(रईस ख़ान/शिब्ली रामपुरी)
मुंबई में ऐतिहासिक जामा मस्जिद, क्रॉफर्ड मार्केट में प्रॉफेट फॉर ऑल अभियान के तहत “मस्जिद परिचय” कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसका मकसद अलग-अलग मज़हब और समुदाय के लोगों को मस्जिद, इस्लामी तौर-तरीकों और पैगंबर हज़रत मुहम्मद ﷺ की तालीमात को करीब से समझने का मौका देना था।
कार्यक्रम का संदेश बहुत साफ था, मज़हबी बहस नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझना, गलतफहमियां दूर करना और आपसी दोस्ती व भाईचारा बढ़ाना।राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के परपौत्र तुषार गांधी समेत विभिन्न धर्मों से जुड़े लोगों की मौजूदगी रही जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल रहीं.
कार्यक्रम के मुताबिक इसमें सभी मज़हब, संस्कृति और तबकों के लोगों को बुलाया गया था। मेहमानों को मस्जिद का गाइडेड टूर कराया गया और उन्हें बताया गया कि मस्जिद सिर्फ नमाज़ पढ़ने की जगह ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज की रोज़मर्रा की जिंदगी और सामाजिक रिश्तों का भी अहम हिस्सा है।
वुज़ू से नमाज़ तक, इस्लामी इबादत को समझने का मौका
कार्यक्रम में खास तौर पर वुज़ू और नमाज़ के बारे में आसान अंदाज़ में जानकारी दी गई। यहां शामिल हुए लोगों को समझाया गया कि नमाज़ में इंसान अल्लाह के सामने अदब और आजिज़ी के साथ खड़ा होता है।
नमाज़ की अलग-अलग हालतों को समझाते हुए बताया गया कि इसमें क़याम, यानी खड़े होकर अल्लाह के सामने हाज़िर होना; रुकू, जिसमें इंसान झुककर अपनी बंदगी और आजिज़ी का इज़हार करता है; और सज्दा, जिसमें इंसान जमीन पर अपना माथा रखकर अल्लाह के सामने पूरी तरह झुक जाता है, अहम हिस्से हैं।
इस तरह नमाज़ को सिर्फ एक धार्मिक रस्म के तौर पर नहीं, बल्कि इंसान और उसके रब के बीच सीधे रिश्ते और बंदगी का एक तरीका समझाया गया।
पैगंबर ﷺ की तालीम: रहमत, अमन और इंसानियत
प्रॉफेट फॉर ऑल अभियान का बुनियादी मकसद पैगंबर हज़रत मुहम्मद ﷺ की जिंदगी और उनकी तालीमात के उन पहलुओं को लोगों तक पहुंचाना है जिनमें रहमत, इंसाफ, अमन, मोहब्बत, भाईचारा और इंसानियत की खिदमत का पैगाम मिलता है। 2025 में इस अभियान के तहत स्कूलों-कॉलेजों में सीरत कार्यक्रम, इंटरफेथ मीटिंग और मस्जिद परिचय जैसे कार्यक्रम भी आयोजित किए गए थे।
सवाल-जवाब और खुली बातचीत
कार्यक्रम की एक अहम खूबी यह रही कि इसे एकतरफा तकरीर के बजाय जानकारी और बातचीत का मौका बनाया गया। मेहमानों को इस्लामी इबादत, मस्जिद के इस्तेमाल और मुस्लिम समाज से जुड़े सवाल पूछने का अवसर दिया गया।
ऐसे कार्यक्रमों का फायदा यह है कि किसी मज़हब को सिर्फ सोशल मीडिया या सुनी-सुनाई बातों से समझने के बजाय उसे सीधे उसके मानने वालों से बातचीत करके समझने का मौका मिलता है।
मुंबई में पहले भी मस्जिद परिचय कार्यक्रमों के दौरान गैर-मुस्लिम मेहमानों ने मस्जिद की इमारत, वुज़ू की जगह, लाइब्रेरी और नमाज़ की व्यवस्था को करीब से देखा था। कुछ मेहमानों ने इसे दूसरे मज़हब को समझने का नया तजुर्बा बताया था।
“मेहमान बनकर आइए, दोस्त बनकर जाइए”
इस कार्यक्रम का सबसे खूबसूरत संदेश यही था कि मुलाकात से गलतफहमियां कम होती हैं और बातचीत से रिश्ते मजबूत होते हैं।
आज के दौर में जब सोशल मीडिया पर मज़हबों के बारे में कई बार अधूरी या गलत जानकारी तेजी से फैलती है, ऐसे कार्यक्रम लोगों को एक-दूसरे को करीब से जानने का मौका देते हैं।
मस्जिद परिचय इसी सोच के साथ एक छोटा लेकिन अहम कदम है, मस्जिद का दरवाज़ा समझने के लिए खोलना, दिलों के दरवाज़े दोस्ती के लिए खोलना और पैगंबर ﷺ की तालीम को इंसानियत के पैगाम के तौर पर सामने रखना।
“मेहमान बनकर आइए, दोस्त बनकर जाइए”, इस पहल का यही सबसे खूबसूरत पैगाम है।इस दौरान जामा मस्जिद से जुड़े लोगों के अलावा प्रसिद्ध समाजसेवी आमिर इदरीसी.सईद खान. शाकिर शेख आदि भी मौजूद रहे

