(नूर क़ाज़ी)
हज़रत मखदूम शाह आला का 768वां उर्स, लाखों जायरीन ने मांगी अमन की दुआ
कानपुर, 12 अगस्त 2026। गंगा के किनारे बसे कानपुर के पुराने इलाके जाजमऊ में बुधवार को हज़रत मखदूम शाह आला रहमतुल्लाह अलैह का 768वां सालाना उर्स अकीदत और एहतराम के साथ मनाया गया। सुबह से ही दरगाह की तरफ जाने वाली सड़कों पर जायरीन की भीड़ बढ़ती रही। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए अकीदतमंदों के साथ स्थानीय लोगों ने भी उर्स में शिरकत की।
उर्स के मौके पर दादा मियां और हज़रत मखदूम शाह आला की मजारों पर कुल शरीफ की रस्म अदा की गई। दुआ में मुल्क में अमन-चैन, भाईचारा, तरक्की, खुशहाली और बीमारों के लिए शिफा की दुआ की गई। पिछले वर्षों की तरह इस बार भी बड़ी तादाद में जायरीन के पहुंचने से जाजमऊ और आसपास के इलाके में रौनक दिखाई दी।
700 साल से ज्यादा पुरानी रूहानी विरासत
हज़रत मखदूम शाह आला की दरगाह जाजमऊ की उन ऐतिहासिक जगहों में है, जहां सदियों से लोग अकीदत के साथ हाजिरी देते आए हैं। उपलब्ध ऐतिहासिक और स्थानीय स्रोतों के मुताबिक हज़रत मखदूम शाह आला का जन्म ईरान के जंजान इलाके में 571 हिजरी यानी करीब 1175 ईस्वी में हुआ था। शुरुआती तालीम के बाद उन्होंने इल्म हासिल करने के लिए बगदाद का सफर किया। बाद में हिंदुस्तान आए और जाजमऊ में लंबा अरसा गुजारा। स्थानीय इतिहास और दरगाह से जुड़ी जानकारी के मुताबिक उन्होंने करीब 60 साल जाजमऊ में रहकर लोगों की खिदमत और रहनुमाई की।
उनकी दरगाह का इतिहास भी काफी पुराना है। यहां अलाउद्दीन खिलजी के दौर का 696 हिजरी का शिलालेख और फिरोज शाह तुगलक के दौर के 761 और 762 हिजरी के शिलालेख होने का उल्लेख मिलता है। दरगाह की मौजूदा इमारत के निर्माण को भी फिरोज शाह तुगलक के दौर से जोड़ा जाता है।
उर्स में हिंदू-मुस्लिम दोनों की मौजूदगी
जाजमऊ की इस दरगाह की एक खास पहचान इसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब भी है। उर्स में सिर्फ मुसलमान ही नहीं, बल्कि दूसरे मजहबों के लोग भी हाजिरी देने और दुआ में शामिल होने आते रहे हैं।
दरगाह को हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल बताया गया । रिपोर्ट के मुताबिक उर्स की सामूहिक दुआ में अलग-अलग समुदायों के लोग शामिल होते हैं।
यही वजह है कि जाजमऊ का उर्स सिर्फ एक मजहबी आयोजन नहीं, बल्कि कानपुर की पुरानी मेल-जोल और भाईचारे की रवायत का भी हिस्सा माना जाता है।
दरगाह की एक मशहूर रवायत नीम के पेड़ से भी जुड़ी है। अकीदतमंदों में यह मान्यता चली आ रही है कि कुल शरीफ के वक्त नीम की पत्तियां कुछ देर के लिए मीठी हो जाती हैं। यह एक अकीदत और स्थानीय मान्यता है, जिसे जायरीन पीढ़ियों से याद करते आए हैं।
महफ़िले समां ने बांधा समां
उर्स से पहले रात को दरगाह और आसपास महफ़िले समां और कव्वाली का आयोजन भी हुआ, जिसमें कव्वालों ने सूफियाना कलाम पेश किए। देर रात तक अकीदतमंद इन महफिलों में मौजूद रहे।
उर्स के दौरान बड़ी भीड़ को देखते हुए प्रशासन और पुलिस की तरफ से सुरक्षा और ट्रैफिक व्यवस्था के इंतजाम किए गए। पिछले वर्षों में भी उर्स के दौरान भारी भीड़ को देखते हुए कई किलोमीटर के इलाके में ट्रैफिक व्यवस्था बदलनी पड़ी थी।
जाजमऊ का पैगाम,अमन और इंसानियत
हज़रत मखदूम शाह आला के उर्स की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि सदियों बाद भी यहां आने वाले लोगों के बीच अमन, मोहब्बत, इंसानियत और भाईचारे का पैगाम सुनाई देता है।
जाजमऊ की गलियों में उमड़ती भीड़, दरगाह पर रोशनियां, सूफियाना कलाम, दुआ के लिए उठे हजारों हाथ और अलग-अलग तबकों के लोगों की मौजूदगी यह बताती है कि धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत सिर्फ इतिहास की किताबों में नहीं होती, वह लोगों की जिंदगी और उनकी साझा यादों में भी जिंदा रहती है।
768वां उर्स भी इसी पुरानी रवायत की एक नई कड़ी बना, जहां अकीदत के साथ कानपुर और पूरे मुल्क के लिए अमन, तरक्की और भाईचारे की दुआ की गई।

