हज फंड और ठेकों में गड़बड़ी के आरोप

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हाल के दिनों में हज यात्रा के इंतजाम को लेकर फिर से गंभीर सवाल उठने लगे हैं। सांसद संजय सिंह समेत कई लोगों ने आरोप लगाया है कि हज 2027 के लिए सर्विस प्रोवाइडर कंपनी चुनने में गड़बड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि तकनीकी कमेटी की मंजूरी के बावजूद सबसे कम बोली (L-1) वाली कंपनी को छोड़कर ऊँची दर वाली कंपनी को ठेका दिया गया। इससे हर हाजी पर हजारों रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ने का खतरा बताया जा रहा है।

ये आरोप अकेले नहीं हैं। पिछले कई सालों से हज कमेटी ऑफ इंडिया के कामकाज, ठेकों और खर्चों पर शिकायतें आती रही हैं। कई सांसदों और सामाजिक संगठनों ने खराब सेवा, महंगे ठेके और पारदर्शिता की कमी का मुद्दा उठाया है। कुछ मामलों में सूचना आयोग ने भी हज कमेटी को जानकारी देने के निर्देश दिए हैं।

हज फंड कैसे चलता है?

हज कमेटी ऑफ इंडिया का अपना सेंट्रल हज फंड है। इसमें हाजियों से ली गई फीस, सर्विस चार्ज, हज के लिए जमा रकम और बैंक में जमा पैसे पर मिलने वाला ब्याज आता है। 2016 के बाद से केंद्र सरकार इस फंड को कोई सीधा अनुदान नहीं देती। कमेटी का खर्च मुख्य रूप से हाजियों के योगदान और ब्याज से चलता है। कर्मचारियों की सैलरी भी इसी पैसे से निकलती है। हज हाउस के हॉल किराए पर देने से भी आय होती है।

सब्सिडी खत्म होने के बाद की तस्वीर

पहले केंद्र सरकार हवाई किराए पर भारी सब्सिडी देती थी। 2012-13 में यह राशि 800 करोड़ रुपये से ऊपर पहुँच गई थी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इसे धीरे-धीरे कम किया गया और 2018 से पूरी तरह बंद कर दिया गया। अब हाजी खुद पूरा खर्च उठाते हैं। कुछ राज्य सरकारें अपनी तरफ से थोड़ी मदद देती हैं, लेकिन केंद्र स्तर पर कोई सब्सिडी नहीं बची। आज सरकारी पैकेज की लागत तीन से पाँच लाख रुपये के बीच पड़ती है।

वर्तमान ठेका विवाद 

हज 2027 के लिए सर्विस प्रोवाइडर कंपनी के चयन पर सबसे ताजा विवाद है। आरोप है कि Ithraa Al Khair नाम की कंपनी को लगातार कई साल ठेका मिल रहा है। विपक्षी सांसदों और कुछ पत्रकारों का कहना है कि एक कंपनी ने कम दर पर बोली लगाई थी, फिर भी ऊँची दर वाली कंपनी को ठेका दे दिया गया। इससे हर हाजी पर करीब 30 हजार रुपये तक अतिरिक्त खर्च पड़ने का अनुमान लगाया जा रहा है। सरकार की तरफ से कहा गया है कि टेंडर प्रक्रिया नियमों के मुताबिक चली और कोई गड़बड़ी नहीं हुई। दोनों पक्ष अपने-अपने दावे कर रहे हैं।

पुरानी शिकायतें और पारदर्शिता के सवाल

पिछले वर्षों में भी कई शिकायतें सामने आई हैं। सऊदी अरब में आवास की क्वालिटी खराब होने, कुछ ठेकों में ऊँची दरें और RTI के जवाब में जानकारी न देने जैसे आरोप लगे हैं। कुछ सांसदों ने सीबीआई जाँच की माँग भी की है। सूचना आयोग ने हज हाउस के खर्च और ठेकों से जुड़ी जानकारी माँगने पर कमेटी को निर्देश दिए हैं। कई राज्यों में हज कमेटियों के पास फंड की कमी और बकाया बिलों की समस्या भी बताई जाती रही है।

क्या जरूरत है?

हज यात्रा करोड़ों मुसलमानों की आस्था से जुड़ी है। जब फंड मुख्य रूप से हाजियों के पैसे से चलता है, तो ठेकों, खर्चों और सेवा की क्वालिटी में पूरी पारदर्शिता जरूरी हो जाती है। आरोप चाहे साबित हों या न हों, बार-बार उठने वाली शिकायतें सिस्टम में सुधार की जरूरत को रेखांकित करती हैं। आम हाजी को सस्ता, सुरक्षित और बेहतर इंतजाम मिले, यही असल माँग है।

क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

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