सूरह अद-दुखान की आयत 58 का असल मतलब यह है कि अल्लाह ने अपने कलाम को नबी ﷺ की ज़ुबान, यानी साफ़ और फसीह अरबी में इस तरह आसान बनाया कि लोग उसे सुनें, समझें, नसीहत लें और अपनी जिंदगी बदलें। इब्ने कसीर और इमाम तबरी की तफसीर में यही बात सामने आती है।
अल्लाह तआला सूरह अद-दुखान में फरमाता है:
فَإِنَّمَا يَسَّرْنَاهُ بِلِسَانِكَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ
यानी:
“हमने इस कुरआन को तुम्हारी ज़ुबान में आसान कर दिया, ताकि वे नसीहत हासिल करें।”
यहां एक बहुत गहरी बात समझने की जरूरत है। अल्लाह ने यह नहीं फरमाया कि कुरआन सिर्फ पढ़ने के लिए आसान किया गया है, बल्कि आगे मकसद बताया “लअल्लहुम यतज़क्करून”, यानी ताकि लोग याददिहानी हासिल करें, नसीहत लें और अपनी जिंदगी में इसका असर पैदा करें।
इब्ने कसीर की तफसीर क्या कहती है?
मशहूर मुफस्सिर इमाम इब्ने कसीर रहमतुल्लाह अलैह लिखते हैं कि अल्लाह ने कुरआन को नबी ﷺ की ज़ुबान में आसान, साफ और वाज़ेह बनाया, ताकि लोग उसे समझें और उस पर अमल करें। यानी कुरआन का मकसद सिर्फ आवाज़ से तिलावत करना नहीं, बल्कि उसके पैगाम को समझना और जिंदगी में उतारना है।
इमाम तबरी रहमतुल्लाह अलैह भी इसी आयत की तफसीर में लिखते हैं कि अल्लाह ने कुरआन की किराअत को नबी ﷺ की ज़ुबान में आसान किया, ताकि लोग उसकी दलीलों और नसीहतों पर गौर करें, सोचें और अपने रब की इताअत की तरफ लौटें।
यानी इस आयत में कुरआन की आसानी का मकसद तीन चीजें हैं:
पढ़ना → समझना → जिंदगी बदलना।
सिर्फ पढ़ लेना और फिर जिंदगी में कोई बदलाव न आना इस आयत के पूरे मकसद को हासिल करना नहीं है।
कुरआन को याद करने में आसानी भी अल्लाह की नेमत है
कुरआन में यही बात दूसरी जगह और भी साफ तौर पर चार बार आई है:
“और हमने कुरआन को नसीहत हासिल करने के लिए आसान कर दिया है, तो क्या कोई है जो नसीहत हासिल करे?”
यह बात सूरह अल-कमर में 54:17, 54:22, 54:32 और 54:40 में दोहराई गई है। इब्ने कसीर की तफसीर में इस आसानी में कुरआन की तिलावत, याद करना और उसके मतलब से नसीहत लेना शामिल बताया गया है। मुजाहिद रहमतुल्लाह अलैह ने भी “आसान करने” को उसकी किराअत के आसान होने से जोड़ा है।
यह कितनी बड़ी नेमत है कि दुनिया में करोड़ों लोग कुरआन को पूरा या उसका बड़ा हिस्सा याद कर लेते हैं। लेकिन याद करने के साथ समझना और अमल करना भी जरूरी है।
नबी ﷺ ने कुरआन सीखने और सिखाने को सबसे बेहतर काम बताया
हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
“तुममें सबसे बेहतर वह है जो कुरआन सीखे और उसे सिखाए।”
यह हदीस सहीह बुखारी, हदीस 5027 में है।
गौर कीजिए, नबी ﷺ ने सिर्फ यह नहीं कहा कि जो कुरआन पढ़े वह बेहतर है, बल्कि “सीखे और सिखाए” कहा। सीखने में उसके अल्फाज़, तिलावत, मतलब, हुक्म और जिंदगी में अमल सब शामिल हैं।
सिर्फ अरबी पढ़ लेना काफी है?
यहां हमारे लिए एक अहम सवाल पैदा होता है।
भारत में बहुत से मुसलमान कुरआन अरबी में पढ़ लेते हैं, लेकिन अरबी का मतलब नहीं समझते। वे तिलावत का सवाब जरूर हासिल करते हैं, लेकिन अगर कोई व्यक्ति पूरी जिंदगी कुरआन पढ़ता रहे और उसे यह मालूम ही न हो कि अल्लाह उससे क्या कह रहा है, तो वह कुरआन के बड़े मकसद से महरूम रह सकता है।
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि अरबी तिलावत की अहमियत नहीं है। तिलावत इबादत है। लेकिन तिलावत के साथ अपनी समझ की ज़ुबान में तर्जुमा और तफसीर पढ़ना कुरआन से रिश्ता और मजबूत करता है।
कुरआन खुद कहता है:
“क्या ये लोग कुरआन में गौर नहीं करते?”
(सूरह मुहम्मद 47:24)
और एक जगह फरमाया:
“यह एक बरकत वाली किताब है, जिसे हमने उतारा है, ताकि लोग इसकी आयतों में गौर करें और अक्ल वाले इससे नसीहत हासिल करें।”
(सूरह साद 38:29)
इसलिए कुरआन का रिश्ता सिर्फ आंख, जुबान और कान से नहीं, बल्कि दिल और अक्ल से भी होना चाहिए।
बुजुर्गों की नसीहत भी यही थी
सहाबा किराम के बारे में एक मशहूर बात बयान की जाती है कि वे कुरआन की आयतें सीखते, फिर उनके मतलब और अमल को सीखते थे। इसी वजह से उनकी तिलावत उनके किरदार में दिखाई देती थी। इस सिलसिले में यह बात भी रिवायतों में मिलती है कि सहाबा के लिए कुरआन के अल्फाज़ याद करना मेहनत का काम था, लेकिन वे उसके मुताबिक अमल को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाते थे।
यानी कुरआन का असल असर तब पैदा होता है जब वह जुबान से उतरकर दिल में जाए और दिल से निकलकर किरदार में आए।
आज हमारे लिए इस आयत का पैगाम
सूरह अद-दुखान की यह छोटी सी आयत हमें एक बहुत बड़ा रास्ता दिखाती है।
कुरआन पढ़िए।
उसका तर्जुमा पढ़िए।
तफसीर से समझिए।
फिर देखिए कि अल्लाह का यह पैगाम आपकी जिंदगी में कहां लागू होता है।
अगर कुरआन हमें सच बोलने को कहता है तो हम सच बोलें।
अगर वह इंसाफ का हुक्म देता है तो अपने कारोबार, परिवार और समाज में इंसाफ करें।
अगर वह पड़ोसी, गरीब, यतीम और जरूरतमंद का हक बताता है तो उनके साथ अच्छा सुलूक करें।
अगर वह नफरत, झूठ, धोखे और जुल्म से रोकता है तो उनसे बचें।
यही “लअल्लहुम यतज़क्करून” का असल मतलब है।
कुरआन हमारे घरों में मौजूद है। सवाल यह नहीं कि कुरआन हमारे पास है या नहीं। सवाल यह है कि क्या हम कुरआन के पास बैठकर यह समझने की कोशिश करते हैं कि हमारा रब हमसे क्या चाहता है?
और शायद इसी लिए अल्लाह ने फरमाया:
“हमने इसे तुम्हारी ज़ुबान में आसान कर दिया, ताकि वे नसीहत हासिल करें।”
यानी कुरआन हमारे लिए सिर्फ खत्म करने की किताब नहीं, बदलने की किताब है।
–क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

