नूरजहाँ सफ़िया नियाज़ लिखती हैं
भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की ओर से केरल के ग्रैंड मुफ़्ती शेख अबूबक्र अहमद के हालिया बयान की सख्त मज़म्मत की जाती है, जिसमें उन्होंने औरतों की तुलना सोने के ज़ेवर से करते हुए कहा कि जिस तरह ज़ेवर को महफूज़ रखने के लिए डिब्बे में रखा जाता है, उसी तरह औरतों को घरों में रहना चाहिए।
हम हर उस सोच और पाबंदी की भी मुख़ालिफ़त करते हैं जो औरतों को समाज और सार्वजनिक ज़िंदगी में बराबरी के साथ हिस्सा लेने से रोकती है।
यह मुफ़्ती साहब भी उन लोगों की लंबी कतार का हिस्सा नज़र आते हैं जो खुद को मज़हब का ठेकेदार समझते हुए औरतों की ज़िंदगी के बारे में फैसले सुनाते रहते हैं। अफ़सोस की बात यह है कि ऐसे लोग अपनी मर्दाना और पुराने ज़माने की सोच को मज़हबी तालीमात पर थोप देते हैं।
इससे सिर्फ मुस्लिम औरतों का नुकसान नहीं होता, बल्कि दुनिया के सामने इस्लाम की गलत तस्वीर भी पेश होती है।
यह दरअसल एक पुराने और मध्यकालीन ज़ेहन की सोच है, जिसे दुनिया भर के बहुत से मुसलमान भी स्वीकार नहीं करते। सबसे अहम बात यह है कि ऐसी सोच इस्लाम की असल तालीमात के भी खिलाफ है।
क़ुरआन औरत-मर्द के रिश्ते को क्या बताता है?
क़ुरआन मजीद औरत और मर्द के रिश्ते की बिल्कुल अलग और बराबरी पर आधारित तस्वीर पेश करता है।
क़ुरआन कहता है कि औरत और मर्द एक-दूसरे के औलिया, यानी मददगार और साथी हैं। (सूरह तौबा 9:71)
क़ुरआन यह भी बताता है कि दोनों को एक ही जान या एक ही स्रोत से पैदा किया गया है। (सूरह निसा 4:1)
औरत और मर्द को एक-दूसरे का लिबास कहा गया है। (सूरह बक़रा 2:187)
क़ुरआन यह भी साफ़ करता है कि मर्द और औरत, दोनों को अपनी कमाई और अपनी मेहनत का हक़ हासिल है। (सूरह निसा 4:32)
इन आयतों में औरत की इज़्ज़त, बराबरी, साझेदारी, अपनी मर्ज़ी और इंसानी गरिमा की बात की गई है, न कि उसे कैद करने और उसकी ज़िंदगी पर कंट्रोल करने की।
हज़रत ख़दीजा रज़ि. हमारी सबसे बड़ी मिसाल हैं
अगर हम इस्लाम की तारीख़ को देखें तो हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा की शख्सियत हमारे सामने एक बड़ी मिसाल के तौर पर मौजूद है।
वह इस्लाम कबूल करने वाली सबसे पहली शख्सियत थीं। वह एक कामयाब कारोबारी महिला थीं, अपना व्यापार खुद संभालती थीं और लोगों को रोजगार भी देती थीं।
वह समाज में एक इज़्ज़तदार, असरदार और मजबूत शख्सियत थीं। उन्हें कभी सार्वजनिक ज़िंदगी से अलग करके किसी बंद डिब्बे में रखने की बात नहीं की गई।
उनकी समझदारी, हिम्मत, आज़ादी, कारोबार की काबिलियत और मुस्लिम समाज के लिए उनकी खिदमत आज भी मुस्लिम औरतों के लिए एक बड़ी मिसाल है।
इस्लाम औरत को गायब हो जाने का हुक्म नहीं देता
इस्लाम औरतों से यह नहीं कहता कि वे समाज से कट जाएं या दुनिया के सामने अपनी मौजूदगी खत्म कर दें।
मुस्लिम औरतों को तालीम हासिल करने का हक़ है। उन्हें काम करने का हक़ है। उन्हें नेतृत्व करने, समाज में हिस्सा लेने और अपनी ज़िंदगी से जुड़े फैसले करने का हक़ है।
औरत सिर्फ किसी की बेटी, बीवी या मां ही नहीं है। वह अपनी अलग शख्सियत, सोच और पहचान रखने वाली एक मुकम्मल इंसान है।
बराबरी अल्लाह ने दी है
अल्लाह तआला ने औरत और मर्द दोनों को इज़्ज़त और इंसानी गरिमा अता की है।
किसी मुफ़्ती या किसी दूसरे व्यक्ति को यह हक़ नहीं कि वह अपनी मर्दाना सोच और पितृसत्तात्मक व्याख्या के ज़रिए इस बराबरी को बदल दे और फिर उसे इस्लाम का नाम दे।
औरतों को घर की चारदीवारी तक सीमित करने वाली ऐसी बातें सिर्फ अफ़सोसनाक नहीं, बल्कि इस्लाम की असल रूह और उसकी तालीमात के भी खिलाफ हैं।
हम मुस्लिम औरतें हैं।
हम ईमान वाली हैं।
हम इस मुल्क की बराबर की शहरी हैं।
हम इंसान हैं, हमारी अपनी सोच है, अपनी समझ है, अपनी पहचान और अपनी गरिमा है।
हम कोई सोने के ज़ेवर नहीं हैं जिन्हें किसी डिब्बे में बंद करके रखा जाए।
हम अल्लाह की बनाई हुई बराबर इज़्ज़त रखने वाली इंसान हैं, और हमें किसी डिब्बे में बंद नहीं किया जा सकता।
– भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन
नूरजहाँ सफ़िया नियाज़

