लेकिन आरोप है कि इस आदेश का पालन नहीं किया गया। इसके बाद अदालत ने मामले को गंभीरता से लेते हुए आर्थिक दंड/मुआवजे का आदेश दिया और दोनों बहनों की तत्काल रिहाई के निर्देश दिए।

यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि इसमें अदालत ने साफ संकेत दिया है कि बालिग महिला का धर्म और विवाह से जुड़ा निजी फैसला केवल इसलिए खत्म नहीं किया जा सकता कि परिवार उससे सहमत नहीं है।

धर्म से ज्यादा व्यक्ति की आजादी का सवाल

मामले को केवल हिंदू से मुस्लिम धर्म परिवर्तन या अंतरधार्मिक विवाह के रूप में देखना अधूरा होगा। इसका बड़ा सवाल यह है कि एक बालिग नागरिक को अपने विश्वास और जीवन के बारे में फैसला करने की कितनी आजादी है।

हाईकोर्ट की कार्रवाई इसी व्यक्तिगत आजादी को लेकर है। अदालत ने यह भी नहीं कहा कि हर धर्म परिवर्तन अपने आप सही है; बल्कि इस मामले में यह देखना था कि दोनों वयस्क महिलाओं ने अपना फैसला अपनी मर्जी से लिया या नहीं और क्या उन्हें उनकी इच्छा के खिलाफ रोका गया था।

इस मामले का सबसे बड़ा संदेश यही है कि परिवार की असहमति किसी बालिग व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अपने आप खत्म नहीं कर देती।

-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

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